शनिवार, 29 अप्रैल 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत :क़िस्त 31 [ बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें-1]

उर्दू बहर पर एक बातचीत :क़िस्त 31 [ बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें-1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

---पिछली क़िस्त में बहर-ए-ह्ज़ज के मुरब्ब: ,मुसद्दस.मुसम्मन के सालिम बहर और उनकी मुज़ाअफ़ शकल पर बहस की थी
आज बहर-ए-हज़ज के ’मुज़ाहिफ़’ बहर पर चर्चा करेंगे
आप जानते हैं कि बहर-ए-हज़ज का बुनियादी सालिम रुक्न "मुफ़ाईलुन’[ 1 2 2 2] है अत: इस रुक्न पर लगने वाले  मुम्किनात ’ज़िहाफ़’ की चर्चा करेंगे
 ज़िहाफ़ात और उनके तरीक़ा-ए-अमल की चर्चा पहले ही कर चुके हैं
’मु फ़ाईलुन’ [ 1222] पर लगने वाले  मुम्किनात ज़िहाफ़
मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़

मुफ़ाईलुन[ 1222] +कब्ज़ =मक़्बूज़ =मफ़ाइलुन [1212]   यह ज़िहाफ़ आम है
मुफ़ाईलुन[ 1222] +कफ़ = मक्फ़ूफ़ =मफ़ाईलु  [1 2 2 1]    ][लाम मय हरकत]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +हज़्फ़ = महज़ूफ़ = फ़ऊ लुन [12 2  ]    =यह ज़िहाफ़  जर्ब/अरूज़ के लिए  मख़सूस
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम =अख़रम =मफ़ऊलुन [ 2 2 2] 
मुफ़ाईलुन[ 1222] +क़स्र =मक़्सूर = मफ़ाईल   [ 1221] =फ़ऊलान [1221] से बदल लिया =यह ज़िहाफ़  जर्ब/अरूज़ के लिए ख़ास
मुफ़ाईलुन[ 1222] +बतर =अबतर = फ़अ लुन  [2 2]        
मुफ़ाईलुन[ 1222] +तस्बीग़ = मुस्सबीग़ = मफ़ाईलान [ 1 2 2 2 1] 

मुरक्क़ब ज़िहाफ़ 
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम+क़ब्ज़]   =अख़रम मक़्बूज़] = फ़ा इलुन [ 212] = [नोट इसे ’शतर’’ भी कहते है और मुज़ाहिफ़ को”अश्तर’ कहते हैं
मुफ़ाईलुन[ 1222] +बतर+क़ब्ज़ = अबतर मक़्बूज़   = फ़ अल   [ 1 2]  = लाम साकिन 
मुफ़ाईलुन[ 1222] +बतर + हज़्फ़ = अबतर महज़ूफ़ =  फ़अ      [2]     [-ऐन साकिन]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +बतर+ क़स्र = अबतर मक़्सूर = फ़ा अ     [ 2 1]  [-ऐन साकिन]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम+कफ़ = अखरम मक़्फ़ूफ़        = मफ़ऊलु  [2 2 1]  [ संयुक्त रूप से इसे ’अख़रब’ भी कहते है यानी    ख़र्ब= ख़रम+कफ़
मुफ़ाईलुन[ 1222] + ख़रम+हज़्फ़ = अखरम महज़ूफ़ =फ़अ लुन   [2 2]     [ -ऐन- साकिन]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम+क़स्र =अख़रम मक़्सूर =फ़अ लान [ 2 2 1 ]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम_तस्बीग़ = अख़रम मुस्सबीग़ =मफ़ ऊ लान [ 2 2 2 1]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +कब्ज़+तस्बीग़ = मक़्बूज़ मुस्सबीग़ =मफ़ाइलान  [12121 ]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +हतम [=बतर+क़ब्ज़+तस्बीग़]=अहतम = फ़ऊल       [ 12 1]  [ लाम साकिन

घबराइए नहीं

कोई भी शायर इन तमाम मुमकिनात [संभावित] मुज़ाहिफ़ बहर में शायरी नहीं करता । वो तो academic discussion और जानकारी के लिए लिख दिया । परन्तु कोई मनाही भी नहीं है । आप चाहें तो कर सकते हैं ।ये आप के फ़नी ऎतबार और हुनर-ए-सुखन पर निर्भर करेगा
एक बात और
इन्ही हज़ज की मुज़ाहिफ़ बहरों पर तख़्नीक़ के अमल से रुबाई’ के 24-औज़ान बरामद होते है। वैसे ही जैसे
बहर-ए-मुतक़ारिब और मुतदारिक के मुज़ाहिफ़ बहरों पर ’तस्कीन’ और तख़नीक के अमल से ’माहिया ’ के  24- औज़ान बरामद होते है---चूँकि यह दोनों ’स्निफ़-ए-सुख़न’ [ काव्य विधायें] उर्दू शायरी की स्वतन्त्र  ’काव्य विधा’ है अत: इस पर किसी दीगर मुक़ाम पर विस्तार से चर्चा करेंगे। शिगूफ़ा यहाँ छोड़े  जाता हूँ
एक बात और
अहले अरब ने [ अरब के अरूज़ियों ने] ज़िहाफ़ात के मुआमले में 3-क़ैद लगा रखी है
1 मुअक़्क़बा
2 मुरक़्क़बा
3 मुकन्नफ़ा
इस क़ैद पर , विस्तार मे किसी अन्य मुकाम पर चर्चा करेंगे। ’मुआक़बा’ के बारे में ज़रा संक्षिप्त में चर्चा कर लेते हैं यहां ।कारण कि  ’हज़ज’ पर मुअक़्क़बा ’ है यानी
------किसी एक single रुक्न में या दो consecutive रुक्न में  लगातार ’[यानी एक के बाद दूसरा] दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ एक साथ आ जाते है तो  सबब पर ज़िहाफ़ या तो लगेगा या नहीं लगेगा। अगर लगा तो सिर्फ़ किसी एक ही सबब  पर लगेगा ,दोनो ’सबब’ पर एक साथ नहीं लगेगा।ऐसी स्थिति 9-बह्रों में होती है । और वो बह्रें है  तवील---मदीद---वाफ़िर-----कामिल-----हज़ज-----रमल----मुन्सरह-----ख़फ़ीफ़- और--मुजतस
यानी बह्र-ए-हज़ज में मुअक़्कबा है ।

अब आप कहेंगे कि इस ’परिभाषा’ की या इस क़ैद की क्या ज़रूरत थी? अरूज़ी की किताब में सामान्यतया इस परिभाषा का ज़िक़्र नहीं दिखता।
ज़रूरत इस लिए पड़ी कि
हम जानते हैं कि किसी रुक्न पर ’ज़िहाफ़’ लगाते हैं तो एक ’मुज़ाहिफ़ रुक्न’ प्राप्त होता है । कभी कभी वही  ’मुज़ाहिफ़ रुक्न’ किसी और दूसरे तरीक़े  या दूसरे अमल से या दूसरे ज़िहाफ़ [मुफ़र्द या मुरक़्क़ब ] के अमल से भी प्राप्त हो सकता है ।तो फिर यह देखना पड़ेगा कि वो तरीक़ा कहीं [मुआक़िबा,---,---] की खिलाफ़वर्जी तो नहीं है  ।अगर ख़िलाफ़वर्जी है वह तरीक़ा उचित नहीं माना जायेगा ।
मुआक़बा की क़ैद इस लिए लगाई गई कि रुक्न में एक साथ 4-या -5 मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ न आ जाये । अरबी कलमात 4-या-5 मुतहर्रिक हर्फ़  तो ’स॒पोर्ट’ कर लेते है मगर  उर्दू शायरी ’सपोर्ट’ नही कर पाती । उर्दू शायरी मे 3- मुतहर्रिक आते ही ’तस्कीन’-ए-औसत का अमल ’सपोर्ट’ करने लगता है
और यह क़ैद इस् लिए  भी कि  कहीं ज़िहाफ़ लगाते लगाते  दो वज़न की शकल  एक जैसी न हो जाये कि भ्रम की स्थिति पैदा हो जाये
ख़ैर बात निकली  तो हो गई.....

यहाँ सभी मुमकिनात मुज़ाहिफ़ बह्र और उस पर भी तस्कीन और तख़नीक़ की  अमल का  चर्चा करना न ज़रूरी है , न मुनासिब है-- सिवा इस के कि उलझन पैदा हो । चर्चा तो इस लिए कर लिया कि वक़्त ज़रूरत काम आए।

अब हम यहाँ सिर्फ़ हज़ज के उन्ही मक़्बूल और मानूस मुज़ाहिफ़ बहर की चर्चा करेंगे जिस में आम तौर पर आम शो’अरा शायरी करते है और जो राइज़ हैं
[क] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: महज़ूफ़ 
मुफ़ाईलुन---फ़ऊलुन
1222----122
ऊपर देखें तो स्पष्ट  है कि मुफ़ाईलुन पर हज़्फ़ ज़िहाफ़ लगने से ’फ़ऊलुन [122] बरामद होता है जिसे महज़ूफ़ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ शे’र में अरूज़/जर्ब के लिए ख़ास है
और चूँकि एक शे’र में 4-रुक्न [यानी मिसरा मे 2-रुक्न] तो मुरब्ब: कहलाता है
एक उदाहरण [आरिफ़ ख़ान साहब के हवाले से]-ख़ुद साख़्ता शे’र है उनका

