शनिवार, 30 जून 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 48

चन्द माहिया  : क़िस्त 48

:1:
क्यों दुख से घबराए
धीरज रख मनवा
मौसम है बदल जाए

:2:
तलवारों पर भारी
एक कलम मेरी
और इसकी खुद्दारी

:3:
सुख-दुख  जाए आए
सुख ही कहाँ ठहरा
जो दुख ही ठहर जाए

:4:
तेरी नीली आँखें
ख़्वाबों को मेरे
देती रहती साँसें

:5:
आजीवन क्यों क्रन्दन
ख़ुद ही बाँधा है
जब माया का बन्धन

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 23 जून 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 47

चन्द माहिया : क़िस्त 47
:1:
सब साफ़ दिखे मन से
धूल हटा पहले
इस मन के दरपन से
:2:
अब इश्क़ नुमाई क्या
दिल से तुम्हे चाहा
हर रोज़ गवाही क्या
:3:
मरने के ठिकाने सौ
दुनिया में फिर भी
जीने के बहाने सौ
:4:
क्या ढूँढ रहा ,पगले !
मिल जायेगा वो
मन तो बस में कर ले
:5:
जो देना ,दे देना
मेरी क्या चाहत
आँखों से समझ लेना
-आनन्द.पाठक

शुक्रवार, 25 मई 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 44


          :1:
खुद तूने बनाया है
अपना ये पिंजरा
ख़ुद क़ैद में आया है

:2:
किस बात का है रोना
छूट ही जाना है
क्या पाना,क्या खोना ?

          :3:
जब चाँद नहीं उतरा
खिड़की मे,तो फिर
किसका चेहरा उभरा

          :4:
जब तुमने पुकारा है
कौन यहां ठहरा
लौटा न दुबारा है

          :5:
हर साँस अमानत है
जितनी भी उतनी
उसकी ही इनायत है


-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

एक सूचना......

एक सूचना......

मित्रो !

----- कुछ महीनों के लिए यह हक़ीर ’अमेरिका-प्र्वास’ पर जा रहा है ।
चूँकि मैं अपनी ’लाइब्रेरी’ साथ में नहीं ले जा रहा हूँ ,अत: ’उर्दू बह्र पर एक बातचीत’ का यह सिलसिला कुछ महीनों के लिए स्थगित रहेगा ।
क्षमा प्रार्थी हूँ।
भारत में लौटने पर यह सिलसिला पुन: शुरू करुँगा।
सादर

-आनन्द.पाठक-

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 48 [ बह्र-ए-मदीद]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 48 [  बह्र-ए-मदीद]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

---पिछली क़िस्त में हम .बह्र-ए-बसीत की चर्चा कर चुके हैं ?अब हम बह्र-ए-मदीद की चर्चा करेंगे

बह्र-ए-मदीद भी एक मुरक़्क़ब बह्र है जो दो अर्कान से मिल कर बनता है
बह्र-ए-मदीद भी एक अरबी बह्र है जो उर्दू शायरी में भी मुस्तमिल है मगर उर्दू शायरी में यह बह्र इतनी प्रचलित नहीं है
इस बह्र में उर्दू शायरों ने बहुत कम शायरी की है । और की भी है तो मुसम्मन शकल मे ही ज़्यादा किया है।इस बह्र के बारे में जानने में कोई हर्ज भी नहीं है।हो सकता है आप में से ही कोई पाठक इस बह्र में शायरी करना शुरु कर दे
इस बह्र का बुनियादी रुक्न है ---
फ़ाइलातुन + फ़ाइलुन
2122 + 212   
मदीद की मानूस चन्द बह्रें
[1] बह्र-ए-मदीद मुसम्मन सालिम
फ़ाइलातुन---फ़ाइलुन--//-फ़ाइलातुन----फ़ाइलुन
2122--------212----//---2122--------212
 अरूज़ और ज़र्ब में फ़ाइलुन [212] की जगह इसका मज़ाल यानी फ़ाइलान [2121] भी लाया जा सकता है
यह बह्र-ए-शिकस्ता भी है
उदाहरण--आग़ा सादिक का एक शे’र है
किस का लुत्फ़-ए-बेकराँ कारफ़र्मा हो गया
ज़र्रा सहरा हो गया ,क़तरा दर्या    हो गया

