शनिवार, 9 दिसंबर 2017

उर्दू बहर् पर् एक् बातचीत् : किस्त 37 [बह्र-ए-रमल की मुज़ाहिफ़ बह्रें]

उर्दू बहर् पर् एक् बातचीत्  : किस्त 37 [बह्र-ए-रमल की मुज़ाहिफ़ बह्रें]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है

पिछले क़िस्त में हम रमल की सालिम बह्रों [मुरब्ब: मुसद्द्स मुसम्मन] पर चर्चा कर चुके है
अब हम इस क़िस्त में बहर-ए-रमल की मुज़ाहिफ़ शकल पर चर्चा करेंगे

आप जानते है कि बह्र-ए-रमल की बुनियादी रुक्न ’ फ़ाइलातुन ’[2122] है और यह एक सालिम रुक्न है जो [सबब्+वतद+सबब] के संयोग से बना है और आप यह भी जानते हैं कि ’ज़िहाफ़’ हमेशा सालिम रुक्न पे ही लगता है [दर अस्ल सालिम रुक्न के ज़ुज़ [अवयव] पर लगता है। और यह ज़िहाफ़ या तो मुफ़र्द [एकल] होगा  या मुरक़्क़ब [मिश्रित] । ’फ़ाइलातुन’[ 2122]  पे लगने वाले ऐसे ज़िहाफ़ात की संख्या तक़रीबन 25 के आसपास बैठती है। यहां सभी ज़िहाफ़ पे चर्चा करने करने की आवश्यकता नहीं है , हम मात्र  उन्ही ज़िहाफ़ात् की चर्चा करेंगे जो उर्दू शायरी में मक़्बूल हैं और शायरों ने और उस्ताद शायरों ने अपने कलाम कहे हैं जिससे आम पाठकों को समझने में सुविधा हो।
एक बात और

ज़्यादातर शायरों ने मुसद्दस मुसम्मन और उसकी मुज़ाहिफ़ शकल में ही शायरी की है । मुरब्ब: में बहुत ही कम अश’आर कहें है । इतने कम कहे गये हैं कि उदाहरण देना /बताना/समझाना भी मुश्किल हो जाता है। सच तो यह है कि छोटी बहर मैं  ग़ज़ल या अश’आर कहना निहायत मुश्किल का काम है ,फ़न-ए-शायरी पर निर्भर करेगा ,आप के हुनर-ओ-कमाल पर निर्भर करेगा ।अगरचे  कुछ लोगो  ने 1-2 शे’र कह कर तबअ आजमाई की है ,मगर बहुत कम -आंटे में नमक के बराबर। अच्छे शायरों ने  [जैसे मीर ग़ालिब इक़बाल ज़ौक़ वग़ैरह] ज़्यादातर अश’आर या तो मुसद्दस में या मुसम्मन में या उनकी  मुज़ाहिफ़ बहर में ।  अरूज़ियों ने भी समझाने के लिये कुछ खुद्साख्ता [ खुद के बनाई हुए ]  शे’र] कहे है । अगर नौ-मश्क़ [ नवोदित ] शायर अगर मुरब्ब: में अश’आर नहीं कहेंगे तो फिर मुस्तकबिल [भविष्य ] में  ऐसे अश’आर तो फिर अरूज़ की किताबों में ही मिलेंगे ।
ख़ैर  academic discussion हेतु इस पर चर्चा करने में कोई हर्ज तो नहीं।-मुमकिन हो तो-अश’आर आप कहते चलें -तक़्तीअ हम करते चलेंगे।
फ़ाइलातुन [2122] पर लगने वाले कुछ  ज़िहाफ़ात हैं----

फ़ाइलातुन[2122]   +ख़ब्न  =मख़्बून=फ़इलातुन [1122] -ऐन- मुतहर्रिक है
फ़ाइलातुन[2122]   + क़स्र =मक़्सूर=फ़ाइलान  [2121]
फ़ाइलातुन[2122]   + कफ़ =मकफ़ूफ़=फ़ाइलातु  [2121]       -ऐन- और -तु- मुतहर्रिक है
फ़ाइलातुन [2122]  + हज़्फ़      = महज़ूफ़=फ़ाइलुन [212]
फ़ाइलातुन[2122]    + शकल =मश्कूल=फ़इलातु [ 1121]
फ़ाइलातुन[2122] +ख़ब्न+हज़फ़= मख़्बून महज़ूफ़=फ़इलुन  [ 112]        -ऐन- मुतहर्रिक है
फ़ाइलातुन[2122]+ख़ब्न+क़स्र   = मख़्बून मक़्सूर =फ़इलान  [1121] -ऐन- मुतहर्रिक है

ज़िहाफ़ ख़ब्न’-- क़स्र--कफ़---हज़्फ़---शकल---आदि पर पहले ही चर्चा कर चुके है [ चाहें तो आप एक बार देख सकते हैं
इसके अलावा 2-4 ज़िहाफ़ और भी हैं जो ’फ़ाइलातुन’[2122] पर लगते है  जैसे त’श्शीस---[तश्शीस+तसब्बीग़]---बतर---वग़ैरह ।तवालत [ विस्तार] से बचने के लिये .यहाँ हम उस पर चर्चा नहीं कर रहे हैं इतने से ही हमारा और आप का काम चल जायेगा
मगर हाँ . मुज़ाहिफ़ रुक्न जो ऊपर बरामद हुई है उन में से कुछ  पर ’तस्कीन-ए-औसत’ का अमल भी लग सकता है । तस्कीन का अमल सिर्फ़ ’मुज़ाहिफ़ रुक्न’ पर ही लगता है --सालिम रुक्न पे नहीं । ये बात तो आप जानते ही होंगे
तस्कीन -ए-औसत के अमल की चर्चा तो गुज़िस्ता अक़सात [ पिछली क़िस्तों में ] कर चुका हूं पर आप  याद दिहानी के लिए मुख़्तसरन [संक्षेपत:] एक बार फिर कर देता हूं
’अगर किसी मुज़ाहिफ़ रुक्न में 3-मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ आ जायें तो तस्कीन-ए-औसत की अमल से ’बीच वाला मुतहर्रिक हर्फ़’ साकिन हो जाता है  जिससे मज़ीद [अतिरिक्त वज़न] बरामद हो सकती है। जैसे  फ़इलातुन1122]---फ़ इलुन[112]--फ़इलान [112] ,
जो तसकीन के अमल से हो जायेगा
फ़इलातुन1122] = फ़अ  ला तुन = 2 2 2 जिसको बदल लेते है =मफ़ ऊ लुन

अब आप के मन में एक सवाल ज़रूर उठ रहा होगा कि ये अर्कान को किसी दूसरे अर्कान से क्यों बदल लेते हैं और क्यों बदले? इसमें क्या बुराई है ? न बदलें तो क्या होगा?
कुछ नहीं होगा जब तक आप शे’र के वज़न का पास रखते हैं तो आप चाहें फ़अ ला तुन [222] रखें या मफ़ ऊ लुन [222]---कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
मगर अरूज में   रुक्न को ’फ़ेल’ भी कहते है और अर्कान को अफ़ाइल या तफ़ाइल भी कहते है ] कारण कि  ’फ़ेल’ में या  हर रुक्न में  [ उर्दू के 3-हर्फ़ ---फ़े,---ऐन---लाम -में से 2-हर्फ़ ][फ़े अ ल]-ज़रूर आते हैं । अत: उन तमाम मुज़ाहिफ़ शकल को  मानक ’रुक्न’ से बदल लेते है जिसमें रुक्न के ये 3- हर्फ़ में से 2-ज़रूर आए  जिस से रुक्न की ’मानकता’ बनी रहे।
ख़ैर--
एक बात और
जिहाफ़ ’ख़ब्न’ -एक आम ज़िहाफ़ है जो शे’र के किसी मुक़ाम पर आ सकता है जब कि हज़्फ़ और  क़स्र ,शे’र के अरूज़ और ज़र्ब मुक़ाम के लिए मख़्सूस है। बस याद दिलाने के लिए लिख दिया यानी जब मुज़ाहिफ़ बहर मैं ’ख़ब्न’ भी हो और ह्ज़्फ़ या क़स्र ज़िहाफ़ भी हो तो लाजिमन अरूज़ या ज़र्ब के मुक़ाम पर महज़ूफ़/मक़्सूर ही आयेगा --मख़्बून तो नहीं आ पायेगा । ख़ैर !
इन ज़िहाफ़ात पर चर्चा करने से पहले -एकऔर बात पे चर्चा करना ज़रूरी समझता हूँ
रमल  की बुनियादी रुक्न ’फ़ाइलातुन’ [ फ़े,अलिफ़,ऐन,लाम,अलिफ़,ते,नून] [2122 ]  है । उर्दू रस्म उल ख़त [लिपि]  मे यह दो-प्रकार से लिखी जा सकता है
[1] एक तो वह जो सामान्यतया कुछ हर्फ़ को ’मिला कर’ [सिलसिलेवार] लिखते है -जिसे ’मुतस्सिल शकल’ कहते है जिसमें [फ़ा,इला,तुन] लिखते है और इसका वज़न 2122 होता है- [जिस में "इला’ वतद-ए- मज्मुआ वाली शकल में होती है]
[2] दूसरी शकल वो जिसमें कुछ हर्फ़ को ’फ़ासिला’ देकर लिखते हैं जिसे ’मुन्फ़सिल शकल’ कहते है जिसमें [फ़ाअ, ला तुन] लिखते है और इसका भी वज़न  21 2 2 ही होगा --      [ जिस में "फ़ाअ"-वतद-ए-मफ़रूक़ वाली शकल में होता है]
तो?
तो कुछ नहीं। पहले केस में ’इला’ [ हरकत+हरकत+साकिन ] -वतद-ए-मज्मुआ है -यानी दो-हरकत की जमा है तभी तो मज्मुआ कहलाती है
दूसरे केस में "फ़ा अ’ [ऐन मुतहर्रिक है]  यानी [ हरकत+साकिन+हरकत ] -वतद -मफ़रूक़ी है यानी दो हरकत की स्थिति में ’फ़र्क़’ है तभी तो ’मफ़रूक’ कहलाता है
दोनो ही केस में वज़न 2122 ही रहेगा----इसी लिए मैं बार बार कहता हूँ कि ये 1222 ,2122 जैसी अलामत अफ़ाइल समझने में बहुत दूर तक नही ले जाती है  । ख़ैर कोई बात नहीं
हमने इसकी चर्चा यहाँ क्यों की?
इसलिए किया कि कुछ मुरक्कब बहरों में [यही मुन्फ़सिल शकल का इस्तेमाल होता है -जैसे बह्र-ए-मज़ारिअ में ,बहर-ए-क़रीब में,बहर-ए-मशाकिल में, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे]
और आप जानते है कि ’वतद-ए-मज्मुआ ’ पर लगने वाले ज़िहाफ़ अलग होते हैं
और ’वतद-ए-मफ़रूक़’  पे लगने वाले वाले ज़िहाफ़ अलग होते है
यानी जिन ज़िहाफ़ की चर्चा हम बहर-ए-रमल में करेंगे ,वही के वही ज़िहाफ़ ’मज़ारिअ.---क़रीब---मशाकिल में नहीं लगेंगे। इसका पास [ख़याल] रखना होगा आप को -जब इन मुरक्कब बहर पे ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे ।