न जीते हैं   न मरते
तेरी फ़ुरक़त में हमदम

आप तक़्तीअ कर के देख सकते है -आसान है
1  2  2  2  / 1 2  2 =1222--122
न जीते हैं  / न मर ते
1 2   2   2    / 1  2  2 =1222--122
तिरी फ़ुर क़त/ में हम दम
अगर इसी शे’र को ज़रा तब्दील कर के देखते हैं कि क्या होता है ---आप ख़ुद ही देख लें कि क्या होता है
न जीते हैं   न मरते  हैं = 1222---1222
तेरी फ़ुरक़त में ,ऎ हमदम = 1222---1222
बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: सालिम का वज़न आ गया
यानी कोई मिसरा आप के हाथ लग गया तो मुरब्ब: मुसद्दस मुसम्मन मफ़ज़ूफ़ मक़्सूर वग़ैरह  बनाना तो आप के बायें हाथ का खेल होगा-शर्त यह कि मिसरा अपना पूरा मुकम्मल अर्थ [महफ़ूम] की अदायगी करे।

 इसकी मुसद्दस और मुसम्मन शकल भी होती हैं  और नाम यूँ होगा
[ख] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़ 
मुफ़ाईलुन -----मुफ़ाईलुन---फ़ऊलुन
1222---------1222--------122
एक उदाहरण [तक़्तीअ] आप कर लीजियेगा
मीर की एक ग़ज़ल है जिसका एक शे’र है

सुख़न मुश्ताक़ है आलम हमारा
गनीमत है जहाँ  मे दम हमारा 

ग़ालिब की ग़ज़ल का भी एक शे’र ले लेते है कि बात ज़रा और साफ़ हो जाये

  हवस को है निशात-ए-कार क्या क्या
न हो मरना तो जीने   का मज़ा  क्या 

चलिए आप के लिए इस की तक्तीअ  किए देता हूँ
1  2    2  2   / 1 2  2  2   / 1 2  2 = 1222---1222---122
ह वस को है /नि शा ते का / र क्या क्या
1   2   2  2  / 1 2 2   2     / 1 2 2 = 1222---1222---122
न हो मरना /तो जी ने   का / मज़ा  क्या
इस शे’र शुद्ध रूप से  हज़ज ’महज़ूफ़’  की मिसाल है -कारण कि शे’र के अरूज़ और जर्ब -दोनो मुक़ाम पर ’फ़ऊलुन’ [ 122] यानी महज़ूफ़ है

[ग] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़ 

मुफ़ाईलुन---------मुफ़ाईलुन -----मुफ़ाईलुन---फ़ऊलुन
1222----------1222---------1222--------122
एक उदाहरण [तक़्तीअ आप कर लीजियेगा][एक ख़ुद साख़्ता शे’र इस ग़रीब हक़ीर का भी बर्दाश्त कर लें

हीं उतरेगा अब कोई   फ़रिश्ता आसमाँ से
उसे डर लग रहा होगा यहाँ  अहल-ए-ज़हाँ से

तक़्तीअ कर के देखते हैं
1  2   2  2 / 1    2  2  2    /  1  2    2    2   / 1 2 2 = 1222---1222----1222---122
नहीं उतरे / गा  अब कोई   / फ़ रिश ता  आ/ समाँ से
1  2   2  2    /   1 2  2 2 / 1 2  2   2  /  1 2 2 = 1222---1222---1222---122
उसे डर लग / रहा होगा / यहाँ  अह ले / ज़हाँ से

वैसे यह पूरी की पूरी ग़ज़ल ’महज़ूफ़’ में ही है--कहीं -मक़्सूर की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

[घ] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्सूर
मुफ़ाईलुन--फ़ऊलान   [ नून साकिन]
1222------1221
ऊपर देखें तो स्पष्ट  है कि मुफ़ाईलुन पर क़स्र  ज़िहाफ़ लगने से ’फ़ऊलान [1221 ] बरामद होता है जिसे ’मक़्सूर’ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ शे’र में अरूज़/जर्ब के लिए ख़ास है
एक उदाहरण [डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से]

तड़पते हैं हर एक आन
तेरी फ़ुरक़त मे हम आह

तक़्तीअ कर के देखते हैं
1 2  2   2 /  1 2 2  1   =  1222----1221  [यहाँ हर एक आन --में अलिफ़ का वस्ल है अत: ’हरेकान ’का [ 1221 ] तलफ़्फ़ुज़ देता है
तड़पते हैं /हर एक आन
1 2   2    2    / 1 2  2 1 = 1222----1221
तेरी फ़ुरक़त /मे हम आह

इसकी मुसद्दस और मुसम्मन शकल भी हो सकती है

[च] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस मक़्सूर 

मुफ़ाईलुन--------मुफ़ाईलुन--फ़ऊलान   [ नून साकिन]
1222------ 1222------1221
एक उदाहरण [तक़्तीअ आप कर लीजियेगा]
मीर के उसी ग़ज़ल का मक़्ता है

खे रहते हैं दिल पर हाथ ऎ  ’मीर’
यही शायद  कि है सब ग़म हमारा

[इस मक़्ता में- अरूज़ के मुक़ाम पर --(हा) --थ ऎ ’मीर’ --- मक़्सूर [ 1221] है जब कि जर्ब में  -हमारा - ’महज़ूफ़’ [122]है और शायरी में इनका ख़ल्त [मिलावट] जाइज है ]क्यों? कारण ऊपर लिख दिया है

ग़ालिब के उसी ग़ज़ल का मक़्ता लेते है

बला-ए-जाँ है ;ग़ालिब’ उसकी हर बात 
इबारत क्या ,इशारत क्या ,अदा  क्या 

यहाँ मिसरा सानी तो ख़ैर -मुसद्दस महज़ूफ़-में ही और होना भी चाहिए कारण कि साहब ने मतला के दोनो शे’र में -महज़ूफ़- बाँध दिया था तो लाज़िमन मक्ता के मिसरा सानी में महज़ूफ़ बांधना ही था । मगर मक्ता के मिसरा में ऐसी कोई क़ैद नही सो ग़ालिब साहब ने इसे ’मक़्सूर’ में बांध दिया जो रवा भी और जाइज भी है
मिसरा उला की तक़्तीअ कर देता हूँ
1  2  2   2   / 1  2  2    2     / 1  2  2 1 = 1222---1222---1221
बला-ए-जाँ/  है ;ग़ालिब’ उस/ की हर बा त

एक बात आप ध्यान से देखे---ग़ालिब [उस्ताद] हों या ’मीर’ [ख़ुदा-ए-सुख़न] हों  किसी ने पूरी की पूरी ग़ज़ल सिर्फ़ मक़्सूर में ही हो--नहीं कही है। उन्होने मक़्सूर का सहारा कहीं कहीं और किसी किसी मिसरा में लिया है जो रवा है
इसका मतलब यह हुआ कि ख़ालिस मक़्सूर में पूरी की पूरी ग़ज़ल कहना वाक़ई मुश्किल का काम है।  जी निहायत मुश्किल का काम है ।मेरे ख़याल से - कारण कि जो शे’र के आख़िर में ’हर्फ़ उल आख़िर’ साकिन तो  है  ज़रूर- मगर अलिफ़ के बाद आता है  यानी ’अलिफ़’ जब आप के शे’र को ऊँचाई पर खीच रहा था ्यानी परवाज़ पर था कि अचानक उसे साकिन पर उतरना पड़ा , जो शे’र की रवानी को कम कर देता है ।यक़ीनन ’तक़्तीअ  में तो  फ़र्क नहीं  पड़ता है शे’र की रवानी में फ़र्क़ पड़ता है ।
अब ग़ालिब के शेर -में अरूज़ के मुक़ाम पर --की हर बात - को ही लें । की हर बा-- तक तो कोई कबाहत नहीं है श्रोता सुनता भी यही है -त- को ज़रा हल्का [लगभग न के बराबर ]  भी बोलेंगे तो श्रोता भाव से समझ जायेगा
ख़ैर---
[छ] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मक़्सूर

मुफ़ाईलुन-----मुफ़ाईलुन--------मुफ़ाईलुन--फ़ऊलान   [ नून साकिन]
1222------1222------ 1222------1221
एक उदाहरण [डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

मिरे हमदम तेरा दामन जो पकड़ेगा कोई ख़ार
तुझे उस लम्हा रह रह कर सताएगी  मेरी याद

तक़्तीअ के लिए एक इशारा कर देते है-तक़्तीअ आप कर लीजियेगा]

मिरे हमदम / तेरा दामन / जो पकड़ेगा / कोई ख़ार

तुझे उस लम/  हा रह रह कर/  सताएगी  /मेरी याद

एक बात ’महज़ूफ़’ और मक़्सूर के सन्दर्भ में

---यह ज़िहाफ़ आपस में एक दूसरे की जगह बदले जा सकते हैं । यानी एक मिसरा में ’महज़ूफ़’ और दूसरे मिसरे में ’ मक़्सूर’ लाया जा सकता है। लेकिन बह्र का नाम  -मिसरा सानी में [यानी जर्ब के मुक़ाम पर] प्रयुक्त मुज़ाहिफ़ के नाम से तय होगा
यानी अगर जर्ब में ’मक़्सूर’ का प्रयोग हुआ है तो बह्र का नाम होगा-- बहर-ए-हज़ज [ मुरब्ब:/मुसद्दस/मुसम्मन] मक़्सूर
और अगर  जर्ब में ’महज़ूफ़’ का प्रयोग हुआ है तो बह्र का नाम होगा-- बहर-ए-हज़ज [ मुरब्ब:/मुसद्द्स/मुसम्मन] महज़ू
ये ज़िहाफ़ आपस में क्यों मुतबद्दिल है? और वज़न में कोई फ़र्क़ क्यों नही पड़ता?

