शनिवार, 3 नवंबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 51 [बह्र-ए-मुज़ारे’: भाग-2 और अन्तिम]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 51 [बह्र-ए-मुज़ारे’:  भाग-2  और अन्तिम]

[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

पिछली क़िस्त 50 में   ’बह्र-ए-मुज़ारे’ के बारे में कुछ चर्चा की थी । इस क़िस्त में मुज़ारे’ की कुछ मक़्बूल बह्रों  की चर्चा करेंगे।
यह बह्र इतनी मक़्बूल और दिलकश है कि ’मीर’ ने इस का कसरत से [प्रचुरता से]  प्रयोग किया है
अब बह्र-ए-मुज़ारे’ के  कुछ प्रचलित और लोकप्रिय आहंग ---

[क] मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ सालिम अल आखिर
मफ़ऊलु---फ़ाअ’लातु---मफ़ाईलु---फ़ाअ’लातुन           [ यहां -अ’- को आप समझ लें कि ’मुतहर्रिक है और -1- से दर्शाया गया है]
221--------2121-------1221----2122
डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से

मैं वक़्त के ग़ुबार में खो जाउँगा किसी दिन
ज़िन्दा रहोगे तुम तो मेरी शायरी में लेकिन

यहाँ तक़्तीअ’ करने की ज़रूरत तो नहीं है ,आप अब खुद भी कर सकते हैं ।  आप कहें तो कर देता हूं
2  2    1  / 2 1  2  1  / 1 2   2 1 /  2  1 2  1
मैं वक़् त / के ग़ु बार / में खो जाउँ/ गा किसी दिन
2     2   1 /  2 1   2   1  / 1  2  2 1  / 2 1 2 2
ज़िन् दा र/ हो गे तुम  तो /मि री शाय /री में ले किन

अब यह मत पूछियेगा कि यहाँ -में--ऊँ---तो--आदि को -1- के वज़न पर क्यों लिया
कारण साफ़ है---एक तो बह्र में वज़न की माँग है । दूसरा यह  कि ये सब अर्कान के  मुतहर्रिक [1] के मुकाम पर आ भी रहे है  और यह सब मुतहर्रिक हैं भी जो अरूज़ के ऐन मुताबिक भी है

[ख] मज़ारि’अ मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़--मकफ़ूफ़ मुख़्न्निक़ सालिम अल आखिर \मुस्बीग़
मफ़ऊलु---फ़ा’अलातुन-//--मफ़ऊलु---फ़ा’अलातुन\ फ़ा’अल्लियान
221--------2122------//--221-----2122
यह बह्र --बह्र-ए-शिकस्ता है यानी दूसरे रुक्न के बाद ’अरूज़ी वक़्फ़ा’ है यानी लाजिमी है
ग़ालिब की ग़ज़ल  का एक शे’र है

उस शमअ’ की तरह से ,जिसको कोई बुझा दे
मैं भी जले हुओं में  , हूँ   दाग़-ए-ना तमामी 

इसकी तक़्तीअ’ भी कर के देख लेते हैं
2     2     1   / 2  1  2 2  //  2      2   1  / 2 1 2 2
उस शम अ’ /की त रा से // ,जिस को कु / ई बुझा दे
2    2  1  /  2 1 2  1  //  2   2   1 /  2  1 2 2
मैं भी ज / ले हुओं में  // , हूँ   दाग़-/ ना तमामी
 मैने पहले भी कहा है कि ये बह्र इतनी मक़्बूल और दिलकश बह्र है कि अमूमन हर शायर ने इसमे शायरी की है
कुछ चन्द अश’आर दीगर शायरों के आप की ज़ेर-ए-नज़र पेश कर रहा हूँ --आप भी लुत्फ़ अन्दोज़ होइए । अगर फ़ुर्सत मिले तो लगे हाथ तक़्तीअ भी कर लें -तो आप मुतमय्यिन हो सकते हैं

देखा करूँ तुझी को ,मंज़ूर है तो ये है
आँखें न खोलूँ तुझ बिन .मक़दूर है तो ये है      --मीर तक़ी ’मीर’