अभी यहाँ  बहर-ए-रमल की मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे---

1-बहर-ए-रमल की मुरब्ब: मुज़ाहिफ़ बहरें:- बहर-ए-रमल की सालिम बहर [मुरब्ब:--मुसदस---मुसम्मन] पर चर्चा पिछले क़िस्त में कर चुका हूँ ] अब इसकी मुज़ाहिफ़ बहर पे चर्चा करेंगे
[1]  बहर-ए-रमल मुरब्ब: महज़ूफ़
फ़ाइलातुन----फ़ाइलुन
2122----------212
उदाहरण- आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से
आरज़ू में  आप की
दिल में क्या क्या गुल खिले

मैं नहीं समझता कि अब आप को इसकी तक़्तीअ करने की ज़रूरत पड़ेगी ।फिर भी--आ[ एक बार चेक कर लीजियेगा
2122       /212
आरज़ू में  /आप की
2     1   2     2   /2   1  2
दिल में क्या क्या / गुल खिले

[2[      बहर-ए-रमल मुरब्ब: मक़्सूर
फ़ाइलातुन------फ़ाइलान
2122-----------2121
[नोट- शे’र में महज़ूफ़ [क] की जगह मक़्सूर[ख] लाने की इजाज़त है]
एक उदाहरण इस का भी देख लेते हैं
जब से रूठा है वो यार
दिल है मेरा बेक़रार 
एक बार तक़्तीअ भी देख लेते हैं
2     1   2  2  / 2 1 2 1
जब से रूठा / है वो यार
2    1   2 2   / 2 1 2 1
दिल है मेरा   /बेक़रार
आप चाहें तो मिसरा उला को
"जब से रूठा मेरा यार" ---भी कह सकते है---वज़न बराबर रहेगा

[3]  बहर-ए-रमल मुरब्ब: मक़्लूअ 
फ़ाइलातुन-------फ़अ लुन
2122------------22
उदाहरण-कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से एक शे’र देखते है
जल्वा महफ़िल में है
आइना दिल में है 
यानी
2    1   2     2     / 2 2
जल् व मह फ़िल / में है
2 1  2    2         / 2 2
आइना दिल     / में है

[4] बहर-ए-रमल मुरब्ब: मक़्लूअ मुसब्बीग़
फ़ाइलातुन-------फ़अ लान
2122-----------221
[नोट- शे’र में मक़्लूअ [3] की जगह मक़्लूअ मुसब्बीग़ [4] लाने की इजाज़त है]
यहां एक नया ज़िहाफ़ ’क़ल्अ’ [ मुज़ाहिफ़ को मक़्लूअ कहते हैं] आ गया । शायद इस पर मैं चर्चा ’ज़िहाफ़ात ’ वाली क़िस्त में कर चुका हूँगा। चलिए एक बार मुख़्तसर गुफ़्तगू इस पर की कर लेते हैं -आप की याद दिहाने के लिए
अगर किसी सालिम रुक्न के दर्मियान  कोई वतद मज्मुआ आ जाए तो  -वतद-ए-मज्मुआ को गिरा देने के अमल को -’क़लअ ’ कहते है और जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होती है उसे -’मक़्लूअ’ कहते है [ जैसे फ़ा इला तुन में ]
’इला’ वतद-ए-मज्मुआ है और इत्तिफ़ाक़न रुक्न के दर्मियान [बीच में ] भी है अत: वतद को गिरा दें तो बचेगा -’फ़ा तुन’ [2 2] जिसे ]-फ़अ-लुन’ [2 2] से बदल लिया [-ऐन- साकिन है यहां]
उदाहरण -
एक तमाशा या जुल्म
रक़्स-ए-बिस्मिल में है
यानी
2     1  2 2        / 2  2    1
इक  तमाशा       /या जुल् म
2    1    2       2  /  2 2
रक़् स-बिस् मिल/ में है


[5] बहर-ए-रमल सालिम मख़्बून मुरब्ब: 
फ़ाइलातुन----फ़इलातुन
2122---------1122
उदाहरण
" काम की बात करो तुम
मुझ से मत हाथ करो तुम
ज़रा तक़्तीअ भी देख लेते है
                 2  1  2  2   / 1 1 2 2
" काम की बा  /त क रो तुम
  2      1  2   2/ 1 1 2  2
 मुझ से मत हा /त करो तुम
[5-क]  इस बहर में ’फ़ इ ला तुन"[1122] की जगह फ़इ ल्ल्यान [ 11221] लाया जा सकता है
उदाहरण
हुस्न इतना जो मिला यार
कुछ तो ख़ैरात करो तुम
यानी
2     1   2  2   / 1  1  2  2 1
हुस् न  इत ना / जो मिला यार
2      1   2  2   / 1 1 2  2
कुछ तो ख़ै रा  / त करो तुम

{6] बहर-ए-रमल मुरब्ब: मख़्बून
फ़इलातुन----फ़इलातुन
1122---------1122
आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से
उदाहरण
मुझे यादों में बसा लो
मेरे हमदम ,मेरे हमदम
तक़्तीअ
11  2   2   / 1  1 2  2
मुझे यादों  / में ब सा लो
1  1  2  2 /   1 1  2 2
मेरे हम दम /,मेरे हम दम

[7]  बहर-ए-रमल मश्कूल सालिम मुरब्ब:
फ़इलातु------फ़ाइलातुन
1121---------2122
उदाहरण [आरिफ़ खान साहब के हवाले से]

यही ज़िन्दगी जहन्नुम
यही  जिन्दगी है जन्नत
यानी
1  1  2  1  / 2  1   2   2
यही ज़िन् द /गी  ज ह् न नुम
1   1   2 1  / 2  1   2    2
यही  जिन् द/गी है  जन् नत

[8] बहर-ए-रमल मुरब्ब: मश्कूल  मुसब्बीग़ 
फ़ इलातु--------फ़ाइल् य्यान
1121----------21221

उदाहरण आप बताएं -एक कोशिश तो करें।
-----------------------------------------------
अब ज़रा बहर-ए-रमल मुसद्दस मुज़ाहिफ़ बहरों---पर भी चर्चा कर लेते हैं---- मुसद्दस सालिम बहर की तो चर्चा पिछले क़िस्त में कर चुका हूँ । अब मुज़ाहिफ़ शकल पर चर्चा करते हैं
[9] बहर-ए-रमल मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन---फ़ाइलुन
2122---------2122-------212
मीर का एक शे’र है

ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
दिल के जाने का निहायत ग़म  रहा

इशारा मैं कर दे रहा हूँ --तक़्तीअ  आप कर लें
2    1  2  2   / 2    1      2   2/ 2 1 2
ग़म रहा जब / तक कि दम में /दम रहा
2     1   2  2  /  2 1 2  2     / 2  1  2
दिल के जाने / का निहायत    /ग़म  रहा

इसी बहर में मीर का दूसरा भी शे’र सुन लें

इब्तिदा-ए-इश्क़ है ,रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता  है क्या
तक़्तीअ आप कर लें -इशारा मैं कर देता हूँ
2   1   2   2  / 2   1   2   2  / 2  1  2
इब् ति दा-ए-/ इश् क़ है ,रो /ता है क्या  [ रोता है क्या -में ’है’ की मात्रा गिरी हुई है -मगर शे’र बुलन्दपाया है\
2  1   2  2 / 2 1 2 2   /  2  1  2
आगे आगे /देखिए हो   /ता  है क्या [यहां पहले ’आगे’ में -गे- पर मात्रा गिरी हुई है -जिसकी इजाज़त भी है]

[10]  बहर-ए-रमल मुसद्दस मक़्सूर
फ़ाइलातुन------फ़ाइलातुन---फ़ाइलान
2122---------2122---------2121
उदाहरण --मीर के शे’र क जो उदाहरण ऊपर दिया है ,उसी गज़ल का मक़्ता है
सुब ह-ए-पीरी शाम होने आई ’मीर’
तू न चेता यां बहुत दिन कम रहा

तक़्तीअ आप कर लें--इशारा मैं कर देता हूं-
2     1      2 2 /  2 1  2 2 /  2 1  2 1
सुब ह-ए-पीरी/ शाम होने / आ इ ’मीर’
2  1   2 2 / 2 1  2   2      / 2  1  2
तू न चेता  /यां ब हुत दिन  /कम रहा
[नोट - बहर [9] और [10] ---महज़ूफ़ [212] की जगह मक़्सूर [2121] लाया जा सकता है और इसकी इजाज़त है -जैसा मीर ने किया भी है ।मगर शे’र की बहर का नाम निर्धारण ’मिसरा सानी’ मैं कोन सी बहर प्रयुक्त हुई है-उस से निर्धारित होगी
यानी आप ने अगर मिसरा सानी में मक़्सूर का इस्तेमाल किया है तो-बहर रमल मुसद्दस मक़्सूर ही कहलायेगी भले ही आप ने मिसरा उला मैं आप ने ’महज़ूफ़’ किया हो। उसी तरह अगर आप ने मिसरा सानी में आप ने महज़ूफ़ प्रयोग किया है तो बहर का नाम होगा -’रमल मुसद्दस महज़ूफ़- भले ही आप ने मिसरा उला में महज़ूफ़/मक़्सूर प्रयोग किया है। इस लिहाज़ से मीर के शे’र की बहर का नाम होगा -बहर-ए-रमल-मुसद्दस महज़ूफ़-कारण कि ’मतला’ के मिसरा सानी में उन्होने महज़ूफ़ का प्रयोग किया है।ख़ैर---  