अब तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
2      1     2   2   / 2  1  2// 2 1 2 2      / 2 1 2
किस का लुत फ़े / बे क राँ// कार फ़र् मा/हो गया
2    1    2   2  / 2 1 2 // 2    1  2   2  / 2 1 2
ज़र् र  सह रा/ हो गया //,क़त र: दर् या / हो गया

[2] ज़रा इस बह्र की मुरब्ब: सालिम मुज़ाइफ़ की भी चर्चा कर लेते है
इसकी मुरब: शक्ल होगी
फ़ाइलातुन----फ़ाइलुन
फ़ाइलातुन------फ़ाइलुन
यानी
2122---212
2122---212
और् यह भी सही है कि आखिर में यानी अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर फ़ाइलान [2121] भी लाया जा सकता है
अगर इस की यानी मुरब: की  मुज़ाइफ़ शकल लिखी जाय तो?[यानी मिसरा में 4-बार और शे’र में 8-बार]
फ़ाइलातुन---फ़ाइलुन --- फ़ाइलातुन---फ़ाइलुन
2122--------212---------2122------212

अरे यह तो बह्र-ए-मदीद की मुसम्मन सालिम वज़न हो गया
तो क्या यह बह्र-ए-मुरब: सालिम मुज़ाइफ़ है या बह्र-ए-मदीद मुसम्मन सालिम है?
जी हाँ ,दोनो हो सकता है । मगर दोनो में एक बुनियादी फ़र्क़ है
मुसम्मन सालिम में--मज़ाल [यानी फ़ाइलान 2121] सिर्फ़ अरूज़ और ज़र्ब पे लाया जा सकता है जो शे’र का आखिरी रुक्न होता है
मगर
मुरब्ब: सालिम मुज़ाइफ़ में मज़ाल [ फ़ाइलान 2121] शे’र के हस्व मुक़ाम [ दूसरा और छठा मुक़ाम] पर भी लाया जा सकता है --अरूज़ और ज़र्ब पर तो लाया ही जा सकता
ख़ैर

[3]  बह्र-ए-मदीद मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन----फ़ाइलुन---फ़ाइलातुन
2122---------212--------2122
अगर किसी बुनियादी रुक्न की बनावट A--B के फ़ार्म में हो तो इसकी मुसद्दस शकल A--B---A  की शकल में होगी
 उदाहरण - कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से

मैं हुआ बरबाद तो  ग़म नहीं है
आप की पुरसिश भी कुछ कम नही है
तक़्तीअ भी देख लेते हैं
2  1  2  2    / 2 1 2 / 2   1 2 2
मैं हुआ बर /बाद तो / ग़म नहीं है/
2   1  2   2  /  2     1   2     / 2  1  2 2
आप की पुर /सिश भी कुछ/ कम नही है

चलिए एक और आहंग देख लेते हैं
चलते चलते एक आहंग और देख लेते हैं
[4] बह्र-ए-मदीद मुसम्मन मक्फ़ूफ़
आप जानते है कि फ़ाइलातुन [2122] पर ’कफ़’ का ज़िहाफ़ लगाने से मक़्फ़ूफ़ फ़ाइलातु [ 2121 ] -ते- मुतहर्रिक हासिल होता है और
फ़ाइलुन [212] पर कफ़ का ज़िहाफ़ लगता ही नहीं तो बह्र-ए-मदीद मुसम्मन मक्फ़ूफ़ का आहंग होगा

फ़ाइलातु-----फ़ाइलुन---//---फ़ाइलातु-----फ़ाइलुन
2121---------212------//    2121 -------212
फ़ाइलुन [2 1 2 ] की जगह ’फ़ाइलान’ [ 2121] भी लाया जा सकता है
यह बह्र-ए-शिकस्ता भी है