रहने की कोई जागह ,शायद न थी उन्होंके
जो याँ से उठ गए हैं फिर वो कभू न आए  मीर तक़ी ’मीर’ 
[ नोट-- जागह---उन्होंके----कभू--- ये सब मीर के ज़माने की भाषा है]

हाँ किसको है मयस्सर ,यह काम कर गुज़रना
एक बांकपन से जीना . इक बांकपन से मरना जिगर मुरादाबादी

उस से भी शोख़तर हैं उस शोख़ की अदाएँ
कर जाएँ काम अपना ,लेकिन नज़र न आएँ जिगर मुरादाबादी

अगर आप को नागवार न गुज़रे --तो 1-2 अश’आर इस हक़ीर का भी बर्दाश्त कर लें

पर्दा तो तेरे रुख़ पर ,देखा सभी ने लेकिन
देखा तुझे नुमायां ख़ुर्शीद  में ,क़मर  में

आए गए हज़ारों .इस रास्ते पे  ’आनन’
तुम ही नहीं हो तनहा, इस इश्क़ के सफ़र में

ऐसे बहुत से अशाआ’र/ग़ज़ल दीगर शोअ’रा के मिल जायेंगे
एक बात और
आख़िर के रुक्न 2122 [फ़ा’अलातुन] की जगह ’फ़ा’अलय्यान’ [ 21221]  भी लाया जा सकता है }

[ग] मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ऊलु---फ़ा’अलातु--मफ़ाईलु--फ़ा’इलुन\फ़ा’इलान
221--------2121-----1221------212   \2121
ग़ालिब का एक मशहूर शे’र है

अर्ज़-ए-नियाज़-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

अब तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
  2   2  1  /  2  1  2   1  / 1 2    2    1  / 2  1 2 
अर् जे-नि /याज़-इश् क़/  के क़ा बिल न /हीं रहा
2       2    1  / 2 1  2  1/  1  2  2   1    / 2 1 2
जिस दिल पे /नाज़ था मु /झे वो दिल न   /हीं रहा
यह महज़ूफ़ की मिसाल है
अच्छा एक बात ---अगर मिसरा सानी में -’ जिस दिल पर नाज़ था मुझे---’ होता तो क्या होता?
मानी में तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता -पर शे’र में इब्तिदा’ के मुक़ाम पर जो रुक्न आयद है -मफ़ऊलु- [जिस दिल पर] वज़न से ख़ारिज़ हो जाता क्योंकि -पर - सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है और -2-का वज़न देता जब कि -पे- 1 का वज़न दे रहा है और मुतहर्रिक भी है -लु- के मुक़ाबिल है या फिर शायर -पर- को  -प- ही पढ़ेगा और वज़न दे कर पढ़ेगा।
मैने पहले भी कहा है कि ये बह्र इतनी मक़्बूल और दिलकश बह्र है कि अमूमन हर शायर ने इसमे शायरी की है
ग़ालिब के ही कुछ चन्द मज़ीद [अतिरिक्त] अश’आर इसी बह्र में पेश करते है

रोने से और इश्क़  में बेबाक हो गए
धोए गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए -  ग़ालिब

’ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहे जिसे -ग़ालिब

अपने हुदूद से न बढ़े कोई इश्क़ में
जो ज़र्रा जिस जगह है वहीं आफ़ताब है             -जिगर मुरादाबादी

दिल की ख़बर न होश किसी को जिगर का है
अल्लाह , अब ये हाल तुम्हारी  नज़र का  है  -जिगर मुरादाबादी

था मुस्तआर हुस्न से उसके जो नूर था
ख़ुर्शीद में भी उसका ही ज़र्रा ज़हूर  था मीर तक़ी ’मीर’

जब रफ़्तनी को इश्क़ का आज़ार हो गया
दो चार दिन में बरसों का बीमार  हो गया मीर तक़ी ’मीर’