[11] बहर-ए-रमल मुसद्दस मख़्बून 
फ़इलातुन----फ़इलातुन----फ़इलातुन
1122--------1122--------1122
एक उदाहरण -कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से
                 ये कभी बसतर-ए-राहत नहीं होती
                 ज़िन्दगी मरहला-ए-दार-ओ-रसन है
             तक़्तीअ 
1  1  2  2     / 1  1     2  2/   1  1  2 2
ये क भी बस / त र-ए-राहत/  न हीं होती
2    1 2    2   / 1  1  2   2/  1     1  2  2
ज़िन द गी मर /ह ल:-ए-दा/ र-ओ-रसन है
इशारा हम कर देते हैं-तक़्तीअ आप कर लें
[नोट  - यहां कसरे-इज़ाफ़त का -ए- और अत्फ़ का-ओ- को बहर की मांग पर तक़्तीअ में ले सकते है--नहीं भी ले सकते -इसे poetic liscence कहते हैं
और सदर और इब्तिदा में 1122 की जगह 2122 लाने की इजाज़त है जैसे इस केस में देख रहे हैं
और इन स्थितियों में भी आप ’फ़इलातुन’ [1122][ हरकत +हरकत ,हरकत +साकिन ,सबब-ए-खफ़ीफ़] है है तो तस्कीन-ए-औसत का अमल हो सकता है यानी 1122 फ़इलातुन  की जगह 222 [मफ़ ऊ लुन] लाया जा सकता है


[12-क] रमल मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन----फ़इलातुन---फ़इलुन
2122---------1122------112
मीर का एक शे’र है
कब तलक यह सितम उठाइएगा ?
एक दिन यूँ ही जी से  जाइएगा 

तक़्तीअ देख लेते है
                 2      1  2   2     / 1 1   2  2 / 1 12
कब तलक यह / सितम उठा/इएगा ?  [ सितम+उठा में  मीम और वाव वस्ल हो गया है]
                  2  1  2   2  / 1   1  2 2  / 1 12
एक दिन यूँ /ही जी से  जा/इएगा
एक बात और---- सदर/इब्तिदा  में ’फ़ाइलातुन’ [2122] के  जगह फ़इलातुन [ 1122] लाया जा सकता है -इसकी इजाज़त है

[12-ख]  फ़इलातुन------फ़इलातुन---फ़इलुन
1122----------1122------112 [यानी 2122  की जगह 1122 लाया जा सकता है]
[आप ध्यान से देखेंगे तो आख़िरी रुक्न [ अरूज के मुक़ाम पर] फ़ इ लुन [ फ़े---ऐन---लाम---अलिफ़---नून] है जिसमें 3- मुतहर्रिक हर्फ़ [फ़े--लाम--ऐन] एक साथ आ गये -अत: तस्कीन का मल हो सकत है और हम इसे [ ’फ़अ   लुन ]- [22] -ऐन साकिन होने से ---लिख सकते है और जो वज़न मरामद होगी उसे-’ मुस्सकिन’ कहेंगे। अगर यह अमल ऊपर लगाये [क-1] और [क-2] में लगायें तो दो वज़न और बरामद होगी
उदाहरण -कमाल अहमद सिद्दीकी साहब के हवाले से

आलम-ए-बेख़बरी में टूटा
दिल दिवाना खबरदार न था
इसकी तक़्तीअ कर के देखते है--
2   1   2   2/ 1 1 2 2  / 2 2
आ ल मे-बे /ख़ ब री में / टूटा
1 1        2  2 / 1  1  2   2   /1 1 2
दिल-ए- दीवा / न ख बर दा /र न था
[नोट - दिल-ए-दीवा/ना---मे कसरा इज़ाफ़त की वज़ह से दिल का लाम मय हरकत हो गया यानी ’दि ल’ यहां सबब-ए-सकील [हरकत+हरकत] हो गया अत: 1 1 का वज़न लिया गया है
सदर.इब्तिदा में 2122  की जगह 1122 लाने कि इजाज़त है और अर्रोज़ और जर्ब मैं 112 की जगह 22 [तसकीन के अमल से भी देख सकते है.] लाने की इजाज़त है


[13-क] बहर-ए-रमल मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मुसक्कन
फ़ाइलातुन----फ़इलातुन---फ़अ लुन   [
2122---------1122------22
उदाहरण --मसहफ़ी का एक शे’र है--

फट चुका जब से गरेबां तब से
हाथ पर हाथ धरे बैठे   हैं
चलिए हम इशारा किए देते है--तक़्तीअ आप कर लें
2      1   2   2  / 1 1  2 2 / 2  2
फट चुका जब / से ग रेबां /तब से
2  1  2   2  / 1  1 2  2 /  2  2
हाथ पर हा / थ ध रे बै /  ठे   हैं

[13-ख] फ़इलातुन----फ़इलातुन---फ़अ लुन
1122---------1122------22 [यानी 2122 की जगह 1122 लाया जा सकता है]
कोई शे’र आप तजवीज़ करें
अच्छा ,अब मक़्सूर का भी अमल देख लेते है
[14-क] रमल मुसद्दस मख़्बून मक़्सूर 
फ़ाइलातुन----फ़इलातुन---फ़इलान
2122---------1122------1121
ग़ालिब का एक शे’र है

दम लिया था न क़यामत ने हनोज़
फिर तेरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया
चलिए इशारा हम कर देते हैं --तक़्तीअ आप कर लें
2    1  2   2  / 1  1  2 2    /  1 1 2 1
दम लिया था /  न क़यामत / ने हनोज़
2    1  2   2    /  1  1 2     2   / 2  2
फिर तिरा वक़/  त -सफ़र या /द आया     [ यहाँ -द आया - में  दाल -अलिफ़ के साथ वस्ल हो गया



[14-ख] फ़इलातुन------फ़इलातुन---फ़इलान
1122----------1122------1121
वही बात यहाँ भी--आखिरी रुक्न -’ फ़इलान’ पर तस्कीन-ए-औसत का अमल लग सकता है--जिससे दो-वज़न और बरामद हो सकती है
उदाहरण---
फ़ानी बदायूँनी का एक शे’र है---
दिल-ए-फ़ानी की तबाही को न पूछ
इल्म-ए-लामुतनाही   को न पूछ
इशारा मैं कर देता हूं~तक़्तीअ आप कर लें
1   1      2    2   / 1  1 2  2 /  1  1 2 1
दि  ल-ए-फ़ानी /की त बाही / को न पूछ     [यहां दिल-ए-फ़ानी  में -इज़ाफ़त-ए-कसरा की वज़ह से -ल- पर हरकत आ जायेगी यानी मुतहर्रिक हो जायेगी।
1  1 2  2      / 1 1  2  2     / 1  1 2 1 
इ ल मे ला    / मु त नाही    / को न पूछ       [ की--को--पर  बहर की माँग पर मात्रा गिराई गई है]


[15-क] रमल मुसद्दस मख़्बून मक़्सूर मुसक्कन
फ़ाइलातुन----फ़इलातुन---फ़अ लान
2122---------1122------221
[नोट -यहाँ हस्व में फ़ इ ला तुन [1122] की जगह -मफ़ ऊ लुन [222] [तस्कीन के अमल से] लाया जा सकता है
[15-ख] फ़इलातुन----फ़इलातुन---फ़अ लान
1122---------1122------221
 और महज़ूफ़  की जगह  मक्सूर  और मक्सूर की जगह महज़ूफ़ लाया जा सकता है
इस प्रकार हम देखते है कि [12 से लेकर 15 तक ]मुसद्दस मख़्बून के 8-वज़न मिलते है । बहर 15 के लिए कोई शे’र आप तजवीज़ करें

इस प्रकार हम देखते है कि बहर-ए-रमल में  ’तस्कीन’ के अमल से और भी कई मज़ीद [अतिरिक्त] बहर बरामद की जा सकती है और वो निर्भर करेगा आप के ज़ौक़-ओ-शौक़ और आप की सुखनवरी पर ।

अगले क़िस्त में अब हम बहर-ए-रमल की मुसम्मन मुज़ाहिफ़ बह्रों पर चर्चा करेंगे

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर में इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--


न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
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शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : किस्त 36 [ बहर-ए-रमल की सालिम बहरें]


उर्दू बहर पर एक बातचीत  : किस्त 36 [ बहर-ए-रमल की सालिम बहरें]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

दायरा-ए--मुजतलबिया: से 3 बहर निकलती हैं ---हज़ज---रमल----रजज़

अब आप कहेंगे यह ’दायरा’ [वॄत] बीच में कहाँ से आ गया? घबड़ाइए नहीं ,मैनें तो बस यूँ ही लिख दिया कि अगर कहीं आप किसी अरूज़ की किताब में यह पढ़े तो आप परेशान न हों।
अरूज़ की किताबों में ’रुक्न’ को दिखाने का/समझने-समझाने का/बताने का यह एक pictorial and Graphical  तरीक़ा है। आप इसे न जाने तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

ह्ज़ज =मुफ़ाईलुन् =1222= वतद [ मुफ़ा, 12 ]    +सबब [ई ,2]       + सबब [लुन , 2] = 1222
रमल  = फ़ाइलातुन् =2122=   सबब [ फ़ा, 2 ]       + वतद [ इला,12]+ सबब [तुन,2] = 2122
रजज़  =मुस तफ़ इलुन्  = 2212= सबब [ मुस, 2]       + सबब  [ तफ़ ,2] + वतद [इलुन ,12] = 2212

और ये तीनो रुक्न सुबाई रुक्न [7-हर्फ़ी रुक्न] कहलाती है  यक़ीन न हो तो हर्फ़ गिन कर देख लीजिये
इन सब पर मैं पहले भी चर्चा कर चुका हूँ --कोई नई बात नही है।