उदाहरण अब्दुल हमीद ’अदम’ का एक शे’र है

कितनी दिल फ़रेब है ,कितनी बेमिसाल है
ज़िन्दगी भी आप के गेसुओं   का जाल  है

तक़्तीअ भी देख लेते हैं
2       1   2     1 / 212 //    2  1   2  1   / 2 1 2
कित नी दिल फ़/ रेब है // ,कित नी बे मि/ साल है
2       1  2  1  / 2 1 2 // 2 1 2     1    / 2 1 2
ज़िन द गी भी /आप  के// गेसुओं   का / जाल है

[5] बह्र-ए-मदीद मुसम्मन मख़्बून 
फ़ इला तुन---फ़ इलुन---// फ़ इला तुन---फ़ इलुन---
1122----------112----// 1122---------112
आप जानते हैं कि फ़ाइलातुन [2122] पर ख़ब्न का ज़िहाफ़ लगाने से फ़ इलातुन [  1122] हासिल होगा और फ़ाइलुन [212] पर लगाने से फ़इलुन [112] हासिल होगा
एक उदाहरण डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से देख लेते हैं

मुझे आँखों में बसा ,मुझे सीने में छुपा
मुझे पलकों पे सजा ,तेरा महबूब हूँ मैं

अब तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
1 1     2   2 / 1 1 2 // 1 1 2 2  / 1 1 2
मुझे आँखों /में बसा //,मुझे सीने /में छुपा

1  1  2    2   /  1 1 2 // 1 1  2 2   / 1 1 2
मुझे पल कों/ पे सजा //,तिरा महबू /ब हूँ मैं
 अब आप कहेंगे कि -"मुझे पलकों पर सजा---"पढ़ते तो क्या हो जाता ?
कुछ नहीं होता। मानी में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता --पर मिसरा बह्र से ख़ारिज हो जाता ] क्यों? आप बताएं क्यों?

ज़िहाफ़ के हिसाब से मदीद के और भी आहंग  मुमकिन हैं
बह्र-ए-मदीद का बयान खत्म हुआ
अब अगले क़िस्त में बह्र-ए-मुन्सरिह की चर्चा करेंगे
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर की इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

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-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 24 मार्च 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 47 [ बह्र-ए-बसीत]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 47 [ बह्र-ए-बसीत]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

--पिछली क़िस्त में हम बह्र-ए-तवील की चर्चा कर चुके हैं। अब बह्र-ए-बसीत की चर्चा करेंगे
यह भी एक अरबी बह्र है
इस बह्र का बुनियादी रुक्न " मुस तफ़ इलुन + फ़ाइलुन" है यानी [ 2212+212]-दो रुक्न के मेल से बनता है अत: मुरक़्क़ब बह्र है
इस बह्र की कुछ प्रचलित आहंग की चर्चा कर लेते हैं

[1] बसीत मुसम्मन सालिम
 मुसतफ़ इलुन ---फ़ाइलुन---मुसतफ़ इलुन---फ़ाइलुन
2212----------212---------2212---------212-
उदाहरण-
सफ़ी अमरोहवी का एक शे’र है

नाहक़ बला में पड़ा क्यों दिल तुझे क्या हुआ
काकुल की है यार में क्या तुझ को सौदा हुआ

तक्तीअ के के देख लेते
2   2    1 2   / 2 1 2 //  2  2   1 2  / 2 1 2
नाहक़ बला/  में पड़ा/  क्यों दिल तुझे /क्या हुआ
 2    2  1   2  /  2 1 2/  2    2    1    2  / 2 1 2
काकुल की है /यार में / क्या तुझ को सौ/ दा हुआ

यह बह्र -ए-शिकस्ता भी है
इस बह्र में अरूज़/ज़र्ब मे ’फ़ाइलुन’ [212] की जगह ’फ़ाइलान’ [2121] लाया जा सकता है

[ ऐसी मुरक़्क़ब बहर जो दो अर्कान A-B  से मिलकर बनती है उन की
मुसम्मन शकल होती है      A-B--A--B और
मुसद्दस शकल  होती है      A--B--A
अत: इस बह्र की मुसद्दस शकल भी मुमकिन है
यानी मुसतफ़ इलुन---फ़ाइलुन--मुसतफ़ इलुन [ 2212---212---2212