महज़ूफ़ [122] और मक़्सूर [1221] में मात्र एक ’साकिन’ अल आख़िर  ज़ियादत है और उसके पहले एक साकिन [ अलिफ़ का] और है ।अत: शे’र के अन्त में दो-साकिन’ एक साथ आ गए । जैसे दोस्त----बख़्त--- शिकस्त--याद ..ख़ार  -आदि आदि। अन्त में दो साकिन एक साथ आते है] ऐसे केस में तक्तीअ में मात्र ’एक साकिन’ ही शुमार होता है दूसरा साकिन नहीं ।अत: बह्र के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

अगली क़िस्त में --हम हज़ज पर लगने वाले अन्य ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र करेंगे

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181








गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 39 [ अहवाल-ए-कश्मीर पर]

चन्द माहिया : क़िस्त 39 [ अहवाल-ए-कश्मीर पर]


:1:
वो ख़्वाब दिखाते हैं
जन्नत की ख़ातिर
जन्नत ही जलाते हैं

:2;
नफ़रत ,शोले ,फ़ित्ने
बस्ती जली किस की
रोटी सेंकी ,किसने ?

:3:
ये कैसी सियासत है ?
धुन्ध ,धुँआ केवल
ये किस की विरासत है?

;4:
रहबर बन कर आते
कलम छुड़ा तुम से
पत्थर हैं चलवाते 

;5:
केसर की क्यारी में
ज़हर उगाने की
वो हैं तैय्यारी में 

शब्दार्थ:

अहवाल = हालात .[हाल का बहु वचन]
फ़ित्ना     = उपद्रव

-आनन्द.पाठक-
08800927181


गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 37


:1:
सद ख़्वाब ,ख़यालों में
जब तक  है परदा
उलझा हूँ सवालों में 

;2:
शिकवा  न शिकायत है
मैं ही ग़लत ठहरा
ये कैसी रवायत है

:3:
तुम ने ही बनाया है 
ख़ाक से जब मुझ को 
फिर ऎब क्यूँ आया है ?

:4:
सच है इनकार नहीं
’तूर’ पे आए ,वो
लेकिन दीदार नहीं 

:5;

कहता है कहने दो
बात ज़हादत की
ज़ाहिद तक रहने दो

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ 
ज़हादत की बातें  = जप-तप की बातें
तूर = उस पहाड़ का नाम जहाँ पर हज़रत
मूसा ने ख़ुदा से बात की थी 



सोमवार, 17 अप्रैल 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 30 [ बहर-ए-हज़ज सालिम-1]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 30 [ बह्र-ए-हज़ज [ सालिम बह्र-1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

फिछली क़िस्त में हमने बहर मुतक़ारिब और बहर मुतदारिक की सालिम , मुज़ाहिफ़ और इसकी  ’मुज़ाअफ़’  पर चर्चा कर चुके है । हालाँ कि उसके बाद भी  चर्चा की और भी गुंजाइश थी मगर ज़रूरी नहीं थी।
ये दोनो  बह्रें ’ख़म्मासी’ [5- हर्फ़ी] कहलाती है कारण कि इन की जो बुनियादी रुक्न ’फ़ऊलुन’ [122] और ’फ़ाइलुन’ [ 212] हैं वो 5- हर्फ़ी हैं यानी [ --फ़े--अलिफ़--ऐन--लाम--नून] से बनी है
अब हम बह्र-ए-हज़ज की चर्चा करेंगे । यह बह्र सुबाई बहर[7-हर्फ़ी] कहलाती है यानी इनके रिक्न में 7-हर्फ़ का वज़न होता है
इस बहर का बुनियादी रुक्न है --मुफ़ाईलुन [1 2 2 2] यानी [ --मीम --फ़े--अलिफ़---ऐन--ये--लाम ---नून]
यह बहर एक बतद [3 हर्फ़ी] और 2 सबब [2-हर्फ़ी] से मिलकर बना है

मुफ़ाईलुन [ 1222] = वतद+सबब+सबब
    = यानी वतद-ए-मज़्मुआ+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़+सबब-ए-ख़फ़ीफ़
       मुफ़ा [1 2]                   + ई [2}                + लुन  [2]
    =   1 2 2 2 = मुफ़ाईलुन

 आज हज़ज के सालिम बहर की चर्चा करेंगे । सालिम क्यों कहते है अब बताने की ज़रूरत नहीं है शायद। इस बहर में सिर्फ़  सालिम रुक्न  ’मुफ़ाईलुन’ का ही प्रयोग करेंगे कोई ज़िहाफ़ का प्रयोग नहीं करेंगे
[क] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: सालिम
मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन  [दो बार]
  1 2 2 2------1 2 2 2
यानी यह रुक्न अगर  किसी शे’र में 4-बार या मिसरा में 2-बार] प्रयुक्त हो तो उसे मुरब्ब: सालिम कहेंगे [ मुरब्ब: मानी ही 4-होता है]
एक ख़ुद साख़्ता [खुद की बनाई हुई] शे’र सुनाते हैं [पसन्द न आए कोई बात नहीं मयार भले न हों वज़न तो है ---हा हा हा ]

चले आओ मिरे दिल में
फ़ँसी है जान  मुश्किल में 

तक़्तीअ कर के देखते हैं
1  2   2  2  / 1  2  2  2 =1222--1222
चले आओ / मिरे दिल में
             1  2   2  2 / 1  2  2   2 =1222---1222
फ़ँसी है जा /न  मुश् किल में

 एक दूसरा शे’र भी सुन लें [कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से ]

कभी इक़रार की बाते
कभी इनकार की बातें
तक़्तीअ कर के देखते है
1 2   2   2   / 1  2  2  2 = 1222--1222
कभी इक़ रा /र की बाते
            1   2    2   2 / 1  2  2 2 =1222---1222
कभी इन का /र की बातें
जब तक अगली बहर पर जायें -एक खेल खलते हैं [ गुस्ताखी मुआफ़ी के तहत]
सिद्द्क़ी साहब के शे’र को आगे बढ़ाते हुए और अपने कलाम का पेबन्द लगाते हुए

कभी इक़रार की बातें
कभी इनकार की बातें

चले आओ मिरे दिल में 
नहीं कटती हैं अब रातें
[तक़्तीअ आप कर लीजियेगा] इसी तरह आप भी चन्द अश’आर [ क़ाफ़िया बरक़रार रखते हुए] जोड़ सकते हैं --मश्क़ [ प्रैक्टिस] भी हो जायेगी] ख़याल रखियेगा --- ’बातें ’ का क़फ़िया --गाते--- आते---जाते---खाते---नहीं होगा -कारण कि इन में हर्फ़ उल आखिर [आखिरी हर्फ़] में ;नून गुन्ना’ नहीं होगा।  सौगातें---मुलाक़ातें चलेगा। ख़ैर--
एक बात और--
मुरब्ब: बहर में सिर्फ़ सदर/इब्तिदा---अरूज़/जर्ब ही होता है। हस्व का मुक़ाम नहीं होता । होगा भी कैसे? एक मिसरा में 2-रुक्न है --तो जगह ही कहाँ बचा ’हस्व’ के लिए  ?

वैसे सालिम बहर में ग़ज़ल कहना आसान होता है - ज़िहाफ़ से मुक्त  होता है -- ज़िहाफ़ात की कोई झंझ्ट ही नहीं

[ख] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस सालिम
    मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन
     1222--------1222---------1222
यानी एक मिसरा में 3-सालिम रुक्न या शे’र में 6-रुक्न] मुसद्दस मानी ही 6
[जनाब आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

मआल-ए-इश्क़ ख़जलत के सिवा क्या है
कहो सब से न कोई दिल लगाये याँ

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1  2  2   2 / 1     2    2    2  / 1 2  2   2   = 1222---1222---1222
मआले इश्/ क़  ख़ज लत के/ सिवा क्या है
1   2   2   2  / 1   2 2  2    / 1  2 2  2     = 1222----1222--1222
कहो सब से/  न को ई दिल /  लगाये याँ

इस बहर की ’मुज़ाअफ़’ शकल भी मुमकिन है। उदाहरण आप बताएं तो अच्छा होगा अभी तक मेरे ज़ेर-ए-नज़र गुज़रा नहीं । कभी कहीं मिलेगा तो यहाँ लगा देंगे।

[ग] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम   यह वज़न  ही बहुत  मक़्बूल मानूस और मारूफ़ वज़न है  अमूमन हर शायर ने इस बहर में अपनी ग़ज़ल /अश’आर कहें है और कसरत [ प्राचुर्य, अधिकता से,बहुतायत ] से कहें हैं और कसरत से उदाहरण दस्तयाब [प्राप्य ] हैं
इसका वज़न है

    मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन
     1222--------1222---------1222-------1222
यानी सालिम रुक्न -मुफ़ाईलुन- मिसरा में 4-बार और शे’र मे 8-बार आता है । मुसम्मन मानी 8
अल्लामा इक़बाल की एक नज़्म है

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों ज़मीनो में 
वो निकलें मेरे ज़ुल्मतखाना-ए-दिल के मक़ीनों में

ख़मोश ऎ दिल ! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा
अदब पहला क़रीना है मुहब्बत के क़रीनों  में

 एक शे’र की तक़्तीअ मैं कर देता हूँ ---एक की आप कर दें
1  2   2      2    / 1  2  2   2      / 1   2  2   2   / 1 2  2  2 =1222---1222---1222---1222 [यहाँ ख़मोश ए दिल --में ==ऐ - श के साथ वस्ल होकर ’शे’ का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा है सो 2 का वज़न लिया
ख़मोश ऎ दिल /! भरी मह फ़िल /में चिल ला ना /न हीं अच् छा
1  2     2    2  / 1 2  2  2/ 1  2  2   2   / 1 2 2  2  = 1222---1222---1222---1222
अ दब पह ला /क़रीना है /मु हब बत के / क़रीनों  में