अगर आप ध्यान से देखें तो स्पष्ट है कि वतद तो हर रुक्न में ’खूँटे’ की तरह गड़ा हुआ है [ वतद को खूंटा PEG भी कहते है ] ये तो सबब है कि किसी रस्सी सा बँधा हुआ बस इस  वतद के कभी आगे कभी पीछे हो रहा है [सबब को रस्सी भी कहते हैं।
अब थोड़ी सी चर्चा दायरा [वृत] पर भी कर लेते है
आप कल्पना करें [ज्यामिति में कल्पना ही करते है ] कि किसी वॄत की परिधि पर  वतद----सबब---सबब रखा हुआ है
[वतद से मेरी मुराद वतद-ए-मज़्मुआ और सबब से सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से है---जिसके बारे में मैं प्रारम्भ में ही चर्चा कर चुका हूँ]
अब आप एक एक टुकड़ा छोड़ कर परिधि पे लिखे टुकड़े पढ़्ते जाइए --आप को यह बहर एक के बाद एक हासिल होती जायेगी -जैसे [वतद--सबब-सबब]-----[सबब---सबब--वतद]----[सबब--वतद--सबब] --
खैर
बहर-ए-रमल का बुनियादी रुक्न " फ़ाइलातुन ’ [2122] है जो एक सबब-ए-खफ़ीफ़+ एक वतद-ए-मज़्मुआ+ एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से बना है और यह एक सालिम रुक्न है

आज बहर-ए-रमल की सालिम बह्र की चर्चा करते हैं}

[1] बहर-ए-रमल मुरब्ब: सालिम
फ़ाइलातुन्----फ़ाइलातुन्
2122--------2122
उदाहरण- [डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

दिल में तेरी आरज़ू ने
कैसे कैसे गुल खिलाए
तक़्तीअ आप कर लें इशारा मैं कर देता हूँ

दिल में तेरी / आरज़ू ने
कैसे कैसे   / गुल खिलाए
[ख] बहर-ए-रमल सालिम मुसब्बीग़---अगर हम ऊपर की बहर की आखिरी रुक्न [जो अरूज़ के मुक़ाम पर है] में एक ’साकिन’ और बढ़ा दें [यानी फ़ाइल्लियान 21221 ] कर दे तो यह मुसब्बीग़ हो जायेगा यानी
फ़ाइला्तुन्----फ़ाइल्ल्यान्
2122--------21221
उदाहरण -[कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से]
ऎ नसीम-ए-सुबह ले जा
मेरे दिल का उस तक अहसास
तक़्तीअ आप कर लें , इशारा मैं कर देता हूँ
2122     / 2  1   22
ऎ नसीमे / सुब ह ले जा               [
2 1  2     2   /  2  1  2    2  1
मेरे दिल का /उस त  कह सास
आप जानते है कि अगर शे’र के आखिर में [अगरसबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म हो तो ]एक हर्फ़-ए- साकिन बढ़ा दिया जाय तो बहर के वज़न पे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
ऐसा क्यों?
इस लिए कि जर्ब और अरूज़ में 2-साकिन एक साथ आ जायेंगे [हरकत+साकिन+साकिन] जब कि तक़्तीअ में एक ही’साकिन’ लिया जाता है।

मगर नाम में तो फ़र्क पड़ जायेगा
जैसे  2122------2122-----21221
और इस का नाम होगा
बहर-ए-रमल् मुसद्दस मुसब्बीग़ अल आखिर [अल आखिर न भी लिखेगे तो भी चलेगा कारण कि मुसब्बीग़ तो शे’र के आखिर में ही आता है ]
अरूज़ और जर्ब में सालिम [2122] और मुसब्बीग़ [21221] का ख़ल्त जायज है

[ध्यान दें- पहले मिसरा के अरूज़ के मुक़ाम पर ’सालिम’ [फ़ाइलातुन 2122] है जब कि जर्ब के मुक़ाम पर मुसब्बीग़ [21221] है और यह ख़ल्त जायज है मगर
बहर का नाम --जर्ब [ मिसरा सानी का आखिरी रुक्न ] पर जो होगा उसी से बहर का नाम बरामद होगा
एक बात और--
अगर हम मुरब्ब: को ’मुज़ाइफ़’ [दो-गुना] कर दें तो--
बज़ाहिर मिसरा में 4-रुक्न और पूरे शे’र में 8-रुक्न होंगे -तो हम क्या हम इसे ’मुसम्मन’ कह सकते है --या "मुरब्ब: मुज़ाइफ़" ही कहेंगे? कैसे पहचानेगे कि अमुक शे’र "बहर-ए-रमल मुसम्मन सालिम" है या ’बहर-ए-रमल मुरब्ब: मुज़ाइफ़" है??
यह सवाल मैने पहले भी उठाया था और हर बहर के मुरब्ब: में यह बात आती है। जवाब हमें नहीं मालूम।
पर हाँ इतना ज़रूर कह सकता हूं~--कि मुरब्ब: के केस में सिर्फ़ "सदर/इब्तिदा"  और ’अरूज़/जर्ब’ होता है --जब कि हस्व का मुक़ाम नही होता[ इस पर गुज़िस्ता अक़सात मैं चर्चा कर चुका हूँ ,यहाँ दुहराना ग़ैर ज़रूरी है]
यानी
मुरब्ब:    सदर----अरूज़
इब्तिदा-----जर्ब
  A------B---//   C-----D
मुरब्ब: मुज़ाहिफ़             सदर---अरूज़//सदर--अरूज़ =4-रुक्न
  2122---2122// 2122--2122
  E -------F----//  G--------H
इब्तिदा---जर्ब   //  इब्तिदा---जर्ब =4-रुक्न
2122-----2122// 2122-----2122

तो? जब हम ज़िहाफ़ के चर्चा करेगे तो --मुरब्ब/मुरब्ब: मुज़ाहिफ़ के केस में --वो ज़िहाफ़ात नहीं लगेगे--जो हस्व के लिए मख़्सूस होते है क्योंकि मुरब्ब: बहर में ’हस्व’ होता ही नही
अच्छा ,अगर मुरब्ब: मुज़ाइफ़ में ’मुसब्बीग़’ [ 21221] लगाना है तो कहाँ लगायेंगे ? बज़ाहिर अरूज़ और जर्ब पर ही लगेगा यानी [B and D , F and H ] पर यानी
M 2122---21221  // 2122----21221
M 2122----21221// 2122-----21221
साथ ही यह बह्र-ए-शिकस्ता भी है जब कि मात्र मुसम्मन मैं बहर-ए-शिकस्ता नही होता
मगर जब मुसम्मन में ’मुसब्बीग़’ लगाना हो तो--??

मुसम्मन सदर---हस्व---हस्व-----अरूज़ =4-रुक्न
इब्तिदा--हस्व----हस्व---जर्ब =4-रुक्न

बज़ाहिर अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर यहाँ भी लगेगा
यानी       N                2122-----2122------2122------21221
N       2122------2122------2122-----21221
अब आप M and N की तुलना करें। अब आप ्"मुरब्ब: मुज़ाहिफ़" [ 4-रुक्न एक मिसरा में]  और मुसम्मन [4-रुक्न एक मिसरा में] अन्तर कर सकते हैं।
[2] बहर-ए-रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन्----फ़ाइलातुन्----फ़ाइला्तुन्
2122--------2122---------2122
उदाहरण [ कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से]

हिज़्र में तनहाई का आलम अजब था
डूब कर यादों में तेरी सो गए हम
तक़्तीअ का एक इशारा कर देते हैं

हिज़्र में तन/  हाइ का आ/लम अ जब था
डूब कर या ]दों में तेरी /  सो गए हम
[2] ख बहर-ए-रमल मुसद्दस सालिम मुसब्बीग़
फ़ाइला्तुन्----फ़ाइला्तुन्----फ़ाइल्लयान्
2122--------2122---------21221
[नोट --मुसब्बीग़ की वज़ाहत ऊपर कर दी गई है--मुरब्ब: के साथ]
[कमाल अहमद सिद्दीक़ी के हवाले से]
शहर में क्या काम रिन्दान-ए-ख़राबात
एक वीराना करें अच्छा सा  आबाद
तक़्तीअ का इशारा कर देता हूँ
2    1   2   2  /  2 1  2    2   / 2 1 2 2 1
शह र में क्या / काम रिन् दा / ने-ख़राबात
2  1   2 2 / 2 1 2 2     / 2 1   2  2  1
एक वीरा /ना करें अच्  /चा स  आबाद

[3] बहर-ए-रमल मुसम्मन सालिम
फ़ाइलातुन्----फ़ाइलातुन्----फ़ाइला्तुन्----फ़ाइला्तुन्
2122--------2122       --------2122------2122
उदाहरण-क़तील सिफ़ाई का एक शे’र है

था ’क़तील’ एक अहल-ए-दिल अब ,उसको भी क्यों चुप लगी है
एक हैरत सी है तारी शहर भर के दिलबरों  पर 

तक़्तीअ का एक इशारा भर कर देता हूँ आप समझ जायेंगे

था ’क़ती लिक /अह ल-ए-दिल अब / ,उसको भी क्यों /चुप लगी है  [ यहाँ क़तील+इक में वस्ल हो कर =क़ती लिक[1 22] का वज़न दे रहा है
एक हैरत / सी है तारी /शहर भर के / दिल बरों  पर [ उर्दू में शह र [21] के वज़न पर लेते है जो दुरुस्त भी है .हिन्दी में इसे [12] की वज़न पर लेते हैं]

कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से -2- उदाहरण

रू-ब-रू हर बात कहना है यक़ीनन ज़ीस्त आदत
अपने बेगाने सभी हमसे ख़फ़ा हैं ,क्या करें हम  
 तक़्तीअ का एक इशारा कर देता हूँ --आप भी कर सकते है

रू-ब-रू हर/   बात कहना / है यक़ीनन / ज़ीस्त आदत
अपने बेगा / ने सभी हम /से ख़फ़ा हैं ,/ क्या करें हम 

उसके होंठों में जो सुर्खी है ,गुलाबों में नहीं  हैं
उसकी आँखों में जो मस्ती है,शराबों में नहीं है

