सोमवार, 17 जुलाई 2017

एक ग़ज़ल : दिल न रोशन हुआ----

एक ग़ज़ल :  दिल न रोशन हुआ-----

दिल न रोशन हुआ ,लौ लगी भी नही, फिर इबादत का ये सिलसिला किस लिए
फिर ये चन्दन ,ये टीका,जबीं पे निशां और  तस्बीह  माला  लिया किस लिए 

सब को मालूम है तेरे घर का पता ,हो कि पण्डित पुजारी ,मुअल्लिम कोई
तू मिला ही नहीं लापता आज तक ,ढूँढने का अलग ही मज़ा  किस लिए   

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ जाने कहाँ तक गईं ,लोग आने लगे बदगुमां हो इधर
यार मेरा अभी तक तो आया नहीं ,दिल है राह-ए-वफ़ा में खड़ा  किस लिए       

तिश्नगी सब की होती है इक सा सनम,क्या शज़र ,क्या बसर,क्या है धरती चमन 
प्यास ही जब नहीं बुझ सकी आजतक,फिर ये ज़ुल्फ़ों की काली घटा किस लिए 

बज़्म में सब तुम्हारे रहे आशना .  एक मैं ही रहा  अजनबी की तरह
वक़्त-ए-रुखसत निगाहें क्यों नम हो गईं,फिर वो दस्त-ए-दुआ था उठा किस लिए 

माल-ओ-ज़र ,कुछ अना, कुछ किया कजरवी, जाल तुमने बुना क़ैद भी ख़ुद रहा
फिर रिहाई का क्यूँ अब तलबगार है  ,दाम-ए हिर्स-ओ-हवस था बुना किस लिए   

तुम में ’आनन’ यही बस बुरी बात है ,प्यार से जो मिला तुम उसी के हुए
कुछ भी देखा नहीं ,क्या सही क्या ग़लत, प्यार में फिर ये  धोखा मिला किस लिए  

-आनन्द.पाठक-
08800927181
शब्दार्थ
तस्बीह = जप माला
मुअल्लिम= अध्यापक
निकहत-ए-ज़ुल्फ़= बालों की महक
तिशनगी  = प्यास
वक़्त-ए-रुखसत = जुदाई के समय
माल-ओ-ज़र  = धन सम्पति
अना = अहम
कजरवी =अत्याचार अनीति जुल्म
दाम-ए-हिर्स-ओ-हवस  = लोभ लालच लिप्सा के जाल

शनिवार, 15 जुलाई 2017

एक क़ता----

एक क़ता-----

भला होते मुकम्मल कब यहाँ पे इश्क़ के किस्से
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

पढ़ो ’फ़रहाद’ का किस्सा ,यकीं आ जायेगा तुम को
मुहब्बत में कभी ’तेशा’ भी बन कर मौत आती है

जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का ’आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको नीद आती है

-आनन्द.पाठक-
08800927181

रविवार, 9 जुलाई 2017

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल : कहने को कह रहा है----

एक  ग़ैर रवायती ग़ज़ल : कहने को कह रहा है-----

कहने को कह रहा है कि वो बेकसूर है
लेकिन कहीं तो दाल में काला ज़रूर है

लाया "समाजवाद" ग़रीबो  से छीन कर 
बेटी -दमाद ,भाई -भतीजों  पे नूर है

काली कमाई है नही, सब ’दान’ में मिला
मज़लूम का मसीहा है साहिब हुज़ूर है

ऐसा  धुँआ उठा कि कहीं कुछ नहीं दिखे
वो दूध का धुला है -बताता  ज़रूर  है

’कुर्सी ’ दिखी  उसूल सभी  फ़ाख़्ता हुए
ठोकर लगा ईमान किया चूर चूर  है

सत्ता का ये नशा है कि सर चढ़ के बोलता
जिसको भी देखिये वो सर-ए-पुर-ग़रूर है

ये रहनुमा है क़ौम के क़ीमत वसूलते
’आनन’ फ़रेब-ए-रहनुमा पे क्यों सबूर है ?

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ -
सबूर = सब्र करने वाला/धैर्यवान
सर-ए-पुर ग़रूर =घमंडी/अहंकारी