[2] बसीत मुसद्दस सालिम
मुसतफ़ इलुन----फ़ाइलुन----मुसतफ़ इलुन
  2212-------------212--------2212
यहाँ भी ,अरूज़/ज़र्ब में - मुस तफ़ इलुन की जगह -मुसतफ़इलान [22121] लाया जा सकता है
उदाहरण :कमाल  अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से

जब तक रहे साथ ग़म आया न पास
जब हम रहे दूर तो मुज़्तर  रहे 

[मुज़्तर = परेशान ,बेचैन]
अब तक़्तीअ क्र के देख लेते हैं
  2   2    1  2/ 2 1  2   / 2  2  1 2 [1]
जब तक रहे/ साथ ग़म /आया न पास
2      2    1 2/ 2 1  2  / 2 2    1 2
जब हम रहे / दूर तो / मुज़ तर  रहे

अरूज़ के मुक़ाम पर 22121 यानी मुस तफ़ इलान लाया गया है जो लाया जा सकता है
एक बात और
आप जानते है ’मुस तफ़ इलुन ’ [2212] बह्र-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न है और फ़ाइलुन [212] मुज़ाहिफ़ है -मरफ़ूअ’ है मुस तफ़ इलुन का । और यह मुज़ाहिफ़ सदर /इब्तिदा/ हस्व मे लाया जा सकता है -जो ज़ेर-ए-बहस रुक्न में आ भी गया है
तो क्या यह बसीत के बजाय ’रजज़’ की बहर है ?
जी हाँ ,यह बहर -रजज़ में भी आ सकती है } आहंग तो आहंग है---बसीत की आहंग हो या रजज़ की--क्या फ़र्क़ पड़ता है --शे’र या ग़ज़ल कहने में।

[3] बसीत मुसम्मन मख़बून
हम जानते है कि मुसतफ़इलुन [2212] का म्ख़्बून मुज़ाहिफ़ मफ़ाइलुन [1212] होता है जब कि फ़ाइलुन[212] का मख़्बून मुज़ाहिफ़ ’फ़अलुन’ [112] होता है
तो बसीत मुसम्मन मख़्बून का वज़न हो जायेगा
मफ़ाइलुन-------फ़अलुन---//--मफ़ाइलुन-----फ़अलुन
1212-----------112-------//----1212-------112-
उदाहरण

दिखा  दे शक ल ज़रा सनम बराए ख़ुदा
ये है सवाल मेरा गिला रहे न  ज़रा

तक़्तीअ भी देख लेते हैं
1   2   1   2    / 1 1 2 /  1 2 1 2 / 1 1 2
दिखा  दे शक /ल ज़रा /सनम बरा/ ए ख़ुदा
1   2  1 2  / 1 1 2/ 1 2 1 2  / 1  1 2
ये  है सवा/ ल मेरा / गिला रहे  / न  ज़रा

यह बह्र भी बह्र-ए-शिकस्ता है
इस बहर में भी अरूज़/ज़र्ब में  फ़अलुन [112] की जगह ’फ़इलान [1121] [-ऐन मुतहर्रिक] या फ़अ लान [2 2 1] [-ऐन बसकून]  भी कर सकते है

[4] बसीत मुसम्मन मुतव्वी सालिम मुतव्वी सालिम
 मुस तफ़ इलुन [2212] का तय्यी ज़िहाफ़ से  मुफ़ त इ लुन [2112] हो जाता है जिस की मुज़ाहिफ़ शकल को  ’मुतव्वी’ कहते है  और जिसमें [-ते- और -ऐन -मुतहर्रिक है ] यानी 2 1 12]
तो इस बहर के अर्कान हो जायेंगे
मुफ़ त इ लुन----फ़ाइलुन---//--मुफ़ त इ लुन-----फ़ाइलुन
2 1 1 2----------2 1 2----//---2  1  1  2--------212

अरूज़ और ज़र्ब में फ़ाइलुन [212] की जगह ’फ़ाइलान [ 2121] [यानी मज़ाल] भी लाया जा सकता है
उदाहरण
डा0 आरिह हसन ख़ान साहब के हवाले से