 इसकी भी तक़्तीअ का एक इशारा भर कर देता हूँ-आप खुद भी कर सकते हैं

उसके होंठों/ में जो सुर्खी / है ,गुलाबों / में नहीं  हैं
उसकी आँखों / में जो मस्ती / है,शराबों /में नहीं है

[यहाँ -के- जो-की- पर मात्रा गिराई गई है जो शायरी में जायज है ]

एक उदाहरण डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से भी दे देता हूँ

हाल-ए-दिल किस को सुनाएँ ,दर्द-ए-दिल किस से कहें हम
इस ज़माने में कोई भी ,राज़दाँ  अपना नहीं है 

इस की तक़्तीअ कर के देखते हैं

हाल-ए-दिल किस/  को सुनाएँ  /,दर्द-ए-दिल किस/ से कहें हम ------ [”हाल-ए-दिल’ को हाल- दिल और”दर्द-ए-दिल’ को दर्द-दिल के वज़न पर लेंगे बहर की माँग पर]

इस ज़माने / में कुई भी /,राज़दाँ  अप / ना नहीं है -------------------[ -कोई - को कुई  के वज़न पर लेंगे बहर की माँग पर]

जैसा कि ऊपर मुरब्ब: और मुसद्दस के केस में  बताया जा चुका है ,मुसम्मन के केस में भी आखिर रुक्न [अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर] मुसब्बीग [  फ़ाइलाय्यान 21221 ] लाया जा सकता है गरऔर इनका आपस में ख़ल्त जायज है
और इस बहर का नाम होगा -’बह्र-ए-रमल मुसम्मन मुसब्बीग़-कहेंगे
एक उदाहरण [डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

ज़िन्दगी की हर डगर पर मैं निभाऊँगा तेरा साथ
उम्र भर के वास्ते मैंने तो थामा है तेरा हाथ

इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं

2    1   2    2  /  2  1  2  2     / 2 1  2  2  / 2 1 2 2 1
ज़िन द गी की /  हर डगर पर/  मैं निभाऊँ/ गा तिरा साथ
2 1   2   2  /  2  1  2 2  / 2  1  2  2 / 2 1 2 2 1
उम्र भर के / वास्ते मैं      /ने तो थामा / है तिरा हाथ

चलते चलते एक बात और----
यूँ तो बहर-ए-रमल सालिम मुसम्मन/मुसद्दस उर्दू की एक मक़्बूल बहर है मगर पता नहीं क्यों रमल के मुसद्दस या मुसम्मन में उर्दू शायरों ने ज़्यादा अश’आर नहीं कहे हैं जब कि इसकी मुज़ाहिफ़ बहर बहुत ही मक़्बूल और राइज है और लगभग सभी शायरों ने तब अ आज़माइ की है} यह भी एक अजीब बात है}

----
अब अगले क़िस्त में हम बहर-ए-रमल की कुछ मुज़ाहिफ़ बह्रों [ज़िहाफ़ात वाली बह्रों ] पर चर्चा करेंगे
आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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शनिवार, 25 नवंबर 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 35 [ बहर-ए-हज़ज की बह्रें -एक जगह]

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 35 [ बहर-ए-हज़ज की बह्रें -एक जगह]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

क़िस्त 30 से लेकर क़िस्त 34 तक ,बहर-ए-हज़ज की सालिम और मुज़ाहिफ़ बहरों की चर्चा कर चुके हैं। साथ ही रुबाई की उन बुनियादी बह्रों की भी चर्चा कर चुका हूँ जिस से रुबाई के वज़न बरामद होते हैं । यानी यह चर्चा विस्तार से होने के कारण काफी लम्बी हो गई।अत: उन तमाम बह्र और वज़न को एक जगह लिख रहा हूँ जिससे पाठकों को पढ़ने में सुविधा हो। विशेष जानकारी और उदाहरण सम्बन्धित क़िस्त या अरूज़ की किताब में देखा जा सकता है

[1] हज़ज सालिम मुरब्ब:
मुफ़ाईलुन्-----मुफ़ाईलुन्
1222---------1222
[2] हज़ज सालिम मुसद्दस
मुफ़ाईलुन्-----मुफ़ाईलुन्---मुफ़ाईलुन्
1222---------1222------1222
[3] हज़ज सालिम मुसम्मन
मुफ़ाईलुन्-----मुफ़ाईलुन्---मुफ़ाईलुन् -----मुफ़ाईलुन्
1222---------1222------1222   --------1222
[4] हज़ज सालिम मुसम्मन मुसब्बीग़
मुफ़ाईलुन्-----मुफ़ाईलुन्---मुफ़ाईलुन् -----मुफ़ाईलान्
1222---------1222------1222   --------12221
[5] हज़ज मुसद्दस सालिम महज़ूफ़ अल आख़िर
मुफ़ाईलुन्-----मुफ़ाईलुन्---फ़ऊलुन्
1222---------1222-------122
[नोट- शे’र में अरूज़ के मुक़ाम पर महज़ूफ़ [122] की जगह ’फ़ऊलान [1221] लाने की इजाज़त है
[6] हज़ज मुसद्दस सालिम मक़सूर अल आख़िर
मुफ़ाईलुन्-----मुफ़ाईलुन्---फ़ऊलान्
1222---------1222-------1221
[नोट- शे’र में अरूज़ के मुक़ाम पर महज़ूफ़ [122] की जगह ’फ़ऊलान [1221] लाने की इजाज़त है ।
बहर 5 और बहर 6 को ध्यान से देखें अल आखिर रुक्न या तो महज़ूफ़ है या मक़्सूर है और  दोनो रुक्न शे’र के अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर आपस मैं बदले जा सकते है
मगर बहर का नाम ’जर्ब के मुक़ाम पर’ जो ज़िहाफ़ लगा होगा[यानी मिसरा सानी का अल आखिर मुक़ाम] से तय होगा। अगर आप ने जर्ब पे मक़्सूर लाया है तो बहर के नाम में
मक़्सूर अल आख़िर जोड़ा जायेगा। और पूरी ग़ज़ल में यह क़ैद बरक़रार रहेगी । भले ही आप मिसरा उला में महज़ूफ़ रखें या मक़्सूर रखें। यही बात महज़ूफ़ [यानी रुक्न [5] के लिए भी लागू होगी
[7] हज़ज मक़्बूज़ मुसम्मन
मफ़ा इलुन्---मफ़ा इलुन्----मफ़ा इलुन्----मफ़ा इलुन्
1212----------1212--------1212--------1212
[8] हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़ सालिम
मफ़ा इलुन्---मफ़ा ईलुन्-----मफ़ा इलुन्-----मफ़ाईलुन्
12 12     -------1222-------1212-------1222--
[9] हज़ज अस्तर सालिम मुरब्ब: मुज़ाइफ़ 
फ़ा इलुन्----मुफ़ा ईलुन् ----फ़ा इलुन्----मुफ़ाईलुन्
212--------1222---------212----------1222
[10]     हज़ज अस्तर सालिम मुसब्बीग़ मुरब्ब: मुज़ाहिफ़
फ़ाइलुन्-----मुफ़ाईलान्----फ़ाइलुन्-------मुफ़ाईलान्
212-------12221---------212---------12221
[बहर [9] और [10] को ध्यान से देखें तो स्पष्ट है  रुक्न [10] में दूसरे और चौथे मुकाम पर ’मुफ़ा ईलुन [1222] की जगह  मुफ़ाईलान [12221] लाया जा सकता है जिसकी इजाज़त है जिसे ’तस्बीग़’ कहते हैं]
---------------
[11] हज़ज मुसम्मन अख़रब सालिम
मफ़ऊलु------मुफ़ाईलुन्--//---मफ़ ऊलु-----मुफ़ाईलुन्
221-----------1222------//--221----------1222
[12] हज़ज मुरब्ब: अख़रब सालिम
मफ़ऊलु-------मुफ़ाई्लुन्--
221------------1222
[13] हज़ज मुसम्मन अख़रब सालिम मुसब्बीग़
मफ़ऊलु---------मुफ़ाईलान्
221-------------12221
[14]  हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक़्फ़ूफ़ सालिम
मफ़ऊलु---मुफ़ाईलु-----मुफ़ाईलु------मुफ़ाईलुन्
221--------1221--------1221--------1222
[15] हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ सालिम मुसब्बीग़
मफ़ऊलु----मुफ़ाईलु----मुफ़ाईलु-----मुफ़ाईलान्
221--------1221--------1221--------12221
[16] हज़ज मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़अल अख़िर
मुफ़ाईलु-------मुफ़ाईलु-----मुफ़ाईलु-----मुफ़ाइल्
1221----------1221--------1221-----122
[17] हज़ज मुसम्मन मक्फ़ूफ़  मक़्सूर अल अख़िर
मुफ़ाईलु-------मुफ़ाईलु-----मुफ़ाईलु-----फ़ऊलान्
1221----------1221--------1221-----1221
[बहर [16] और [17] को ध्यान से देखें
[ मुफ़ाइल 122=फ़ऊलुन्---महज़ूफ़ है]
[ फ़ऊलान् 1221---मक़्सूर है[ अरूज़ और जर्ब में इन दोनों का ख़ल्त जायज है
[18] हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़्बूज़ मकफ़ूफ़ मजबूब 
मफ़ऊलु ---मफ़ाइलुन्-----मफ़ाईलु----फ़ अल्
A------------B
221-------1212---------1221------12- 
यह रुबाई की बुनियादी बहर है और इस पर ’तख़्नीक़’ के अमल से  रुबाई के 12-औज़ान [वज़न का ब0ब0] बरामद किए जा सकते है
और रुक्न A और  B पर तख़्नीक़ के अमल से नीचे [12] की वज़न बरामद की जा सकती है
{19] हज़ज मुसम्मन अख़रम अस्तर मकफ़ूफ़ मजबूब
मफ़ऊलुन्-----फ़ाइलुन्-----मुफ़ाईलु--फ़ अल्
222------ ---212--------1221-----12   
[यह भी रुबाई की मूल बहर  है इस से भी ’तख़्नीक़ ’ के अमल से  रुबाई के 12 वज़न बरामद किए जा सकते है]
अत: रुबाई के कुल 24-वज़न बरामद किए जा सकते है । इस की चर्चा किसी अलग मुक़ाम पर करेंगे