पहले शे’र की तक़्तीअ आप कर के मुतमय्यिन [निश्चिन्त] हो लें

अब एक मीर का एक शे’र लेते है

कभू ’मीर’ इस तरफ़ आकर जो छाती कूट जाता है
ख़ुदा शाहिद है , अपना तो  कलेजा टूट जाता  है

[ मीर -का यह ख़ास अन्दाज़ था -कभी-को -कभू -लिखना । वज़न में वैसे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा]

इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते है
1  2    2    2     / 1   2   2  2      / 1  2  2  2  / 1 2 2 2 = 1222----1222----1222----1222
कभू ’मीर’ इ स/  त रफ़ आ कर /जो छाती कू/ट जा ता है
1  2    2   2    / 1   2   2   2  / 1 2 2 2  / 1 2 2  2 =1222-----1222----1222---1222-
ख़ुदा शा हिद /है , अप ना तो / कलेजा टू /ट जा ता  है

[यहां ’मीर इस’ को 2 2 की वज़न पर क्यों लिया -एक खटका सा लगा होगा आप को। कारण कि मीर के ’र ’ के साथ सामने जो ’इस’ वस्ल हो कर    ---’मी रीस’-- का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा है और यह 2- सबब है[सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है]
यानी -कभू -12 -वतद-ए-मज़्मुआ -मुफ़ा [12] के वज़न पर
मी  [2]  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -ई-[2] के वज़न पर
रिस [2] सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -लुन-[2] के वज़न पर

अब एक शे’र ग़ालिब का भी देख लेते हैं

न था कुछ तो ख़ुदा था ,कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने ,न होता मैं तो क्या  होता

हुई मुद्दत कि ’ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है
वो इक हर बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता

[यहाँ एक बात वाज़ेह [स्प्ष्ट] कर दें अगर आप मतला समझ गये होंगे  तो ज़िन्दगी के दर्शन भी समझ गए होंगे ।इस मतला का कोई सानी नहीं ,खुदा मग़फ़रत करें]

चलिए एक शे’र की तक़्तीअ मैं कर देता हूँ मतला की आप कर लें
1  2   2   2  / 1    2  2     2   / 1 2  2   2    / 12 2 2 = 1222---1222---1222---1222
हुई मुद् दत / कि ’ग़ालिब’ मर/ ग या पर या /द आता है
1   2    2   2   /  1 2   2  2   / 1   2   2  2 / 1 2    2 2 == 1222---1222---1222---1222
वो इक हर बा /त पर कहना  /कि यों होता /तो क्या होता
तो यह होते हैं मुस्तनद शो"अरा [प्रामाणिक और उस्ताद शायरों] के कलाम -- ऐब से पाक ,मयार में बुलन्द. तवाज़ुन में एक भी मज़ीद  ’हर्फ़’[ अतिरिक्त हर्फ़ ]की गुंजाईश  नहीं ----हमारे जैसे ग़रीब को तो बहुत और  बहुत कुछ सीखने के ज़रूरत है
उदाहरण तो बहुत है अज़ीम शो’अरा के है

अब चलते चलते एक शे’र इस हक़ीर का भी बर्दास्त कर ले[मेहरबानी होगी]

जो जागे हैं मगर जगते  नहीं उनको जगाना क्या
खुदी को ख़ुद जगाना है किसी के पास जाना क्या

इबारत है लिखी दीवार पर गर पढ़ सको ’आनन’
समझ जाओ इशारा क्या ,नताइज़ को बताना क्या

पहले शे’र की तक़्तीअ कर के देखते हैं--मतला की आप कर लें-आसान है
1   2  2  2/  1 2  2  2    / 1  2  2    2  / 1 2 2 2 =1222--1222--1222--1222
जो जागे हैं / म गर जगते  /नहीं उनको /जगाना क्या
1  2    2    2  / 1 2  2 2 / 12 2   2    / 1 2 2 2  =1222---1222----1222--1222
खुदी को ख़ुद/ जगाना है /किसी के पा /स जाना क्या

चलते चलते एक खूब सूरत दिलकश गाना सुनाते है --आप ने सुना भी होगा --यू ट्यूब- पर उपलब्ध है गीतकार राजेन्द्र कृष्ण जी है
फ़िल्म ’शहनाई’ [1964] का है जिसको  विश्व जीत और राजश्री पर फ़िल्माया गया है ।लिन्क नीचे लगा दिया हूँ आप भी सुने
https://www.youtube.com/watch?v=W_YckCpQAoY
गाने की इबारत लिख रहा हूँ

न झटको जुल्फ़ से पानी ,ये मोती फूट जायेंगे
तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा ,मगर दिल टूट जायेंगे

ये भींगी रात ये भींगा बदन ये हुस्न का आलम
ये सब अन्दाज़ मिल कर दो जहाँ को लूट जायेंगे

हमारी जान ले लेगा ,ये नीली आँख का जादू
चलो अच्छा हुआ मर कर जहाँ से छूट जायेंगे

ये नाज़ुक लब है या आपस में दो लिपटी हुई कलियाँ
ज़रा इनको अलग कर दो तरन्नुम फूट जायेंगे  
 
अब 1-2 शे’र की तक़्तीअ कर के देखते है बाक़ी का आप कर के तस्दीक कर लें
  1  2   2   2   / 1  2  2  2  / 1  2  2  2/ 1  2 2 2 1222-1222-1222-1222
न झटको जुल् /फ़ से पानी / ,ये मोती फू /ट जायेंगे
1   2  2   2   / 1  2   2   2  /  1 2    2    2  / 1  2 2 2  1222--1222-1222-1222
तुम्हारा कुछ / न बिग ड़े गा ,/ म गर दिल टू /ट जायेंगे
1    2  2 2 /1 2 2  2   / 1 2  2  2    / 1 2   2  2 1222-1222-1222-1222
ये भींगी रा/ त ये भींगा  /बदन ये हुस् / न का आलम
1   2    2    2   / 1  2     2   2   / 1  2  2  2  /1  2 2 2  1222-1222-1222-1222
ये सब अन् दा / ज  मिल कर दो /जहाँ को लू /ट जायेंगे

अरे ! यह तो बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम की बहर आ गई। तो क्या यह गाना हज़ज मुसम्मन सालिम में लिखा गया है } जी हां

गाना लिख कर उदाहरण देने का मेरा मक़सद यही रहता है कि आप बहर/वज़न की ताक़त को पहचाने,  कितनी तर्न्नुम होती हैं ये बह्रें ,,,,कितनी दिल कश मौसिकी [संगीत] लय तान धुन सुर आरोह अवरोह से बाँधी जा सकती हैं ये ग़ज़लें । पुरानी पीढ़ी के गीतकार .शायर कितना पास [ख़याल] रखते थे अपनी शायरी में । ऊपर के शे’र मे एक भी हर्फ़ न ज़्यादा हुआ न कम हुआ-क्या ग़ज़ल कही है हर वज़न हर शे’र अपनी जगह मुकम्मल । यही कारण है कि ग़ज़ल लिखना आसान भले हो कहना आसान नहीं
आज के फ़िल्मी गीतों की क्या बात करे ---चार बोतल वोडका---काम है मेरा रोज़ का---हो गया गाना । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्ला--भगवान ही मालिक है।
एक बात और
एक बात मेरे ज़ेहन में आ रही है ,आप के ज़ेहन में भी आ रही होगी?
 मुतक़ारिब और मुतदारिक के केस में  मुज़ाअफ़ [ 16-रुक्नी] बहर का ज़िक़्र किया था मगर अरूज़ की किताबों में बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम मुज़ाअफ़ का कहीं ज़िक़्र नही देखा और न कोई मिसाल [उदाहरण] ही देखी? न जाने क्यों ? पता नही? इस सवाल का जवाब तो कोई मुस्तनद व मारूफ़ अरूज़ी [प्रमाणित व प्रतिष्ठित ] ही दे सकते हैं आप में से भी शायद कोई दे सकता है। मैं तो नहीं दे सकता ,मेरी  बिसात कहाँ ।

हाँ लाल बुझक्कड़ की तरह कुछ बूझ सकता हूं सही भी हो सकता है ग़लत भी हो सकता है कॄपा कर के इसको प्रमाणिक नहीं मानियेगा } मैं तो ऐसे ही सोच रहा हूँ

मुतक़ारिब या मुतदारिक बहरें ख़म्मसी बहरें [5-हर्फ़ी]बहरें थी अगर इनकी ’मुसम्मन मुज़ाअ’फ़ बहर बनती है
तो  कुल मात्रा  122----122------------------122-  =   5 गुना 8 =40 हर्फ़
या 212---212-------------------------------212-=   5 गुना 8 = 40 हर्फ़

मगर जब सुबाई बह्रे [हज़ज------रमल----रजज़ ] की मुसम्मन मुज़ाअफ़ बनेगी तो क्या होगा  =56 हर्फ़ आ जायेंगे
इतनी लम्बी बहर क्या मौसिकी [संगीत] सपोर्ट कर पायेगी या नहीं ? मालूम नहीं?
मगर हाँ --जिस गज़ल को संगीत बद्ध या लय पूर्ण गाया न जा सके तो फिर वो ग़ज़ल क्या है । ’दाग़’ की ग़ज़लें कोठेवालियाँ यूँ ही तो नहीं गाती थी !
एक बात और---
यूँ तो अरूज़ के लिहाज़ से तो सैकड़ों-सैकड़ों बहर/वज़न का इम्कान [संभावना] है  आप चाहें तो तमाम मुमकिनबहूर/वज़न में शे’र कह सकते हैं मुमानियत नहीं [मनाही] नही है । आप चाहे तो ’टेक्निकली ”बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मुज़ाअफ़’ में शायरी कर सकते हैं मनाही  नहीं है  मगर बात रवायत और रिवाज़ की है। हमारे क़दीम व ज़दीद [पुराने और नए शो’अरा ने कुछ ख़ास मुख़्तलिफ़ मक़्बूल रवायती बहर में ही शायरी की है और बुलन्द पा शायरी की है ।  उन्होने बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मुज़ाअफ़ में या ऐसे हि किसी अन्य बहर [रमल और रजज़ ] मे  शायरी करने से गुरेज़ किया हो।