अगर आप को नागवार न गुज़रे --तो 1-2 अश’आर इस हक़ीर का भी बर्दाश्त कर लें

अच्छा हुआ कि आप ने देखा न आइना
इल्जाम ऊगलियों पे लगाने का शुक्रिया


आने लगा है दिल को यकीं तेरी बात का 
फिर से उसी पुराने बहाने  की बात  कर 

[घ] मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुख्ननीक़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ऊलु---फ़ाअ’लातुन---मफ़ऊलु--फ़ा’अ लुन\फ़ा’अ लान
    221---2122---221---212-\ 2121
इसे मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब.सालिम.अख़रब,महज़ूफ़\मक़्सूर भी कह सकते हैं
कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से एक मिसाल

ज़ख़्मी नहीं हुआ है कोई भी और शख़्स
लिखे है पत्थरों पे अहल-ए-नज़र के नाम 

एक बार तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
2      2    1 / 2 1 2 2   /  2 2 1  / 2  1 2
ज़ख़ मी न / हीं हुआ है /कोई भी/  और शख़् स्
2       2    1 /   2 1 2 2  /   2   2   1 / 2   1  2  1
लिख खे  है /पत् थरो पर / अह ले -न/ ज़र के नाम
एक स्पष्टीकरण [वज़ाहत]
मिसरा ऊला मे ’शख़्स" को 2 1 2 के वज़न पर क्यों लिया ?, 2 1 2 1  के वज़न पर क्यों नहीं लिया ?
ले सकते है -यहाँ ले सकते है --कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा
मगर तक़्तीअ’ के क़ायदा के मुताबिक --अगर किसी  लफ़्ज़ के अन्त में दो साकिन [ दोस्त--गोस्त--दुरुस्त शख़्स ---जैसे शब्द आ जाए तो तक़्तीअ’ में एक ही साकिन शुमार करते  है]
मिसरा सानी में ’लिख्खे हैं ’ क्यों लिया ?--’लिखे हैं ’ क्यों नहीं लिया ?
जी बिल्कुल सही ,दुरुस्त हैं आप
कारण साफ़ है --लिखे हैं---मक़्तूबी [ किताबत /लिखा हुआ] है जब कि -’लिख्खे हैं -- [ मलफ़ूज़ी /उच्चारित किया हुआ] है । तक़्तीअ’ में ’मल्फ़ूज़ी हर्फ़ ही शुमार करते है
एक बात और -- यहां बह्र में वज़न की माँग भी है और शायर लय और प्रवाह क़ायम रखने के लिए ’लिख्खे’ है ही पढ़ेगा
फिर आप कहेंगे " पत्थरों पर " को  ’पत्थरों पे’  क्यों नहीं लिया । आप ले सकते है --यहाँ दोनो चलेगा --कारण कि दोनो ही [-पे- और पर-] सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है और दोनो ही  ”फ़ाअ’लातुन’ के -तुन- [सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ] के मुक़ाम पर आयेगा
मगर जब आप के पास  better option है तो -पर- ही क्यों न लें सही लफ़्ज़ भी है । हाँ अर्कान के लिहाज़ से कोई मज़बूरी होती तो -पे- ही लेते
[च] मुज़ारे मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ाईलु---फ़ा’अलातु---मफ़ाईलु---फ़ा’अ लुन\ फ़ा’अ लान
1221-------2121-----1221------212----\2121
[ध्यान दीजियेगा -- इस वज़न को ऊपर [ग] की वज़न से confuse न कीजियेगा। कारण कि [ग] के सदर/इब्तिदा के मुक़ाम पर मुज़ाहिफ़ ’अख़रब’ --मफ़ऊलु--[221] है जब कि इस बह्र में सदर/इब्तिदा के मुक़ाम पर मुज़ाहिफ़ मक्फ़ूफ़ [मफ़ाईलु--1221] है
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से एक मिसाल देखते हैं

 जिसे जान से ज़ियादा कभी था अज़ीज़ मैं
वो कल राह में मिला तो मुझे अजनबी लगा

मुझे नहीं लगता कि अब आप को इसकी तक़्तीअ’ की ज़रूरत पडेगी। कारण कि यह साहब का ख़ुद साख्ता शे’र बतौर -ए-मिसाल है तो वज़न में होगा ही
चलिए आप का हुकुम है तो एक बार कर के देख लेते है 