[20] ह्ज़ज मुसम्मन अख़रम अहतम
मफ़ऊलु----मफ़ाईलुन---मफ़ऊलु---फ़ऊलु
221--------1222--------221------121
[21] ह्ज़ज मुसद्दस महज़ूफ़ अलअख़िर
मफ़ाईलुन----मफ़ाईलुन----फ़ऊलुन
1222----      1222---------122
[22] हज़ज मुसद्दस मक्सूर अल आख़िर
मफ़ाईलुन------मफ़ाईलुन-----फ़ऊलान
1222-----------1222-------1221
(23)     हज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ मक़्बूज़
मफ़ऊलु------मफ़ाइलुन-----मफ़ाइलुन
221-----------1212----------1212
(24) हज़ज मुसद्दस अखरब मक़्बूज़ मक़्बूज़ मुसब्बीग़
मफ़ऊलु--------मफ़ाइलुन------मफ़ाइलान
221-------------1212----------12121
(25) हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु-----मफ़ाईलु-------फ़ऊलुन
221----------1221----------122
(26)  हज़ज मुसद्दस अख़रब मकफ़ूफ़ मक्सूर
मफ़ऊलु-----मफ़ाईलु-------फ़ऊलान
221----------1221---------1221

ख़ुदा ख़ुदा कर के, बहर-ए-ह्ज़ज का बयान पूरा हुआ। मैं यह दावा तो नहीं करता कि मैने हज़ज के सभी वज़न cover कर लिया है .पर हाँ ,बहुत हद तक   cover कर लिया है।

हम यह तो नहीं कह सकते है कि हमने बहर-ए-हज़ज की तमाम मुम्किनात बहर पर चर्चा कर ली पर हाँ बहुत सी बुनियादी और मक़्बूल बहूर पर ज़रूर चर्चा कर लिया है
अभी भी बहुत से मुख़तलिफ़ बहर हैं [जो तख़्नीक के अमल से बरामद हो सकती है]  मुरब्ब: .मुसद्दस---मुसम्मन आदि शकल पर] जिस  पर चर्चा की सकती है पर यह आप के ज़ौक-ओ-शौक़-ए-सुखन पर निर्भर करेगा। हो सकता है कि बहुतो को मज़ीद तज़्क़िरा ग़ैर ज़रूरी लगे । सभी पर एक जगह चर्चा करने से हो सकता है कि  मुबहम  का  बाइस हो जाए। ख़ैर--
अब अगली क़िस्त मे हम बहर-ए-रमल पर चर्चा करेंगे

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 11 नवंबर 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 34 [बह्र-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें -4]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 34 [बह्र-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें -4]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

----क़िस्त 30-से लेकर क़िस्त 33 तक] बह्र-ए-हज़ज की बहुत सी मुज़ाहिफ़ बह्र पर चर्चा कर चुके हैं।आज इस क़िस्त में  हम कुछ और मुज़ाहिफ़ बह्र पर चर्चा करेंगे 
अब् हमें नहीं लगता है कि मुरब्ब: ---मुसद्दस---मुसम्मन--मुज़ाइफ़  के बारे मैं कुछ और बताने की कोई ज़रूरत है और न ही  महज़ूफ़---मकफ़ूफ़---मक़्सूर---अखरब---क्या है ,के बारे में ।[ये सब ज़िहाफ़ात है जो सालिम रुक्न के अवयव [ज़ुज़] पे लगते हैं जिस से इनकी  तबादिल शकल बरामद होती है --ये सब उसके नाम है ] इन सब की चर्चा मैने पिछले अक़्सात [ ब0ब0 क़िस्त] में कर चुका हूँ
यहाँ जो हलन्त से हर्फ़ दिखाया गया है -उसे आप साकिन समझिए
जो-लु- दिखाया गया है उसे आप मुतहर्रिक [यानी लाम पर हरकत] समझिए
 निम्नलिखित बहरों के उदाहरण डा0 आरिफ़ हसन खान साहेब की किताब "मेराज-उल-अरूज़’ से साभार लिया गया है ।आप् भी चाहें तो ख़ुद्साख़्ता शे’र कह सकते हैं इन वज़न पर। इस हक़ीर ने भी कोशिश  की ,मगर फ़िलबदीह अश’आर न कह सका इन औज़ान पर । आइन्दा कोशिश करूँगा इन्शा अल्लाह , कामयाबी हासिल हो ।आप से गुज़ारिश है कि यहाँ पर जो शे’र उदाहरण के लिए दिए गये हैं वो डा0 साहब के ख़ुदसाख़्ता अश’आर है जो सिर्फ़ समझने और समझाने और बताने की अल गरज  कहे गये हैं । इस में आप शे’रियत न देखियेगा --तेल देखियेगा और तेल की धार देखियेगा। उनकी शे’रियत या फ़न्न-ए-शायरी देखने के लिये उनकी मुज़्मुआ गज़लियात किताब -" कुछ नज़्में कुछ ग़ज़लें" -देखियेगा।

[1]A  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु-----फ़ऊलुन्
221--------1221-------122 / 1221
उदाहरण--
जब याद तेरी दिल को सताए
अए माहजबीं  नींद न आये
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जब याद/   तिरी दिल कू / सताए
अए माह/  जबीं  नींद     / न आये

[1]B  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ मक़्सूर
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु-----फ़ऊलान्
221--------1221-------1221
उदाहरण
जाने से तेरे दिल हुआ वीरान
जैसे हो कोई उजड़ा हुआ शहर

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जाने से /    तिरे दिल हु / आ वीरान
जैसे हू / कुई उजड़ा    / हुआ शहर   [ शह्  र =21]

शायरी में ’महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[2]A  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ महज़ूफ़ 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन्----फ़ऊलुन् 
221---------1212-------122
उदाहरण--
यह इश्क़ अजीब एक बला है
बख़्शा न बड़े बडों को इस ने

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

ये इश्क़ /  अजीब इक / बला है
बख़्शा न / बड़े बडों    /कू इस ने

[2]B बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ मक़्सूर 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन्----फ़ऊलान्
221---------1212-------1221
उदाहरण
था नाज़ बहुत कि दिल न देंगे
देखा जो उसे तो उड़ गए होश

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

था नाज़ /   बहुत कि दिल / न देंगे     [ न देंगे  =122= महज़ूफ़ है]
देखा जू/  उसे तो उड़  /   गए होश   [ गए होश = 1221= मक़सूर]
’महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[3]A   बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दसअख़रब मक़्बूज़ मुख़्निक़ महज़ूफ़
मफ़ ऊलन्------फ़ाइलुन्----फ़ऊलुन्
222----------212----------122
अगर आप ऊपर के रुक्न [2]A-पर ’तख़्नीक’ का अमल करें [यानी " मफ़ऊलु---मफ़ाइलुन "-3 मुतहर्रिक [ लाम---मीम --फ़े] एक साथ आ गए ] तो आप को बहर [3]A बरामद हो जायेगा और इसका नाम भी वही होगा बस ’मुख़्नीक़’ और जोड़ देंगे
उदाहरण--
आँखे  भींगी तड़प उठा दिल
जब जब तेरा ख़याल   आया
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

आँखे  भीं / गी तड़प /उठा दिल
जब जब ते/ रा ख़या  /ल   आया

[3]B   बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ मुख़्निक़ मक़्सूर
मफ़ ऊलुन्------फ़ाइलुन्----फ़ऊलान्
222----------212----------1221
उदाहरण
कर लें जितनी जफ़ायें चाहे
चाहत से हम न आयेंगे  बाज़

  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

कर लें जित/ नी जफ़ा/ ये चाहे           [ य चाहे = 122= महज़ूफ़]
चाहत से    / हम न आ/ यगे  बाज़      [ यगे बाज़= 1221= मक़सूर]
महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[4]A  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ मजबूब 
मफ़ऊलु-------मफ़ाईलु----फ़ अल्
221-----------1221-------12
उदाहरण
प्यारी है ज़बां  सब से मेरी
चर्चा है ज़माने में  यही
  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

प्यारी है/  ज़बां  सब से/  मेरी
चर्चा है / ज़माने में      / यही


[4]B  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ अहतम
मफ़ऊलु-------मफ़ाईलु----फ़ऊल्
221-----------1221------- 121
उदाहरण
बेमिस्ल हमारा है  ये देश
जन्नत से भी प्यारा है ये देश

  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

बेमिस्ल   /हमारा है   / ये देश
जन्नत से / भी प्यारा है /ये देश
[नोट - इस बहर [4] में ’तख़्नीक़’ के अमल से और भी कई वज़न बरामद किए जा सकते है जो आपस में मुतबादिल होंगे जो जायज़ है।

[5] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब
मफ़ऊलु----मफ़ाईलुन्
221--------1222
उदाहरण
हैं लाख हसीं जग में
तुम सा न कोई लेकिन
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

हैं लाख     /  हसीं जग में
तुम सा न  / कुई लेकिन

[6]A   बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब महज़ूफ़
मफ़ऊलु-----फ़ऊलुन्
221-----------122-
उदाहरण
खुशरंग कोई गुल
तुम जैसा कहाँ  है
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

खुशरंग / कुई गुल
तुम जैसा/  कहाँ  है
[6]B   बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब मक़्सूर
मफ़ऊलु------फ़ऊलान्
221-----------1221
उदाहरण
सब ताब पड़े माँद
देखे जो तुझे  चाँद

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है
सब ताब /पड़े माँद
देखे जो  /तुझे  चाँद

[7]A बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्बूज़ मजबूब 
मफ़ा इलुन्------फ़ अल्-
1212----------12-
उदाहरण
तुम्हारी याद ने
खिलाये गुल नए
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

तुम्हारी या   / द ने
खिलाये गुल / न ए


[7]B बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्बूज़ अहतम
मफ़ा इलुन्------फ़ऊल्
1212---------- 121
उदाहरण
जो मुस्करायें आप
तो जल उठे चिराग़
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जो मुस्करा  / ये आप
तो जल उठे / चिराग़