प की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

अब अगले क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे 
अस्तु
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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or
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-आनन्द.पाठक-


0880092 7181

रविवार, 9 अप्रैल 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 29 बह्र-ए-मुतक़ारिब और मुतदारिक का तुलनात्मक अध्ययन

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 29 [ बहर मुतक़ारिब और मुतदारिक का तुलनात्मक अध्ययन]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

पिछली क़िस्तों में हम बहर-ए- मुतक़ारिब और मुतदारिक की सालिम ,मुरब्ब: ,मुसद्दस मुसम्मन और इनकी मुमकिनात [संभावित] मुज़ाहिफ़ और मुज़ाइफ़ शकल पर  विस्तार से चर्चा कर चुके हैं साथ ही उन पर लगने वाले ’तस्कीन-ए-औसत’ और ’तख़नीक़] का अमल भी देख चुके हैं कि कैसे इन के अमल से अनेकानेक मज़ीद[अतिरिक्त]  बहरें  बरामद की जा सकती हैं
आज हम इन दोनो बहूर का एक तुलनात्मक अध्ययन करेंगे इसमें क्या क्या  समानतायें और क्या क्या  विभिन्नतायें हैं
1- दोनो ही बहूर उर्दू में हिन्दी से आयें है यानी हिन्दी के गीतों से हिन्दी छन्द शास्त्र से आयें है
2- इसमे भी बह्र -ए-मुतदारिक बह्र पहले आया और बहर-ए- मुतक़ारिब बाद में आया
3- दोनो बहर ’ख़म्मासी’ बह्र कहलाती है यानी 5-हर्फ़ी बहर हैं [ ख़म्स: माने ही 5-वस्तुओं का समाहार होता है । ये दोनो बह्रें ’एक सबब ’[2 हर्फ़ी] + एक वतद [ 3 हर्फ़ी] से मिल कर बनती है
4- बह्र-मुतक़ारिब का बुनियादी रुक्न है- फ़ऊलुन [12 2] जो      वतद + सबब  से मिल कर बना है  }
 यहाँ ’फ़ऊ [12]    ---- वतद [3-हर्फ़ी ] है   जिसे हम वतद-ए-मज़्मुआ कहते है
और ’लुन’    [2]  --------सबब [2-हर्फ़ी [ है  जिसे हम  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ कहते है
5- बह्र-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न ---फ़ा इलुन ह[2 12] है जो सबब+ वतद  से मिल कर बना है
यहाँ    ’फ़ा’ [2]---------सबब [2-हर्फ़ी ] है जिसे हम सबब-ए-ख़फ़ीफ़ कहते है
और ’इलुन’ [ 12] -------वतद [3-हर्फ़ी] है  जिसे हम वतद-ए-मज़्मुआ कहते है
      हालां  कि  हम इसे ’लुन फ़ऊ’ [2 12] भी कह सकते थे---वज़न बरक़रार रखते हुए  मगर नहीं कहते । अरूज़ियों ने सबब और वतद के लिए कुछ ’कलमा’ पहले से ही तय कर रखें हैं जैसे

सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [ 2 ]के लिए -----फ़ा---तुन्---लुन्---ई----मुस् ----तफ़्-
सबब-ए-सकील   [1 1] के लिए-----मु त --इ ल--
 वतद-ए-मज़्मुआ [12 ] के लिए----फ़ऊ----इलन्----इला---मुफ़ा----
वतद-ए-मफ़रूक़ [2 1] के लिए---लातु ---

हालाँ कि 4/5- हर्फ़ी वज़न के लिए भी कुछ ऐसे ही लफ़्ज़ तय कर रखे गयें है जिसे ’फ़ासिला’ [ फ़ासिला-ए-सग़रा और फ़ासिला-ए-कबरा कहते हैं] } मगर हमने इस इस्तलाह [परिभाषा] को चर्चा में नहीं लिया। कारण कि हमारे अरूज़ का काम  सबब [2-हर्फ़]  औरवतद[3 हर्फ़] से चल जाता है तो इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। हां कुछ अरूज़ी  अर्कान को फ़ासिला के इस्तलाह [ परिभाषा ] से भी समझाते है-समझा सकते हैं-आप भी चाहें तो समझ सकते है[
एक सोचने की बात है  ----अगर तमाम सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के लिए एक कलमा जैसे --फ़ा--ौर  वतद -ए-मज़्मुआ के लिए एक कलमा मुफ़ा-- वग़ैरह वग़ैरह ही रहता तो इतने ;ज़ुज’ [टुकड़े] याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती अर्कान रटने भी ’सहूलियत’ होती । मगर ऐसा नहीं है अरूज़ की किताब में   ख़ैर----आप  सोचियेगा।
6- ये दोनो बहरें एक ही दायरे [वृत[ से निकल्री हैं जिसका नाम है -दायरा-ए-मुतफ़िका:--।उर्दू अरूज़ में ये दायरे Graphically ऐसे Design किए गये हैं [और उनके अलग अलग नाम भी है ]कि तमाम अर्कान और बहर इस से बरामद हो सकती हैं ।तवालत से बचने के लिए मैने जान बूझ कर इन दायरों पर चर्चा नहीं किया कि ज़रूरत ही नहीं पड़ी । अगर आप और गहराई में जाना चाहतें हैं तो किसी भी ’क्लासिकल’ अरूज़ की किताब में मिल जायेगी।
7- दोनो बह्रें आपस में ’प्रतिबिम्बित’ [mirror image] हैं अत: कभी कभी मुबहम [भ्रम] भी हो जाता है और एक ख़ास बात कि एक का  रुक्न से दूसरा रुक्न बरमद किया जा सकता है जैसे ---
    [वतद+सबब]----वतद+सबब]-----वतद+सबब]-----वतद+सबब]
मुतक़ारिब --- ----फ़ऊ लुन-------फ़ऊ लुन--------फ़ऊ लुन--------फ़ऊ लुन
   122--------     --122-------------122-----------122 = 122---122----122---122

अब इसे बस एक ’स्टेप’ आगे कर दीजिये  फिर देखिए--जैसे
[सबब+वतद]---------[सबब+वतद]------[सबब+वतद]-----[सबब+वतद]
लुन फ़ऊ-----.-------लुन फ़ऊ------,---लुन फ़ऊ---------लुन फ़ऊ  [जिसे हम ’फ़ा इलुन’ 212 से बदल लेते हैं सुविधा के लिए]

2   12---------------2  12-------------2   12----------2 1 2 =  212---212---212---212   = लीजिए ये तो बहर-ए-मुतदारिक का वज़न आ गया
8- वतद और सबब -- वतद का एक मानी होता है -’खूंटा -और सबब का एक मानी होता है ’रस्सी’। अब आप कहेंगे अरूज़ में --खूँटा और ’रस्सी’ का क्या काम ? जी काम तो कुछ नहीं बस अर्कान समझने में आसानी हो जाती है
खूँटा- गड़ गया सो गड़ गया ,हिलता नही । वतद अपनी जगह ’फ़िक्स’ रहता है
रस्सी --खूँटे से बँध गई तो बँध गई - बस इर्द गिर्द ,आगे/पीछे घूम सकती है । अब आप वतद[3]  के खूंटे से एक या दो रस्सी  ’सबब’ [2]का  बाँध दीजिये
एक ’सबब’[2] बाँधियेगा तो ख़्म्मासी  सालिम बहर बरामद होगी जैसे
सबब ------------[वतद]     तो मुतदारिक
   -          [वतद]-------सबब तो मुतक़ारिब
दो सबब [2]बाँधियेगा तो ;सुबाई; [7-हर्फ़ी] सालिम बहर बरामद होगी

             [वतद]-----सबब------सबब   यानी   12  2  2   =मुफ़ाईलुन  ------ --बह्र-ए-हज़ज
सबब-----     --[वतद]------सबब यानी    2 12   2   = फ़ाइलातुन---------बह्र-ए-रमल
सबब---सबब-- [वतद] यानी   2 2  1  2   = मुस तफ़ इलुन------ बह्र-ए-रजज़

यहां~ पर सबब और वतद आप के समझने के लिए लिख दिया वगरना ये सब अपने मुकाम पर अपने सही रूप ख़फ़ीफ़... सकील--मज़्मुआ---मफ़रुक़ के मुताबिक़ ही होंगे
वग़ैरह वग़ैरह
9-  बहर-ए-मुतक़ारिब  में चूँकि   ’वतद’ पहले आता है अत: ’ख़रम’ का ज़िहाफ़ लगता है } जब इस ज़िहाफ़ का अमल ’फ़ऊ लुन’ पर होता है तो मुज़ाफ़िह रुक्न को ’अख़रम’ नहीं कहते बल्कि ’असलम’ कहते हैं
  और ज़िहाफ़ "सरम और क़ब्ज़’ के अमल से एक मुज़ाहिफ़ बहर बरामद होती है --"मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ सालिम अल आखिर"[जिसका वज़न होता है
 फ़अलु------फ़ ऊलु------फ़ऊलु----फ़ऊलुन--- [यानी -लु- मय हरकत है]
21-----------121---------121------122
इस पर ’तख़्नीक’ के अमल से एक दो नही सैकड़ों वज़न बरामद किए जा सकते है [ पिछले क़िस्त में इस पर चर्चा कर भी चुके है] इसी अमल से अनेकानेक वज़न से एक वज़न यह भी बरामद होती है
फ़अ लुन-------फ़अ लुन-----फ़अ लुन----फ़अ लुन    [ -ऐन साकिन -]
22-------------22-------------22--------22  और इस वज़न का नाम होता है---अरे ! नाम तो वही रहेगा बस शकल बदल गई है वज़न भी वही रहेगा क्योंकि यह वज़न ’तख़्नीक़’ के अमल से बरामद किया गया ह