जिसे जान / से ज़ियाद: /कभी था अ/ ज़ीज़ मैं
वो कल राह /में मिला तो /मुझे अज न /बी लगा

{छ]  मज़ारि’अ मुसम्मन अख़रम मक्फ़ूफ़  मुख़न्नीक़ मुसब्बीग़
मफ़ऊलुन----फ़ा’अला तुन---मफ़ऊलुन----फ़ा’अ लिय्यान
222----------2122----------222---------21221
आप जानते हैं कि ’मुफ़ाईलुन’ [1222] का ’अख़रम’ ’मफ़ऊलुन [2 2 2] होता है --यानी ’मुफ़ा’[1 2] वतद-ए-मज्मुआ का सर -मु- [1] ख़रम [ ख़त्म या सर कलम--हा हा हा] कर दीजिए--तो बचा -फ़ाईलुन [222] --जिसे मफ़ऊलुन [2 2 2] से बदल लीजिए। आप के मन में एक सवाल उठ रहा होगा --कि सालिम रुक्न पर ज़िहाफ़ लगाने से जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होती है --उसे अरूज़ी किसी ’हम वज़न’  दीगर रुक्न से बदल क्यों लेते है? ऐसा सवाल मेरे मन मैं भी उठा था।
जवाब सीधा है--- आप न बदलना चाहे न बदलें --जब तक वज़न बराबर है तब तक कोई कबाहट नहीं है । मगर अरूज़ में इतने ज़िहाफ़ हैं कि उनकी बदली हुई शकले [मुज़ाहिफ़] बरामद होंगी कि  हमको/आप को याद रखना मुशकिल हो जायेगा 
अत: अरूज़ियों ने इसका रास्ता निकाला कि ऐसे बरामद मुज़ाहिफ़ को ’कुछ standard अर्कान ’ जो हम वज़न हो --से बदल कर लें। और ऐसे ’standard अर्कान" }"
20-22 के आसपास बैठते हैं।
अब मूल विषय पर आते है---मज़ारि’अ मुसम्मन अख़रम मक्फ़ूफ़  मुख़न्नीक़ मुसब्बीग़ पर--एक उदाहरण देखते है । डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

ये दुनिया का तमाशा दो दिन का खेला है यार
जब आँखें बन्द होंगी फिर कुछ भी तो नहीं यार

इसकी तक्तीअ’ आप कर लें--- टुकड़े मै कर देता हूँ

ये दुनिया / का तमाशा / दो दिन का /खेल  है यार
जब आँखें / बन् द होंगी/  फिर कुछ भी / तो नहीं यार


-----------
इस बह्र के मुसद्दस वज़न के बहूर भी मुमकिन है
यहाँ सब का ज़िक्र करना ज़रूरी तो नहीं ,मात्र  उनके वज़न की चर्चा कर दे रहा हूँ । आप चाहें तो इन बहूर में तबअ’ आजमाई [शायरी की कोशिश] कर सकते है या कहीं से आप को उदाहरण भी मिल जाए----वैसे अमूमन सभी शायरों ने ज़्यादातर ’ मुसम्मन’ में ही शायरी की है और वो भी ’अख़रब,---मक्फ़ूफ़---महज़ूफ़--मक्सूर के मुज़ाहिफ़ शकल में और कुछ तख़्नीक़ के अमल से प्राप्त वज़न में भी ।

कुछ मुसद्दस शकलें---
[प] मुज़ारे’ मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन---फ़ाअ’लातुन
1222---------1222------2122

[ज]  मुज़ारे’ मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़
मफ़ऊलु----फ़ा’अ लातु---मफ़ाईलुन
221-------2121---------1222