ये तो मेरे भाई हैं ,कैसे इन्हें छोड़ दूँ
अहल-ए-वतन फूँक दें,घर को ख़ुशी से मेरा

अब तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
2 1  1 2   /2  1 2 //  2 1 1 2 / 2 1 2
मुफ़ त इलुन/ फ़ाइलुन// मु त इलुन/ फ़ाइलुन
ये तो मिरे /भाइ हैं //,कै से इने /छोड़ दूँ

मुफ़ त इलुन/ फ़ाइलुन// मु त इलुन/ फ़ाइलुन
2  1       1  2   /  2 1 2 // 2 1  1    2   / 2 1 2
अहल-ए-वतन /फूँक दें,//घर को ख़ुशी/ से मिरे
यहाँ ध्यान दें  अह ले व तन= मुफ़ त [-ले-मुतहर्रिक] व तन [ इलुन]  हैं  यानी मुफ़ त इ लुन [2112] है
बाक़ी इसी तरह आप और हर्फ़ भी  समझ सकते हैं

यह भी बह्र-ए-शिकस्ता है
इस बह्र की मुसद्दस शकल भी हो सकती है
[5]  बसीत मुसद्दस मुतव्वी सालिम मुतव्वी
    अर्कान बहुत सीधा है 
मुफ़ त इ लुन----फ़ाइलुन-----मुफ़ त इ लुन
2 1 1 2----------2 1 2-------2  1  1  2
उदाहरण
देख के तुझ को परी एक ज़री
हो गई मुझ को वहीं  बेख़बरी

अब तक़तीअ भी देख लेते है
2 1  1  2 --/   2 1 2  / 2 1 1 2
देख के तुझ/  को परी /एक ज़री
2   1 1  2   / 2 1 2  /  2 1 1 2
हो गई मुझ /को वहीं /  बेख़बरी


अगर ध्यान से देखें तो बह्र-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न ’मुस तफ़ इलुन’[2212] है  और इसका मुतव्वी मुज़ाहिफ़ शकल मुफ़ त इ लुन [ 2 1 1 2 ] होता है [जिसमें  -ते-और -एन- मुतहर्रिक है] और फ़ाइलुन [212] मरफ़ूअ’ है मुस तफ़ इलुन का
तो हम कह सकते है कि यह कोई रजज़ की बहर है जिसमे दो ज़िहाफ़ -तयी का और रफ़अ’ का ज़िहाफ़ लगा हुआ है तो इस का नाम --"बह्र-ए-रजज़ मुसद्दस मुतव्वी मरफ़ूअ’ मुतव्वी " भी हो सकता है । जी हाँ बिल्कुल सही। बिलकुल हो सकता है
मगर क्लासिकल अरूज़ में इसे बह्र-ए-बसीत’ के अन्तर्गत ही लिया गया है । आप चाहे तो बह्र-ए-रजज़ के अन्तर्गत भी ले सकते है। क्या फ़र्क़ पड़ता है आहंग तो आहंग है ।आप यहाँ कहें या वहाँ कहें

[6]बसीत मुसद्दस मख़्बून सालिम मख़्लूअ’

हम जानते है कि मुस तफ़ इलुन [2212] पर ’ख़लअ’ का ज़िहाफ़ लगाया जाय तो बरामद होगा  मुज़ाहिफ़ ’फ़ऊलुन [122] जो मख़्लूअ’ कहलाता है
और अर्कान होंगे
मफ़ाइलुन----फ़ाइलुन---फ़ ऊलुन
1212----212----------122
उदाहरण:- इसका भी एक उदाहरण कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से देखते हैं

नज़ारा हो लाख ख़ूबसूरत
नज़र नहीं है तो कुछ नहीं है

[क्या कमाल का खुश आहंग शे’र है]

तक़्तीअ कर के देख लेते है
1 2  1   2  / 2 1  2  / 1 2 2
नज़ा र: हो / लाख ख़ू/ ब सूर त
1 2   1 2  / 2  1   2     / 122
नज़र नहीं/  है तो कुछ/ नहीं है