10-  बह्र-ए-मुतदारिक  में चूँकि ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ पहले आता है अत: इस पर ;ख़ब्न’ का ज़िहाफ़ लगता है जो आम ज़िहाफ़ है और मुज़ाहिफ़ को मख़्बून कहते हैं और वो बहर है
फ़अलुन-------फ़अलुन-----फ़अलुन----फ़अलुन     [यहां -अ- यानी -ऐन मुतहर्रिक है यानी मय हरकत है]
1 1 2-----------1 1 2-------1  1  2----1 1 2      और इस बहर का नाम है --" मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून ’---
 इस पर ’तस्कीन’ के अमल से कई वज़न बरामद किए जा सकते हैं
जिसमे एक वज़न यह भी बरामद होगा
फ़अ लुन------फ़अ लुन------फ़अ लुन----फ़अ लुन [ यहाँ भी -अ-यानी -ऐन मुतहर्रिक है यानी मय हरकत है]
22----------22-----------22----------22-  और इस बहर का नाम है --अरे ! नाम तो वही रहेगा बस शकल बदल गई वज़न भी वही रहेगा कारण कि यह वज़न ’तस्कीन; के अमल से बरामद किया गया है

अब आप (9) और (10) को एक बार ध्यान से देखें --दो हम शकलें बहर बरामद हो गई
ज़ाहिरी तौर पर दो मुख़्तलिफ़ [अलग बहरें] --दो अलग अलग रास्ते से चल कर .....हम शकल बहरें -----पर मक़ाम एक आ गया -यानी -- 22---22---22---22  और  गुत्थी उलझ गई

 ऐसे ही एक गुत्थी पिछली किस्त में भी उलझ गई थी जब दो बहर
(क) बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मक़्तूअ अल आखिर   
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़अ लुन
     212---212-------212-----22
और
(ख)  बह्र-ए--मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन अल आखिर "    
           212---212------212------22
हमशकल बहर बरामद हुई थी।

(9)- में जिस बहर 22---22---22---22--की चर्चा कर रहे हैं वो बह्र-ए-मुतक़ारिब  से बरामद हुआ है और वो भी ’तख़्नीक़’ के अमल से बरामद हुआ है जिसे शम्शुर्रहमान सिद्दिक़ी साहब ने ’मीर की बहर’ के नाम से नवाज़ा है कारण कि मीर तक़ी मीर साहब ने अपनी ग़ज़लों में इस बहर का कसरत से [प्रचुरता से] प्रयोग किया है
(10) -में जिस बहर 22---22---22---22 --की चर्चा कर रहे हैं वो बह्र-ए-मुतदारिक से बरामद हुआ है और वो भी ’तस्कीन’ के अमल से बरामद हुआ है और दोनो बहर ’हम शकल ’ भी हैं

यह उलझन तब और गम्भीर हो जाती है जन इन बहूर की ’मुज़ाअफ़ शकल [16-रुक्नी बहर ] का प्रयोग होता है इन उलझनों में हम भी न पड़ेंगे और न हम चाहेंगे कि हमारे हिन्दीं दां भी पड़े । मात्र बहर और वज़न से ही क्या होगा -शे’र में शे’रियत ,बलाग़त और फ़साहत [ काव्य-सौष्ठव ,काव्य सौन्दर्य ] भी तो होना चाहिए ।
 मात्र ग़ज़ल देख कर या इसकी तक़्तीअ कर के ही ऐसी बह्रों को नहीं पहचान सकते है । पहचानने के लिए कुछ clue चाहिये
 शुरुआत में देखने में तो ये दोनो बह्रें बड़ी आसान ,सरल और सहज  लग रही थी
जैसे     मुतक़ारिब में
  फ़ऊलुन[122] ----फ़ऊलुन[122] ----फ़ऊलुन[122] ----फ़ऊलुन[122]
या         फ़ऊलुन[122] -----फ़ऊलुन[122] ----फ़ऊलुन[122] ---फ़ अल  [1 2]

 इसकी  अन्य सरल मुज़ाहिफ़  बहर में ग़ज़ल या अश’आर कह लिए  और लोग करते भी है ।क्या कबाहत है? कौन इनकी पेचींदगी मे जाय।  

उसी प्रकार मुतदारिक में
फ़ाइलुन [212]-----फ़ाइलुन [212]-----फ़ाइलुन [212]-----फ़ाइलुन [212]
या फ़ाइलुन [212]-----फ़ाइलुन [212]------फ़ाइलुन [212]----फ़अ      [2]  
 या   इसकी  अन्य सरल मुज़ाहिफ़  बहर में ग़ज़ल या अश’आर कह लिए  और लोग करते भी है ।क्या कबाहत है? कौन इनकी पेचींदगी मे जाए।  

और जब उलझने आ गई पेंचीदगी से मुकाबिल हो गए तो सुलझाना ही पड़ेगा।
एक दिलचस्प फ़िल्मी गाना  याद आ गया । आप भी  लुत्फ़-अन्दोज़ हों
-’ आकाश दीप ’ फ़िल्म का है आप ने भी सुना होगा
https://www.youtube.com/watch?v=Sn2X6_hPvNY

मुझे दर्द-ए-दिल का पता न था ,मुझे आप किस लिए मिल गये

मैं अकेले यूँ ही मज़े में था ,मुझे आप किस लिए मिल गये ?

चले जा रहे था जुदा जुदा ,मुझे आप किस लिए  मिल गये ?

कहने का मतलब यह कि---ये अरूज़ और अरूज़ की पेंचीदगियों का पता न था ...मुझे आप क्यूँ यह बता गए ----मैं तो इस से पहले मज़े में था---- गज़ल ’लिखता’ था --फ़ेसबुक 100-50 लोग वाह वाह भी करते थे ---मुझे आप किस लिए सब बता रहे
चलिए ये तो मज़ाक़ की बात हो गई --एक बार फिर अपने मौज़ू पर आते हैं
वो कौन सा clue है जिससे इन बहूर को पहचाना जा सके । कोई बँधा-बँधाया टकसाली ’क्लू’ तो नही है पर कुछ अन्धेरे में तीर तो मारा ही जा सकता है

(क) बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मक़्तूअ अल आखिर    और  (ख)  बह्र-ए--मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन अल आखिर "    
           212---212------212------22                                212---212-------212-----22
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़अ लुन         फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़अ लुन      

कभी कभी सालिम बह्र पर ज़िहाफ़ [मुरक्कब या मुफ़र्द] के अमल से या फिर ’तस्कीन’ और ’तख़नीक़’ के अमल से ऐसे मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद हो जाते है कि मुबहम का बाइस [ भ्रम के कारण] हो जाते हैं
एक बात ध्यान में रखिएगा ---मुतक़ारिब के केस में ’मुज़ाहिफ़ बहर पर तख़्नीक़ का अमल’ होता है  [यानी दो-consecutive रुक्न मिला कर -3 मुतहर्रिक एक साथ लगातार [मुतस्सिल] हो
जब कि .मुतदारिक के केस मे---’मुज़ाहिफ़ बह्र पर ’तस्कीन’ का अमल होता है [यानी एक-रुक्न में 3-मुतहर्रिक एक साथ लगातार [मुतस्सिल] हो
मक्तूअ के केस में --22-- सिर्फ़ अरूज़ और जर्ब में ही आ सकता है और हर शे’र में उसी मक़ाम पर आयेगा कारण कि यह एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो अरूज़ और जर्ब के लिए ही मख़्सूस है जब कि मख़्बून मुसक्किन के केस में --22-- कहीं भी सकता है इत्तिफ़ाक़न यहाँ अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर आ गया वरना हो सकता है कि अगले शे’र में या किसी अन्य शे’र में यह सदर या हस्व के मुक़ाम पर आ जाये त्तस्कीन की वज़ह से । आप ग़ल के अन्य अश.आर देख कर स्वय्ं को आश्वस्त कर सकते हैं

ऐसे ही एक स्थिति मुतक़ारिब के केस में हुई थी । पिछले क़िस्त में चर्चा भी किया था
बह्र-ए-मुतक़ारिब पर ज़िहाफ़ और तख़नीक़ के अमल से  मुसम्मन वज़न में  कई मुतबादिल बहूर में से -एक बहर बरामद हुई थी जिसका वज़न था
[अ] 22---22----22-----22-
और जिसका नाम है---मुतकारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर 
और बहर-ए-मुतदारिक पर ज़िहाफ़ और ’तस्कीन; के अमल से मुसम्मन वज़न में कई मुतबादिल बहूर में से-एक बहर बरामद हुई थी जिसका वज़न था
[ब] 22---22---22-----22
और जिसका नाम है---मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन
गुत्थी तब और उलझ जाती है जब ये दोनो रुक्न अपनी अपनी  ’मुज़ाअफ़’ [दो-गुनी] शकल में आ जाती है