[झ] मुज़ारे’ मुसद्दस अख्रब मक्फ़ूफ़ मुख़्न्नीक़
मफ़ऊलु----फ़ा’अलातुन----मफ़ऊलुन
221----------2122---------222
[त]  मुज़ारे’ मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ऊलु-----फ़ा’अ लातु----फ़ऊलुन\ फ़ऊलान
221-----------2121--------122  \1221
[थ] मुज़ारे’ मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ मुख़्न्नीक़\मक़्सूर
मफ़ऊलु------फ़ा’अ लातुन--फ़े लुन \फ़े लान
221----------2121----------22  \ 221
[द] मुज़ारे’ मुसद्द्स अख़रब मक्फ़ूफ़ मज्बूब \अहतम
मफ़ऊलु----फ़ा’अ लातु---फ़े’अल\ फ़ऊलु
221---------2121--------12   \ 121
[ध] मुज़ारे’ मुसद्दस मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ \मक़्सूर 
मफ़ाईलु----फ़ा’अलातु---फ़ऊलुन-\ फ़ऊलान
1221-------2121-------122-\1221
[ट] मुज़ारे’ मुसद्द्स मक़्बूज़ 
मफ़ा इलुन----फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन
1212---------2122-------1212
इसके अलावा  तख़नीक़ के अमल से और भी वज़न बरामद हो सकते है
मैं यह तो दावा नहीं कर सकता कि बह्र-ए-मुज़ारे’ के सारे वज़न पर बातचीत कर ली -मगर हाँ काफ़ी कुछ कर ली।

अब अगली क़िस्त में एक नए बह्र पर बातचीत करेंगे
अस्तु
{क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 50 [बह्र-ए-मुज़ारे’ : भाग-1]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 50 [बह्र-ए-मुज़ारे’ : भाग-1]

मित्रो ! पिछली क़िस्त में मैने ’बह्र-ए-मुन्सरिह’ पर बातचीत की । अब इस क़िस्त में  ’ बह्र-ए-मुज़ारे’" की चर्चा करेंगे।
[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

बह्र-ए-मुज़ारे’ भी एक मुरक़्क़ब बह्र [ यानी मिश्रित बह्र] है जो दो ’अर्कान’ के मेल से बनता है
यह बह्र उर्दू शायरी में एक ख़ुश आहंग ,दिलकश और मक़्बूल [मधुर और लोकप्रिय] बह्र है और अमूमन सभी शायरों ने इस बह्र में  अपनी ग़ज़ल कही हैं।
इस बह्र का बुनियादी अर्कान है " मफ़ाईलुन [1222] + फ़ाअ’लातुन [2122] यानी  "a,b'
अगर इस बहर की ’मुसद्दस’ शकल लिखनी हो तो
अर्कान होंगे  a -a-b =यानी  मफ़ाईलुन---मफ़ा ई लुन--फ़ाअ’ ला तुन
अगर इस बह्र की ’मुसम्मन शकल लिखनी हो तो
अर्कान होंगे a-b--a-b = यानी मफ़ाईलुन---फ़ाअ’लातुन---मफ़ाईलुन---फ़ाअ’ लातुन
वैसे ज़्यादातर शायरों ने इस बह्र के मुसम्मन शकल में ही शायरी की है

एक बात और
बह्र--ए-रमल का बुनियादी रुक्न ’ :फ़ाइलातुन " [2122] होता है-और इस रुक्न का एक शकल ’फ़ा’अ लातुन [2122] भी होता है ।
तो क्या दोनों ’फ़ाइलातुन’ क्या  एक है???
जी नहीं --गो [यद्दपि] -वज़न [2122] तो  दोनो का एक ही  है पर दोनों में एक बुनियादी फ़र्क़ है और वह फ़र्क़ है उनकी बुनावट में ,इसके लिखने के अन्दाज़ में ।यानी ’मलफ़ूज़ी’ [बोलने के लिहाज़ से]तौर पे तो एक है मगर ’मक्तूबी’[लिखने के लिहाज़ से] तौर पे अलग है ।
[क] रमल का ’फ़ाइलातुन’ [2122] = [फ़ा]सबब_ए-ख़फ़ीफ़ [2] +इला [ वतद-ए-मज्मुआ] [12]+ तुन [सबब-ए-ख़फ़ीफ़] [2]
= सबब+वतद+सबब 
= 2     +    1  2+ 2 = 2122
[ख] मुज़ारे’ का ’फ़ा’अलातुन’ [2122]=  फ़ा’अ [वतद-ए-मफ़रूक़] 21 + ला [ सबब--ए-ख़फ़ीफ़] 2 + तुन [ सबब-ए-ख़फ़ीफ़]2
=    वतद + सबब+ सबब
=    21     + 2+   2 = 2122
वज़न तो एक है --मगर बुनावट में फ़र्क है
पहली शकल [क] को ---फ़ाइलातुन -की मुतस्सिल शकल [यानी  हर्फ़-ए-ऐन  सिलसिलेवार मिला कर लिखा गया है ।
दूसरी शकल  [ख]  को ---फ़ाइलातुन -- की मुन्फ़सिल शकल कहते है यानी हर्फ़े--ऐन- को ’फ़ासिला’ दे कर लिखा गया है