रुबाई की बहर : रुबाई की बह्र हज़ज से ही  पैदा होती हैं ,और 24- वज़न बरामद होते हैं ।चूँकि रुबाई उर्दू काव्य विधा की एक अलग स्वतन्त्र  इकाई है अत: इसकी चर्चा यहाँ करना मुनासिब नहीं .कभी अलग से स्वतन्त्र रूप से इस पर बातचीत करेंगे
आप की जानकारी के लिए थोड़ी सी चर्चा यहां कर देते है
रुबाई  की दो मूलभूत बहर है [जो हज़ज से ही निकलती है ]

[1] मफ़ऊलु-----मफ़ाईलु-----मफ़ाईलु-----फ़ अल् /फ़ऊल्
    221----------1221--------1221-------12-/ 121

[2] मफ़ऊलु-----मफ़ा इलुन्------मफ़ाईलु--- फ़ अल्/ फ़ऊल्
     2 2 1----------12 12---------1221------12-/121

इन्हीं दो बुनियादी बहरों पर् -तख़्नीक़- के अमल से 24-वज़न बरामद होते है और ये -24- वज़न आपस में मुतबादिल होते हैं [ यानी आपस में बदले जा सकते हैं ]
यानी रुबाई के चारो लाईनों में अलग अलग वज़न [ but out of these 24-vazan] लाए जा सकते हैं
बात यहीं छोड़े जाता हूँ -जब रुबाई के बह्र की चर्चा करेंगे तो बात यहीं से उठायेंगे
-----------------------------
ख़ुदा ख़ुदा कर , बहर-ए-ह्ज़ज का बयान पूरा हुआ। मैं यह दावा तो नहीं करता कि मैने हज़ज के सभी वज़न cover कर लिया है .पर हाँ ,बहुत हद तक   cover कर लिया है। आप चाहें तो हज़ज की और भी कई मुज़ाहिफ़ बहर बरामद कर सकते है

अगले किस्त में हम बहर-ए-हज़ज की उन तमाम बहूर /औज़ान  को एक साथ एक जगह सम्पादित [मुरत्तब] करेंगे जिनकी चर्चा हम गुजिस्ता अक़सात में कर चुके हैं जिससे  पाठको को एक जगह पढ़ने की सुविधा मिल सके।
अस्तु

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-



शनिवार, 4 नवंबर 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 33 [बह्र-ए-हज़ज कि मुज़ाहिफ़ बहूर-3]

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 33 [ बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें-3]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है

[क्षमाप्रार्थी हूँ विलम्ब से उपस्थित होने पर----

बिना पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है
हो न हो मुजरिम दिखाई  देता  है

अत: विलम्ब के लिए आज सफ़ाई  पेश नहीं करूँगा। बस आप यूँ समझ लें ---कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी--वरना इतना ’विलम्ब’ नहीं होता। सच तो यह है कि बहर-ए-हज़ज के इतने मुज़ाहिफ़ बहर हैं कि उनके तज़्किरा [चर्चा ]करते करते मैं खुद ही बिखर गया --कि खुद को समेटूँ तो कहाँ से समेटूँ
ख़ैर--फिर एक कोशिश कर के आप के सामने हाज़िर हूँ --आप की दुआओं  का तलबगार हूँ


पिछले अक़्सात [क़िस्तों ] में  हम हज़ज की सालिम बह्र [मुरब: ,मुसद्दस.सालिम] की चर्चा कर चुके है  [क़िस्त30]
और इसकी मुज़ाहिफ़ बहर महज़ूफ़ और मक़्सूर की भी चर्चा कर चुके हैं      [क़िस्त 31[
साथ ही इसकी मुज़ाहिफ़ बहर मक्बूज़ ,मक़्फ़ूफ़,मक़्फ़ूफ़+महज़ूफ़+मक़्सूर आदि की भी चर्चा कर चुका हूँ   [क़िस्त  32]

ख़र्ब’ और ’कफ़’ ज़िहाफ़ एक साथ लेते है देखते हैं क्या होता है

आज हम और ज़िहाफ़ की चर्चा करेंगे जो हज़ज [रुक्न मुफ़ाईलुन -1222 ] पर लगता है
आप घबराईए नहीं । ये सब ज़िहाफ़ academic discussion के लिए हैं और आप की जानकारी के लिए कर रहे हैं अगर आप सब मिला कर देखेंगे तो ऐसे बहर की संख्या सैकड़ों में बैठती है लेकिन कोई भी शायर इन तमाम बहूर में शायरी नहीं करता । ’मीर’ ने लगभग 30 बह्र , ग़ालिब ने- लगभग 20 -और इक़बाल ने  लगभग 51 बह्र प्रयोग किया है।
आप भी अपनी मनपसन्द बहर को चुन सकते हैं मगर तमाम बहर को पढ़ने समझने के बाद ।

एक बात और--ये बह्र और वज़न तो शायरी का मात्र एक हिस्सा [अवयव] है फ़न-ए-शायरी मेअसल बात तो भाव और कला पक्ष की है

ज़िहाफ़ ख़र्ब- एक मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है [मिश्रित ज़िहाफ़] है जो दो ज़िहाफ़ से मिल कर बना है --कफ़+ ख़रम  । मुज़ाहिफ़ को आप -"मक्फ़ूफ़ अख़रम" भी कह सकते हैं---’अख़रब’ भी कह सकते है ।
बज़ाहिर  ’ख़र्ब’ ज़िहाफ़ से  रुक्न का अखरब शकल [221 मफ़ ऊलु]   हासिल होगा [क़िस्त-31] यानी -लु- [लाम मय हरकत यानी ’लाम’ मुतहर्रिक है]
’कफ़’ ज़िहाफ़--- से रुक्न का ’मक्फ़ूफ़’ शकल  [ मफ़ाईलु  1221 ] हासिल होगा यानी यहाँ भी -लु - मय हरकत है यानी ’लाम’ मुतहर्रिक है
यानी ये दोनो ज़िहाफ़ अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर नहीं लाए जा सकते कारण कि दोनो में -लाम- मय हरकत है और कोई शे’र का हर्फ़ उल आखिर ’हरकत’ पर नहीं गिरता

और वैसे भी ज़िहाफ़ ;खर्ब’ और ख़रम  तो सदर/इब्तिदा के लिए मख़्सूस है

तो आख़िरी मुक़ाम [यानी अरूज़ और जर्ब पर अब क्या लाएं?  --कुछ नहीं बस हज़ज का सालिम रुक्न 1222 [मफ़ाईलुन] ही ला देते हैं -इसकी तो कोई मुमानियत [मनाही]  नहीं है और शे’र का  हर्फ़ उल आखिर लुन का नून साकिन है

अब बह्र का नाम होगा
[1] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर [आप चाहें तो इसे ’मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर भी कह सकते है-कारण वहीं -जो मैने ऊपर लिखा है।
मगर
 बह्र के नाम करण में अन्य प्रकार से [allied way] से समझने की नौबत ही क्यों सीधे सीधे [explicit way] नाम से और ज़िहाफ़ के अमल से पहचाना जाये तो ज़्यादा आसान होगा
तो मैं इस बह्र को -बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर - नाम से पहचानना चाहूंगा।यानी जैसे जैसे ज़िहाफ़ का क्रम है वैसे वैसे ही ।
 आप की क्या राय है?
अच्छा ! तो फिर मुसम्मन या मुसद्दस क्यों  जोड़ रहें है? जब ;रुक्न’ की संख्या तो साफ़ साफ़ बता रही है कि रुक्न 3 है या 4 है? ठीक .बिल्कुल ठीक। मुरब्ब: मुसद्दस मुसम्मन जर्ब-उल-मिसाल की तरह ज़ुबान पर इतने चढ़ गये है कि छोड़ने का मन नहीं करता ।Double check का काम करेगा।
ख़ैर----

[क] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर 
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु---मफ़ाईलु------मफ़ाईलुन
221--------1221-------1221-------1222
उदाहरण
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से ही लेते है

दुनिया में कोई  दूसरा ऐसा नहीं ऎ हमदम
जैसा ये हसीं मेरा  वतन मेरा ये भारत है 
तक़्तीअ आसान है चाहे तो आप कर सक्ते है--इशारा मै कर देता हूं~

 दुन या   म   /कु ई  दूस /र ऐसा न /हीं ऎ हम दम   ---हर्फ़ गिरा कर दिखा दिया जो शायरी में जायज है

जै सा य / हसीं  मेर / वतन मेरा/ य भा रत है  ----  तदैव--
नोट-यह शे’र एक साख़्ता शे’र [समझाने की गरज से ]बनाया हुआ ]  है जो सिर्फ़  समझाने की गरज से लिखा गया है ---इसे आप कोई मयार का शे’र न समझ लें। चाहें तो आप भी ऐसे शे’र गढ़ सकते है ,कह सकते हैं।
ख़ैर-- ऊपर की वज़न को एक बार ज़रा ध्यान से देखें  मफ़ ऊलु-------मफ़ाईलु------बड़ी दिलचस्प बात निकलेगी। क्या है इसमे?? कुछ नहीं है--बस 2-रुक्न है और क्या । मगर मफ़ऊलु का ’लाम’
 मुतहर्रिक है--सामने म फ़ा.... का मीम और फ़े--मुतहर्रिक है यानी---[दो रुक्न में 3-मुतहर्रिक एक साथ आ गये तो- ’तख़्नीक़’’ का अमल लग जायेगा -अगर आप लगाना चाहें तो]।  तस्कीन-ए-औसत और अमल-ए-तख़्नीक़ के बारे में पहले ही बता चुका हूँ==चाहे तो एक बार आप देख लें -यानी बीच वाला ’मुतहर्रिक --मीम--[जो अभी मुतहर्रिक है] साकिन हो जायेगा। यानी लु म् [2] का हो जायेगा और बचा हुआ हिस्सा --फ़ा ---का वज़न 2 रहेगा
यानी एक नई बहर/वज़न मिल जायेगी
यानी नीचे लिखी बहर भी बरामद होगी [आप एक बार तख़्नीक़ का अमल [रुक्न 2 और 3 पर] करें