देखने से दोनो बहरें [अ] और [ब]  जुड़वा और हमशकल लग रही है पर इन के  नाम जुदा जुदा हैं और बरामद होने के तरीक़े भी अलग है और रास्ते भी अलग  है
अत: मात्र -’देख कर ही किसी ’ग़ज़ल’ या शे’र का वज़न नहीं बताया जा सकता है } ज़रूरत भी नहीं है। असल बात तो शे’र की शे’रियत ,ग़ज़ल में गज़लिय्यत फ़साहत और बलाग़त का है ,मुतस्सिर करने की ताक़त का है--नाम में क्या रखा है
आप ऊपर के ---बह्र-ए- मुतदारिक मुसम्मन मक़्तूअ अल आखिर कहें या  बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन अल आख़िर कहें --क्या फ़र्क़ पड़ता है। आप कह सकते हैं । मगर हाँ -अगर आप अरूज़ जानते हैं और समझते हैं तो कोई ’तथाकथित’ अरूज़ी आप को इस मुद्दे पर घुमा नहीं सकता।

आप ने अब तक इन दोनो बहरों की मुरब्ब:--मुसद्दस---मुसम्मन शक्लें देख चुके हैं और समझ चुके है और उनकी मुज़ाअफ़ [दो-गुनी] शकलें भी  जो आसान भी है और इन पर गुज़िस्ताँ अक़सात में तज़्क़िरा भी कर चुके हैं
 चलते चलते मुज़ाहिफ़ बहरों की इन्हीं दुशवारियों से बचने के लिए  और आप की सुविधा के लिए --हम  ’मुतक़ारिब’    और मुतदारिक के उन मक़्बूल मुज़ाहिफ़  बहरों के नाम  लिख रहा हूँ जो आसान है दिलकश है और बहुत से शायर इस में शायरी किए हैं और करते है आप भी कर सकते है
[क]  मुतक़ारिब की मक़्बूल मुज़ाहिफ़ बहर और वज़न"---
(1) मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ /मक़्सूर
फ़ऊलुन--फ़ऊलुन---फ़ऊलुन-- फ़ अल/फ़ ऊ ल  
122---122---122---12/121
इसकी मुसद्दस शकल भी मुमकिन है
[2] मुतक़ारिब मुसम्मन असलम मक़्बूज़ मुख़्नीक़ सालिम अलअखिर
फ़अ लुन---फ़ऊलुन// फ़अ लुन---फ़ऊलुन
22----------122-// 22-----------122 
[3] मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर/मुसबीग़
फ़अ लु---फ़ऊलु----फ़ऊलु---फ़ऊलुन /फ़ऊलान
21---------121-------121---122/1221
इस बहर पर तख़्नीक़ के अमल से 16-मज़ीद वज़न बरामद किए जा सकते हैं
इस की मुज़ाअफ़ वज़न भी मुमकिन है
इन्ही 16-वज़न में से एक वज़न यह भी है 
22---22----22-----22-
यानी  फ़अ लुन----फ़अ लुन-----फ़अ लुन-----फ़अ लुन

[4] मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ / मक़्सूर
फ़अ लु---फ़ऊलु----फ़ऊलु---फ़ अल /फ़ऊल
21---------121-------121---12/121
ध्यान दीजियेगा-- अरूज़/जर्ब के मुक़ाम पर [फ़ अल =12= महज़ूफ़ है फ़ऊलुन [122] का
इस वज़न से भी  तख़्नीक़ के अमल से 16 -और वज़न प्राप्त किए जा सकते है
इस के मुज़ाअफ़ वज़न भी मुमकिन है

‘[5] मुतकारिब असलम सालिम मुसम्मन मुज़ाहिफ़ 
[फ़अ लुन--फ़ऊलुन]---[फ़अ लुन--फ़ऊलुन]---[फ़अ लुन--फ़ऊलुन]- [फ़अ लुन--फ़ऊलुन]
] [22-----------122]---[22----------122]----[22-----------122]---[22----------122]
फ़अ लुन [22] ---असलम है फ़ऊलुन [122] का इस बहर में 
इसी प्रकार और भी बहुत से मानूस वज़न प्राप्त किए जा सकते है तमाम वज़न का चर्चा करना यहाँ न मक़ासिद [ उद्देश्य]  है न मुनासिब[ उचित]  है और न ज़रूरत है 


[ख] मुतदारिक की मक़्बूल मुज़ाहिफ़ बह्र और वज़न :--

[1]   मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून
फ़ अ लुन---फ़ अ लुन---फ़ अ लुन---फ़ अ लुन  [-ऐन- मुतहर्रिक]
112--------112--------112---------112
[2] मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन
फ़अ लुन---फ़अ लुन---फ़अ लुन---फ़अ लुन     [-ऐन-बसकून]
22---------22-----------22------22
[3] मुतदारिक मुमुसद्द्स  मख़्बून मुसक्किन
फ़अ लुन---फ़अ लुन---फ़अ लुन---[-ऐन-बसकून]
22---------22----------22  

[4] मुतदारिक मुसम्मन महज़ूज़
फ़ इलुन---फ़ इलुन---फ़ इलुन --- फ़ अ    [ आखिर का -ऐन- बसकून है]
212-- ---212------212---------2
[5] मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुअसक्किन महज़ूज़
फ़ अ लुन---फ़ अ लुन---फ़ अ लुन--- फ़ अ [ यहां आखिर का -ऎन- बसकून है]
22------------22--------22-----------2
इसकी मुज़ाअफ़ शकल भी मुमकिन है 
[7]      मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन मुज़ाअफ़
[फ़अ लुन---फ़ अ लुन]-----[फ़अ लुन---फ़अ लुन] // [फ़अ---फ़ अ लुन]----[फ़अ लुन---फ़अ लुन-]
 [22--112] ..-------------------.[22-22]-------// [22-12]--------------------[22-22]
ध्यान देने की बात है  फ़अ लुन = 2 2 = यहा -ऐन- साकिन है तभी तो -फ़े-[ मुतहर्रिक] के साथ मिल कर ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2] बना रही है और ’लुन’ [2] तो लुन ही है
फ़ अ लुन =[1 1 2]= यहां -ऐन मुतहर्रिक है अत: 1 का वज़न रख रही है और लुन के साथ मिल कर ’वतद -ए-मज़्मुआ ] [ 12 ] [हरकत+हरकत+साकिन] बना रही है
 
इस के अलावा ऐसे और भी बहुत से वज़न होते है जिसकी चर्चा पिछली बहर में मुनासिब मुक़ाम पर  कर चुका हूं} यहाँ पर दुबारा चर्चा करना न मुनासिब है न ज़रूरत है
-----------
खुदा ख़ुदा कर के , बहर-ए-मुतक़ारिब और मुतदारिक [5- हर्फ़ी बह्र] का बयान ख़त्म हुआ

अब अगले किस्त मे सुबाई बहर [7-हर्फ़ी] ’बह्र-ए-हज़ज" की चर्चा करेंगे

मुझे उमीद है कि मुतक़ारिब और  मुतदारिक के  मुज़ाहिफ़ बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

चन्द माहिया :क़िस्त 36



 चन्द माहिया : क़िस्त 36

:1:
दुनिया को दिखाना क्या !
दिल से नहीं मिलना
फिर हाथ मिलाना क्या !

:2:
कुछ तुम को ख़बर भी है
मेरे भी दिल में
इक ज़ौक़-ए-नज़र भी है

:3:
गुरबत में हो जब दिल
दर्द अलग अपना
कहना भी है मुश्किल

:4;
जितनी  भी हो अनबन
तुम पे भरोसा है
रूठो न कभी , जानम !

:5:
मेरी भी तो सुन लेते
मैं जो ग़लत होती
फिर जो भी सज़ा देते

शब्दार्थ :
ज़ौक़-ए-नज़र = रसानुभूति वाली दॄष्टि
गुरबत   में        = विदेश में /परदेश में


-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ :
ज़ौक़-ए-नज़र = रसानुभूति वाली दॄष्टि
गुरबत   में        = विदेश में


-आनन्द.पाठक-
08800927181

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

उर्दू बह्र पर एक बात चीत : क़िस्त 28 [बह्र-ए-मुतदारिक -3]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 28 [बह्र-ए-मुतदारिक-3]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

---फिछली 2-क़िस्तों से बहर-ए-मुतदारिक पर बहस चल रही है जिस में अब तक मुतदारिक की सालिम ,मुरब्ब: ,मुसद्दस,मुसम्मन और उसकी मुज़ाअफ़  बह्र की चर्चा कर चुके हैं। साथ ही इस पर लगने वाले तमाम मुमकिनात [संभावित] ज़िहाफ़ात की भी चर्चा कर चुके है। साथ ही  बहर-ए-मुतदारिक सालिम मक़्तूअ अल आखिर ,मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून पर भी चर्चा कर चुके हैं और एक दिलचस्प वाक़या भी बयान कर चुके हैं । परन्तु बहर-ए-मुतदारिक मख़बून की बहस ख़तम नहीं हुई थी। बहस जारी है -------
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़बून का वज़न है
फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्
 1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2  [ -ऐन-ब हरकत यानी मुतहर्रिक]
और कहा था कि ."तस्कीन-ए-औसत"  की अमल से और भी औज़ान [ वज़्न का जमा] बरामद किए जा सकते हैं जिसमे एक औज़ान दर्ज-ए-ज़ैल [ निम्न]  भी बरामद होगा

[क] फ़अ लन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्      [ -ऐन- ब सकून ]
   22-------- 22---------22----------22-   और इस बहर का नाम होगा  बह्र-ए--मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन"
एक उदाहरण लेते हैं