जहाँ तक ’इमला’ [लिखने का तरीक़ा] का सवाल है वह आप की मरजी पर है -ज़रूरी नहीं कि आप मुतस्सिल शकल में लिखें या मुन्फ़सिल शकल में लिखें --तलफ़्फ़ुज़ और वज़न तो एक जैसा रहेगा---ऐन-- फिर भी मुतहर्रिक ही रहेगा--- बात तो बस समझने की है कि बह्र में शकल कौन सी है तो ज़िहाफ़ात कौन से लगेंगे।मेरा ज़ाती ख़याल है कि इमला अलग अलग लिखें तो समझने और ज़िहाफ़ात  लगाने और समझने में आसानी होगी।
पहली शकल [क] में  -वतद- वतद-ए-मज्मुआ की शकल में है [यानी हरूफ़ हरकत+हरकत+ साकिन] की शकल में है--यानी दो हरकत ’जमा’ हो कर आए है [इसी लिए ’मज्मुआ’ कहा गया} । इस पर लगने वाले ज़िहाफ़ात अलग होते हैं जैसे --ख़्बन--मरफ़ू--क़त’अ ---अह्ज़---मज़ाल  वग़ैरह वग़ैरह
दूसरी शकल [ख] में  वतद --वतद-ए-मफ़रूक़ की शकल में है [यानी हरूफ़ हरकत+साकिन+हरकत ] की शकल में है -यानी दो हरकत के बीच में ’फ़र्क़’ हो गया इसी लिए ’मफ़रूक़’ कहा गया। इस पर लगने वाले ज़िहाफ़ अलग होता है -जैसे--क़ब्ज़--कफ़--हज़्फ़---कस्र---वग़ैरह वग़ैरह
अबद--असर--हुकम [हुकुम] ---इरम---क्या है ? वतद तो है ---मगर कौन सा वतद?
"वतद -ए-मफ़् रूक" कि मिसाल तो मिलेगी नहीं क्योंकि उर्दू का कोई लफ़्ज़ ’हरकत’ पर गिरता नहीं [यानी मुतहर्रिक नहीं होता।
मगर ऐसे युग्म शब्द जो ’इत्फ़’ या ’कसरा-ए-इज़ाफ़त’ से बनते  हैं --नज़र-ए-इनायत---शौक़-ए-ह्बीब जैसे लफ़्ज़--जिसमें नज़र के -र- पर हरकत या शौक़ के-क़- पर हरकत आ गई है तो ’ नज़र’ और ’शौक़’  यहां~ पर ’वतद-ए-मफ़रूक़” की वज़न पर आयेगा
[नोट- सबब--वतद की परिभाषा  पर -- शुरू की किस्तों में चर्चा कर चुका हूँ] या किसी भी अरूज़ की मुस्तनद [प्रामाणिक] किताब में मिल जायेगी

अब आप यह कहेंगे कि यहाँ पर इसकी चर्चा करने की क्या ज़रूरत है?