न ज़र = मफ़ा
न ही= इलुन
चूँकि मुरक्क़ब बह्रें दो या तीन ’सालिम’ बहरों के मेल से बनती है अत: ये सालिम बहरें[ कुछ शर्तों के साथ ] अपनी अपनी ज़िहाफ़ ले सकती है अत: कई आहंग बरामद किए जा सकते है--यह आप के मेहनत और ज़ौक़-ओ-शौक़ पर निर्भर करेगा
यहाँ उन तमाम मुमकिनात बहूर की चर्चा नहीं कर रहे हैं -मुनासिब भी नही मगर आप मश्क़ जारी रख सकते हैं
बह्र-ए-बसीत का बयान ख़त्म हुआ
अगली क़िस्त में हम  बह्र-ए-मदीद की चर्चा करेंगे
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर की इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

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-आनन्द.पाठक-










गुरुवार, 15 मार्च 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 46 [ बह्र-ए-तवील ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत  : क़िस्त 46 [ बह्र-ए-तवील ]

मुन्फ़र्द बह्रें या सालिम बह्रें = इन 7-बह्रों पर क़िस्त 1-से लेकर क़िस्त 44 तक चर्चा कर चुके हैं 
आप चाहें तो एक बार देख सकते हैं 

1 मुतक़ारिब =फ़ऊलुन =122

2 मुतदारिक = फ़ाइलुन =212

3 हज़ज  = मफ़ाईलुन =1 2 2 2

4 रजज़  =मुस तफ़ इलुन =2 2 1 2

5 रमल  =फ़ाइलातुन = 2 1 2 2

6 वाफ़िर  = मफ़ा इ ल तुन = 12 1 1 2

7 कामिल   = मु त फ़ालुन = 1 1 212

अब मुरक़्क़ब बह्रों पर एक एक कर के चर्चा करेंगे 
------------------------------------------------
1 तवील  =फ़ऊलुन+ मफ़ाईलुन  

2 बसीत  = मुस तफ़ इलुन+ फ़ाइलुन 

3 मदीद  =फ़ाइलातुन+फ़ाइलुन  

4 मुन्सरिह = मुस तफ़ इलुन+ मफ़ऊलातु 

5 मुज़ारे  =मफ़ाईलुन +फ़ाअ’लातुन        

6 मुक़्तज़िब = मफ़ऊलातु+ मुस तफ़ इलुन 

7 मुजतस  = मुस तफ़अ’ लुन+ फ़ाइलातुन+फ़ाइलातुन  

8 सरीअ’  = मुस तफ़ इलुन+मफ़ऊलातु 

9 जदीद  =फ़ाइलातुन+फ़ाइलातुन+ मुस तफ़अ’ लुन  

10 क़रीब  = मफ़ाईलुन+मफ़ाईलुन+फ़ाअ’लातुन   

11 ख़फ़ीफ़  = फ़ाइलातुन+ मुस तफ़अ’ लुन+ फ़ाइलातुन  

12 मुशाकिल = फ़ाअ’लातुन+मफ़ाईलुन +मफ़ाईलुन     
------------------------

अब  हम बह्र-ए-तवील  की चर्चा करेंगे
बह्र-ए-तवील का बुनियादी रुक्न है --" फ़ऊळुन+मफ़ाईलुन ’= 122+ 1222
बह्र-ए-तवील के 3-4 बह्र ही उर्दू शायरी में राइज हैं 

[क] बह्र-ए-तवील सालिम मुसम्मन 

फ़ऊलुन---मफ़ाईलुन-----फ़ऊलुन---मफ़ाईलुन
122--------1222---------122-------1222
उदाहरण -अब्दुल अज़ीज़ ’ख़ालिद’ साहब का एक शे’र है

मुझे इल्म है जानाँ इन इस्रार पर्चीं का
कि यह एक पर्दा है तेरे इश्क़ रंगीं  का

अब तक़्तीअ क्र के भी देख लेते हैं
फ़ऊलुन  / मफ़ाईलुन/ फ़ऊलुन  / मफ़ाईलुन
122-----/1222----/ 122-----/ 1 2 2   2
मुझे इल् / म है जानाँ / इ निस रा/ र पर चीं का  [ अलिफ़ का वस्ल हो गया ]

फ़ऊलुन  / मफ़ा ईलुन    / फ़ऊलुन / म फ़ा ईलुन
122-----/1222------/   1  2  2  /   12  2  2
कि यह ए/ क पर दा है / ति रे इश् /क रंगीं  का