[ख] 221---1222---221--1222-  इस बहर का नाम होगा’हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़्फ़ूफ़ मक़्फ़ूफ़ मुख़्नीक़ सालिम अल आख़िर" । मुख़्नीक़---लफ़्ज़ इस लिए जोड़ दिया गया है ताकि सनद रहे कि यह बहर ’तख़्नीक़’ के अमल से बरमद हुई है
एक बात और ---इस तर्तीब   221---1222   // 221---1222  को बह्र-ए-शिकस्ता भी कह्ते हैं  ,जहाँ शे’र के मध्यान्तर में ’अरूज़ी-वक़्फ़ा’ कहते हैं  । बह्र-ए-शिकस्ता के बारे में पहले भी चर्चा कर चुका हूं~
इस बह्र का एक उदाहरण लेते है--
अल्लामा इक़बाल का  एक शे’र है

फिर बाद-ए-बहार आई , इक़बाल ग़ज़ल्ख़्वाँ हो
गुंचा है अगर गुल हो ! गुल है तो गुलिस्तां  हो 

एक हिन्दी फ़िल्म [बारादरी -तलत महमूद का गाया हुआ] है -दो लाईन लिख रहा हूँ। यू ट्यूब पर उपलब्ध है  https://www.youtube.com/watch?v=eOnw5V1SPVs

तस्वीर बनाता हूँ     //तस्वीर नहीं बनती
इक ख़्वाब सा देखा है// ताबीर नही बनती

इसकी तक़्तीअ कर देता हूं~
 2    2  1 - 1 2 2 2   //  2    2   1--1 2 2 2             =  221---1222 // 221--1222
तस् वीर / बनाता हूँ     //तस् वीर / नहीं बन ती
2      2  1  - 1  2 2  2//  2  2 1 - 1 2 2   2 =221---1222 // 221--1222
इक ख़ाब  /स देखा  है// ,ता बीर  नही बन ती यहाँ -से- को -स- [1] की वज़न पर पढ़ लिया जो जायज़ है

अगर आप गाना सुने तो आप को पता चलेगा कि ये कितनी दिलकश बहर है
इसी बहर में इस हक़ीर का भी 1 शे’र बर्दास्त कर लें

देखा तो नहीं तुमको ,लेकिन हो ख़यालों में
सीरत की तेरी मैने ,तस्वीर बना  ली है

 आप तक़्तीअ कर के बता दीजियेगा कि कहीं यह शे’र मैने बहर[वज़न] से ख़ारिज़ तो नहीं कर दिया।
एक बात और--
ये जो बीच में [शे’र के मध्यान्तर मे ]  // का जो निशान देख रहे हैं उसे शायरी के भाषा में ’अरूज़ी वक्फ़ा" [शेर में ठहराव का मुकाम] कहते हैं और इस की ख़ासियत यह है कि जो बात आप कह रहें हो वो  //  के पहले ही ख़तम हो जानी चाहिए यानी दूसरे भाग  // के बाद जा कर बात खत्म न हो। ऐसी बहर को बहर-ए-शिकस्ता भी कहते हैं।  इस मक़ाम पर ऐसा कोई लफ़्ज़ न आ जाये कि तक़्तीअ करते वक़्त कुछ हर्फ़ तो  // के इस पार रहे और बाक़ी हर्फ़ // के उस पार चला जाये ।पहली स्थिति में बहर ’ना-शिकस्ता ’ कहलायेगी  ।।यूं शे’र ज़िन्दा तो रहेगा मगर  आहंग की ख़ूबसूरती ख़त्म हो जायेगी । इस विषय पर डा0 शम्स्सुर्हमान फ़ारूक़ी साहब ने अपनी किताब ---------में विस्तार से चर्चा की है ।ख़ैर --बात निकली तो बात कर ली--
ऊपर जो गाना लिखा है वो ’परफ़ेक्ट’  बहर-ए-शिकस्ता की मिसाल है

[ग] 221---1221----1221----122/1221  इस बहर का नाम होगा ---बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़्फ़ूफ़ महज़ूफ़/मक़्सूर

इस बहर की तुलना ऊपर की बहर [ख] से करें -आप को कोई विशेष अन्तर नहीं लगेगा । लगभग एक ही जैसा है -बस आख़िरी रुक्न में ज़रा सी तब्दीली है और वो तब्दीली है कि सालिम रुक्न ’ मफ़ाईलुन’ पर -’हज़्फ़’ और ’कस्र’ का ज़िहाफ़ लगा है और इसी लिए इसमें महज़ूफ़ और मक़्सूर जोड़ दिया है और इत्तिफ़ाक़न इन  दोनों का  आपस  में ख़ल्त जायज है
एक उदाहरण लेता हूँ [डा0 आरिफ़ हसन ख़ाँ साहब के हवाले से]

आशिक़ हूँ तेरा मैं तो ,मुझे चाहे न चाहे
मैने तुझे चाहा है ,निभाऊँगा हमेशा

मुझे उम्मीद है कि आप इस की तक़्तीअ कर सकते हैं ।चलिए एक कोशिश मैं भी करता हूँ आप भी करें
221-------/ 1221---/1221----/122
आशिक़ हूँ / तेरा मैं तो/ ,मुझे चाहे /न चाहे
221---/1221----/1 2 2 1    /1 2 2
मैने तु/ झे चाहा है /,निभाऊँगा /ह मे शा

[ बह्र की माँग पर यहाँ  मात्राएँ गिराई गईं है जो जायज भी है और रवा भी। आप भी चाहे तो ऐसा ही कोई मिसरा कह सकते हैं-
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अब हम बहर-ए-हज़ज की कुछ मज़ीद बहर पर बात करेंगे
[1] बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अखरब मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर
    मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन----मफ़ाईलुन----   [ ध्यान रहे -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]
    221---------1212--------1222--
उदाहरण---डा0 आरिफ़ हसन खां साहब के हवाले से

जब जब भी वफ़ा का ज़िक्र होता है
आती हैं ज़फ़ायें याद तेरी तब 
 इशारा मैं कर देता हूँ ,तक़्तीअ  आप कर के देख लें और निश्चिन्त हो जायें ----आप भी कुछ ऐसे ही मिसरा/शे’र कह सकते है --कोशिश तो करें।

जब जब भी /   वफ़ा का ज़िक / र होता है
आती हैं     /  ज़फ़ा ये या /    द तेरी तब

[2] बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन----मफ़ाइलुन
221------------1212-------1212            ----   [ ध्यान रहे यहां भी  -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]

उदाहरण---उदाहरण कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से

जो बात यक़ीं से कह रहे हो तुम
बेलाग अगर नहीं तो कुछ  नहीं 

तक़्तीअ कर के देखते हैं
2    2  1 / 1 2  1  2    / 1 2 1 2
जो बात / यक़ीं से कह /रहे हो तुम   [ यहाँ पे -से- और-हो- से [वज़न] गिराया गया है जो रवा है जायज है

2  2 1 /  12 1 2  / 1 2  1  2 
बेलाग / अगर नहीं /तो कुछ  नहीं    [ यहाँ भी  -तो- से वज़न गिराया गया है

[3] बहर-ए-हज़ज  मुसद्दस अखरब मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर
    मफ़ऊलु------मफ़ाईलु------मफ़ाईलुन---
   221---------1221-----------1222- ----  [ध्यान रहे यहां भी  -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]
उदाहरण ---डा0 आरिफ़ खाँ साहब के हवाले से

दुनिया ही बदल दी थी मेरी हमदम
जब तूने मुझे प्यार से देखा  था 

इशारा मैं कर देता हूँ तक़्तीअ आप कर लें--

दुनिया ही/   बदल दी थी / मिरी हमदम  [ यहाँ -ही- पर वज़न गिराया गया है जो रवा है और जायज़ है ]
जब तूने  /मुझे प्यार / से देखा  था         [ यहाँ -ने- और -से पर वज़न गिराया गया है जो रवा है और जायज़ है

अस्तु

अब अगले क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के कुछ और ऐसी ही मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-

आप अपनी राय से मुझे   akpathak3107@gmail.com पर अवगत करा सकते हैं।

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : मिलेगा जब भी वो हम से---

एक ग़ज़ल : मिलेगा जब भी वो हमसे---

मिलेगा जब भी वो हम से, बस अपनी ही सुनायेगा
मसाइल जो हमारे हैं  , हवा  में  वो   उड़ाएगा

अभी तो उड़ रहा है आस्माँ में ,उड़ने  दे उस को
कटेगी डॊर उस की तो ,कहाँ पर और जायेगा ?

सफ़र में हो गया तनहा ,तुम्हारे  साथ चल कर जो
वो यादों के चरागों को  जलायेगा  ,बुझायेगा

कहाँ तक खींच कर लाई ,तुझे यह ज़िन्दगी प्यारे
अगर तू लौटना चाहे , नहीं  तू  लौट पायेगा

इस आँगन का शजर है बस इसी उम्मीद में ज़िन्दा
परिन्दा जो गया है छोड़ , वापस लौट आयेगा

वो रिश्तों की लगाता बोलियाँ बाज़ार में जा कर
जिसे करनी तिजारत है वो रिश्ते क्या निभायेगा

अरे ! क्या सोचता रहता यहाँ पर बैठ कर ’आनन’
गये हैं लोग सब कुछ छोड़ ,तू  भी  छोड़ जायेगा 

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर---

एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर--

छुपाते ही रहे अकसर ,जुदाई के दो चश्म-ए-नम
जमाना पूछता गर ’क्या हुआ?’ तो क्या बताते हम

मज़ा ऐसे सफ़र का क्या,उठे बस मिल गई मंज़िल
न पाँवों में पड़े छाले  ,न आँखों  में  ही अश्क-ए-ग़म

न समझे हो न समझोगे ,  ख़ुदा की  यह इनायत है
बड़ी क़िस्मत से मिलता है ,मुहब्बत में कोई हमदम

हज़ारों सूरतें मुमकिन , हज़ारों  रंग भी मुमकिन
मगर जो अक्स दिल पर है किसी से भी नहीं है कम

ख़िजाँ का है अगर मौसम ,दिल-ए-नादाँ परेशां क्यूँ
सभी मौसम बदलता है  ,बदल जायेगा ये मौसम

नहीं देखा सुना होगा  ,जुनून-ए-इश्क़ क्या होता
कभी ’आनन’ से मिल लेना ,समझ जाओगे तुम जानम

-आनन्द.पाठक-