जी ज़रूरत है। इन दोनो शकलों पे लगने वाले यानी ’फ़ाइलातुन’[मुतस्सिल] और ’फ़ाइलातुन’ [मुन्फ़सिल] के  ज़िहाफ़ात अलग अलग होते है जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं

कहते हैं ’अरूज़’ एक नीरस विषय है ,मुश्किल है समझना। पहले मैं भी ऐसा ही समझता था--मगर सच पूछें तो ’अरूज़’ बहुत ही दिलचस्प और आसान विषय है --बहुत आसान है समझना इसका-एक बार समझ लेंगे तो इससे खेलने में बड़ा मज़ा आता है -शर्त यह कि बस प्यास बनी रहनी चाहिए
 चलिए एक दिलचस्प बात और
’मफ़ाईलुन ’ 1222 में = वतद +सबब+सबब= यानी दो सबब एक साथ आ गए
तो क्या?
तो .इस पर ’मुरक़्बा" की क़ैद लग जायेगी। अब आप कहेंगे कि यह ’मुरक़्बा" कौन सी बला है
यह क़ैद अरबी अरूज़ियों ने तज़्बीज की ।जैसे  [1]  मुअ’कबा  [2] मुरक़बा  [3] मुकनफ़ा
हालाँकि इन तीनो की परिभाषा और व्याख्या गुज़िस्ता क़िस्त 45 में विस्तार से कर चुका हूँ फिर भी आप की सुविधा के लिए एक बार पुन: संक्षेप में ’मुरक़्बा  और मुअ’कबा ’ की चर्चा कर लेते हैं और बह्र-ए-मुज़ारे’ में  इसकी क्या ज़रूरत है
 मुरक़बा :-अगर किसी एकल रुक्न मे [ Single Rukn ] -यदि दो consecutive सबब एक साथ आ जायें तो उसमें से किसी एक सबब पर उचित ज़िहाफ़ अवश्य [must] लगेगा।या लगना चाहिए।  और यह भी कि एक साथ दोनो सबब के ’साकिन’
’साकित’ भी नहीं हो सकते

यहाँ रमल के फ़ा इला तुन [2122 में ’ मुरक़्बा’ की क़ैद नहीं लगेगी कारण कि वहाँ बुनावट " सबब--वतद---सबब ’ की है मगर मुज़ारे’ के ’फ़ाअ’ ला तुन’ [2 1 2 2] में मुरक़्ब्बा की क़ैद लग जायेगी --कारण कि इसकी बुनावट " वतद---सबब--सबब" की है और दोनो सबब एक साथ भी consecutively आ गए हैं } तो क्या? इसका मतलब ये हुआ कि "मुज़ारिअ बह्र ’ में फ़ाइलातुन’[2122] अपने सालिम शकल में प्रयोग नहीं हो सकता --जब भी होगा तो ’मुज़ाहिफ़’ शकल में ही प्रयोग होगा [ मुरक़्बा की वज़ह से]
अब एक बात और
तो फिर ’फ़ा’अ ला तुन" [2122] में भी तो ’दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ --ला---और --तुन-- एक साथ आ रहे है -तो इस पर ’मुरक़्बा’ की क़ैद क्यों नहीं ?
बिल्कुल सही। अरबी अरूज़ियों ने इस पर भी क़ैद लगा रखी है ---एक दूसरी तरह की क़ैद । और उस क़ैद का नाम है --मु’अकबा--
हाँला कि इसकी परिभाषा और व्याख्या गुज़िस्ता क़िस्त 45 में विस्तार से कर चुका हूँ फिर भी आप की सुविधा के लिए एक बार पुन: ’- मु’अकबा ’ की चर्चा कर लेते हैं और बह्र-ए-मुज़ारे’ में  इसकी क्या ज़रूरत है

[1] मु’अकबा : अगर किसी एक रुक्न में  या दो रुक्न  के बीच में  दो consecutive सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आ जाय तो उसमें से एक ही सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ज़िहाफ़ लगेगा --दोनो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर एक साथ ज़िहाफ़ नहीं लगेगा। या नहीं लगेगा तो -फिर किसी भी सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर  नही लगेगा। यही कारण है कि मुज़ारे’ बह्र में ’फ़ाअ’लातुन’ -सालिम शकल में लाया जा सकता है क्यों कि इस पर ज़िहाफ़ लगाना - MUST- नहीं है 