[ख] तवील मुसम्मन सालिम मक़्बूज़ सालिम मक़्बूज़ 

फ़ऊलुन--मफ़ाइलुन---फ़ऊलुन--मफ़ाइलुन
122--------1212------122------1212
आप जानते हैं कि ’मफ़ाईलुन’  1222 [हज़ज]  का मक़्बूज़ मुज़ाहिफ़ शकल ’मफ़ा इलुन [1212] होता है 
उदाहरण  नसीम लखनवी का एक शे’र है

मुहब्बत रक़ीब से , अदावत नसीम से
किसी पर इनायतें .किसी पर ये शिद्दतें

तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1 2  2   / 1 2 1 2 /      122    / 1212
मुहब्बत /रक़ीब से / , अदावत /नसीम से
1  2    2    / 1 2 1 2 / 1 2  2  / 1  2   1 2
किसी पर / इनायतें ./ किसी पर / ये शिद् द ते

[ग] तवील मुसम्मन सालिम मक़्बूज़ सालिम  मक़्बूज़ मुसब्बीग़
 आप जानते है है कि मफ़ाईलुन [1222] का  [क़ब्ज़+ तस्बीग़] ला ज़िहाफ़ लगाने से मक़्बूज़ मुसब्बीग़ मुज़ाहिफ़ ’ मफ़ाइलान ’ 12121 हासिल होता है
तो रुक्नी शकल होगी
 फ़ऊलुन----मफ़ाइलुन-----फ़ऊलुन--- मफ़ाइलान
122----------1212--------122--------12121
यह आहंग ग़ैर मानूस भी है और ग़ैर मामूली भी है

[घ] तवील मुसम्मन मक़्बूज़ अल आखिर
 फ़ऊलुन---मफ़ाईलुन---फ़ऊलुन---मफ़ाइलुन
122----------1222-------122-----1212
उदाहरण :- डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

करें शम्मअ’ एक रोशन चलो इल्म की नई
उठो क़ौम की ख़ातिर करें हम भी कुछ न कुछ

 तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1 2  2    / 1 2     2  2 / 1 2  2   / 1 2 1 2
करें शम्/म इक रोशन /चलो इल् /म की नई
1   2   2  / 1  2   2   2   / 1 2 2    / 1  2  1   2
उठो क़ौ / म की ख़ातिर / करें हम / भी कुछ न कुछ

आप जानते हैं कि ’मफ़ाईलुन 1222[हज़ज] का महज़ूफ़ - फ़ऊलुन [1 2 2] होता है ।इस बात का जिक्र हज़ज के ज़िहाफ़ात के वक़्त किया था और यह भी कहा था कि यह हज़ज में सिर्फ़ ’अरूज़’ और ज़र्ब’ के मक़ाम पे आता है । मगर बह्र-ए-तवील में यह ’सदर और इब्तिदा के मुक़ाम पर आता है ।तवील-की बुनियादी रुक्न की संरचना ही ऐसी है । हस्व के मुक़ाम या अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर मुफ़ाईलुन -1222 आता है तो इस पर कब्ज़ या तस्बीग़ का या कोइ और ज़िहाफ़  लग सकता है और कई नये आहंग बनाए जा सकते हैं  ।

एक बात और
यदि तवील के बुनियादी रुक्न " फ़ऊलुन + मफ़ाईलुन "[ 122 +1222} को आपस में बदल दिया जाय-यानी मफ़ाईलुन+ फ़ऊलुन [ 1222+122] कर दिया जाय तो ?
कुछ लोगों ने इस का नाम ’बह्र-ए-अरीज़’ कहा है ।यह बह्र उर्दू शायरी में प्रचलित नहीं है

चलते चलते---
इस बह्र को ’तवील’ [ लम्बी बह्र] क्यों कहते हैं -इस बात का कोई सन्तोषजनक जवाब  कहीं लिखा नहीं मिला। अगर आप को मालूम है तो ज़रूर बताइएगा।
अस्तु
अगले क़िस्त में बह्र-ए-बसीत पर चर्चा करेंगे

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर की इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

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-आनन्द.पाठक-