 रह जाता पर्दा उल्फ़त का 
पलकों ने छलकाए   आँसू
अब इसकी तक़्तीअ भी कर के देखते हैं
  2     2 /  2   2   /  2   2   /  2   2 = 22---22---22--22
 रह जा / ता पर् / दा  उल / फ़त का
2      2   /    2   2  / 2  2   / 2  2  = 22---22---22---22
पल कों /  ने छल  /का ए   /आँ सू
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़बून  मुज़ाअफ़ का वज़न है

फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्
 1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2-- 1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2
जैसा कि ऊपर कह चुके है [और पिछली किस्त में चर्चा भी कर चुके है ] कि इस मुज़ाहिफ़ बहर पर ’तस्कीन-ए-औसत ’ के अमल से अनेकानेक वज़न बरामद की जा सकती है जिसमें से एक वज़न निम्न्  भी होगी
फ़अ लुन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्    --फ़अ लुन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्        [ -ऐन- ब सकून ]
[ख]  22-----------22----------22--------22--------22-----------22---------22----------22
और इस बहर का नाम होगा ’बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन मुज़ाअफ़ ---इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ’ तस्कीन’ का अमल किस रुक्न या किस मुक़ाम पर किया गया है-ऐसी बह्र में ’तस्कीन’ का अमल किसी रुक्न पर.किसी मुक़ाम पर किया जा सकता है और यह जाइज भी है
और शायरी में ऐसी बह्र [16-रुक्नी] बह-ए-शिकस्ता भी होती है [ बह्र -ए-शिकस्ता पर किसी और मक़ाम पर तफ़्सील से चर्चा करेंगे]
अब एक दिलचस्प बात और ---चलते चलते--
जब बहर-ए-मुतक़ारिब के मुज़ाहिफ़ बहर की चर्चा कर रहे थे तो ऐसी ही शकल की बहर
22---22----22----22----22---22----- से साबका [सामना] हुआ था जिसे हम आप ’मीर’ की बहर कह कर आगे बढ़ गए थे । अब इन दोनो ’हम शकल बहर का ’तुलनात्मक अध्ययन" और उस में बुनियादी फ़र्क़ पर तफ़्सील अगले क़िस्त में पेश् करेंगे। सोसा छोड़ दिया है मैने यहाँ।

आज हम मुतदारिक की कुछ और मुज़ाहिफ़ बह्र की चर्चा करेंगे

[ग]  बहर-ए-मुतदारिक मुसद्दस  महज़ूज़ :  इस बहर की बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़अ
212-------212------2
हम जानते हैं कि
फ़ाइलुन [2 1 2] + हज़्फ़  = महज़ूफ़ ---फ़अ [2]  यहाँ -ऐन-बसकून है यानी साकिन है और चूँकि हज़फ़ एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र के ख़ास मुक़ाम ’अरूज़ और जर्ब" के लिए निर्धारित हैं
एक मिसाल [उदाहरण] लेते हैं [कुछ मिला नहीं तो ख़ुद साख़्ता (स्वयं का बनाया हुआ) ही कह दिया...कृपया मयार न देखियेगा ]

आप से क्या कहें हम
आँख मेरी है  क्यूँ नम ?

तक़्तीअ भी कर लेते है
2    1   2 /  2   1  2   / 2   =212--212--2
आ प से /  क्या क हें  /हम
2     1 2  / 2  1  2   / 2  = 212---212--2
आँ ख मे /री है  क्यूँ  /नम ?

[घ] बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन महज़ूज़ : इस बहर का बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ
212-------212-------212-----2

अपनी सूरत ज़रा तुम दिखा दो 
मेरे दिल की लगी को बुझा  दो

अब तक़्तीअ कर के देखते हैं
   2  1   2  / 2  1  2  / 2  1  2    / 2   =   212---212---212---2-
अपनी सू /रत ज़ रा /तुम दि खा /दो
2  1     2 /  2  1 2  /  2 1 2   / 2 = 212---212---212---2
मेरे दिल / की लगी /को बु झा  /दो

वही बात -यहाँ भी बह्र की माँग पर -नी- -रे-  पर की मात्रा गिरा कर इसे-1- के वज़न पर लिया गया है वरना तो ये -2- के वज़न पर के हर्फ़ हैं } अगर कहीं ज़रूरत पड़ी तो या कहीं बह्र की माँग हुई तो  इसे 2 के ही वज़न पर लेंगे
आप को इस वज़न पर और भी बहुत से अश’आर मिल जायेंगे .चाहें तो आप भी बना सकते है कोई शे’र या मिसरा।
चलिए एक और उदाहरण लेते हैं [ जनाब आरिफ़ ख़ान साहब के हवाले से]

नरम बिस्तर पे बे ख़्वाब था कल
आज सोता है जो पत्थरों  पर 

आप की तसल्ली के लिए ,इसकी भी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
  2    1    2  / 2  1  2 /   2  1  2 /  2 = 212---212---212--2
 नर म बिस/ तर पे बे /  ख़ा ब था /कल
2  1     2   /  2  1  2/   2  1   2   / 2 = 212---212---212--2
आ ज सो / ता है जो /  पत थ रों  / पर
यहाँ भी वही बात - -पे- -है-  पर मात्रा गिरा कर -1- की वज़न पर लिया गया है औए यह शायरी में जायज है।
इस बहर की मुज़ाअफ़ शकल  भी मुमकिन है

[च]  बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन महज़ूज़ मुज़ाअफ़   - इस बहर की बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ-//-फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ
212-------212-------212-----2// 212-------212-------212-----2
 इसकी भी एक मिसाल देखते है [ डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

मेरा वादा है तुझ से यह हमदम , आँधियाँ आए तूफ़ान आए
ज़िन्दगी की डगर में सदा मैं  ,साथ तेरा निभाता   रहूँगा

 अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते है
2  1   2/ 2 1  2   / 2 1  2  / 2  //     2 1 2 / 2 1 2 / 2 1 2    /2  = 212--212---212--2 // 212---212---212---2
मेरा वा/दा है तुझ /से ये हम/दम //, आँधियाँ /आए तू/ फ़ान आ /ए
 2   1   2 /   2  1 2  / 2 1 2 / 2 //  2 1 2   / 2 1 2 / 2  1  2 / 2 = 212---212---212-2 // 212--212---212--2
ज़िन्दगी  /की डगर /में सदा  /मैं  // ,साथ ते/ रा निभा /ता   रहूँ /गा

 अब यह मत पूछियेगा कि --रा---है---ये---ए-- को -1- की वज़न पे क्यूँ  लिया ?अब् आप् जान् गए होंगे
अच्छा .हम लोगो ने मुतदारिक की ---- मख़्बून मुज़ाहिफ़  और महज़ूज़ मुज़ाहिफ़ की चर्चा ऊपर कर चुके हैं और तस्कीन के अमल की भी चर्चा कर चुके है
अब ऐसे बह्र की चर्चा करेंगे जो एक साथ  मख़्बून भी हो और महज़ूज़ भी है

{ छ] मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन महज़ूज़--- इस बहर का बुनियादी वज़न है
 फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ         -[यहाँ भी-ऐन-बसकून है]        [
 22-------------22--------22--------2
एक उदाहरण देखते है [ आरिफ़ हसन खान साहब की किताब से]

मुझ में बस तू ही तू है
मैं तेरा आईना   हूँ 

इसकी तक़्तीअ भी कर लेते हैं
2      2  / 2   2/  2  2 / 2  22---22---22---2
मुझ में /बस तू  /ही तू /है
2   2  / 2  2/  2  2 / 2 22---22----22--2
मैं ते /रा आ /ई ना  /  हूँ

इस बहर की मुज़ाअफ़ शकल भी मुमकिन है
[ज]  मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन महज़ूज़ मुज़ाअफ़     इस बहर का बुनियादी वज़न है
 
 [ज] फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ  // फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ         -[यहाँ भी-ऐन-बसकून है]        [
 22-------------22--------22--------2   //   22-------------22--------22--------2

यह् बहर शिकस्ता भी है

एक उदाहरण देखते हैं

तुझ बिन घर का हर गोशा ,सूना सूना लगता है
अपना घर भी अब मुझको ,बेगाना सा लगता है

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
      22    /  2 2    /  2  2  / 2  // 2  2 / 2  2 /2  2     / 2  =   22---22---22---2//22 ---22---22--2
तुझ बिन / घर का /हर गो /शा //,सूना / सूना/ लग ता  /है
       2 2 /  2  2/  2    2    / 2 //  2 2  / 2 2 / 2    2  / 2 =22---22----22---2 // 22---22---22--2
 अपना /घर भी/ अब मुझ /को //,बे गा /ना सा/ लग ता /है

यूँ तो मुतदारिक पर दो ज़िहाफ़ के अमल से और भी वज़न बरामद किए जा सकते है मगर उन तमाम वज़न की ज़रूरत नहीं है
मानूस बहर की चर्चा कर चुका हूँ आप चाहे तो कोई ख़ास वज़न चुन कर शायरी कर सकते है /शे’र अश’आर कह सकते है जो वज़न और बहर से पाक होगी

यह बहस तो शायरी की आधी बहस ही चल रही है यानी अरूज़ की है वज़न की है बहर की है रुक्न-ओ-अर्कान की है
आधी बहस तो बलाग़त फ़साहत इल्म-ए-बयान की होती है } ख़ैर....
अगली क़िस्त में बहर-ए-मुतदारिक और बहर-ए-मुतक़ारिब पर तुलनात्मक अध्ययन पेश करेंगे


मुझे उमीद है कि मुतदारिक के इस मुज़ाहिफ़ बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
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