अब उन ज़िहाफ़ात की भी चर्चा कर लेते है जो मफ़ाईलुन [1222] और फ़ा’अ लातुन [2122] पर बह्र-ए-मज़ारि’अ के सन्दर्भ में  लग सकते हैं और लगते हैं
मफ़ाईलुन [1222} + ख़र्ब  = अख़रब  ’मफ़ऊलु [221] 

मफ़ाईलुन [1222] [बह्र-ए-मुज़ारे’ के सन्दर्भ में ] लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ात---
मफ़ाईलुन [1222] +ख़र्ब (ख़रम+कफ़] = अख़रब =मफ़ऊलु [221]
मफ़ाईलुन [1222] + कफ़ = मक्फ़ूफ़=मफ़ाईलु [1221]  

फ़ाअ’लातुन [2122] [बह्र-ए-मुज़ारे’ के सन्दर्भ में ] लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ात --
फ़ाअ’लातुन [2122] +कफ़ = मक्फ़ूफ़ = फ़ाअ’लातु [2 121 ]
फ़ाअ’लातुन [2122] + हज़्फ़= महज़ूफ़ = फ़ाअ’लुन [212]
फ़ाअ’लातुन [2122]+ क़स्र = मक़्सूर    = फ़ाअ’लान [ 2121]

एक बात और स्पष्ट कर दे---जो मुज़ाहिफ़ सालिम बह्रों [यानी सालिम मफ़ाईलुन या सालिम फ़ाअ’लातुन ]के आहंग में आयें उन्हें सब का सब मुरक्क़ब बह्रों में रखना मुनासिब नहीं

चूँकि बह्र में [कई जगह--जो आगे देखेंगे] ’तीन हरकत ’[या तो एक ही रुक्न में या दो रुक्न मिला कर] एक साथ आ जाते हैं तो इन मुज़ाहिफ़ वज़न पर ’तस्कीन-ए-औसत’ या तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है और इस से चन्द मज़ीद आहंग और भी बनाए जा सकते हैं । तस्कीन-ए-औसत और तख़्नीक़ के निज़ाम के बारे में पिछले क़िस्तों में चर्चा कर चुका हूँ आप चाहें तो देख सकते है

वैसे तो इस बह्र में मुरब्ब: ,मुसद्दस और मुसम्मन के सैद्धान्तिक रूप से कई आहंग मुमकिन है जिसमें से कुछ तो बहुत ही दिलकश लोकप्रिय [मानूस] मक़्बूल आहंग है ---कुछ कम प्रचलित है लेकिन हम उन्हीं आहंग की चर्चा करेंगे जो काफ़ी लोकप्रिय हैं और उस्ताद शायरों ने अपनी शायरी की है। सभी आहंग में शायरी करना   [सैद्धान्तिक रूप  ] सम्भव तो है मगर ज़रूरत नहीं है और कोई भी शायर सभी मुमकिनात आहंग में शायरी करता भी नहीं ---सभी शायरों के कुछ चुनिन्दा और पसन्ददीदा आहंग  होते है जिसमें वोह शायरी करते हैं --मगर अरूज के लिहाज़ से चर्चा करने में क्या हर्ज है

अगले क़िस्त में बह्र-ए-मुज़ारे’ के ऐसे ही कुछ मक़्बूल आहंग की चर्चा करेंगे

-----------------------
{क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

-आनन्द.पाठक-

चन्द माहिया :क़िस्त 55

चन्द माहिया : क़िस्त 55

:1:
शिकवा न शिकायत है
जुल्म-ओ-सितम तेरा
क्या ये भी रवायत है

:2:
कैसा ये सितम तेरा
सीख रही हो क्या ?
निकला ही न दम मेरा

  :3:
छोड़ो भी गिला शिकवा
अहल-ए-दुनिया से
जो होना था सो हुआ

:4:
इतना ही बस माना
राह-ए-मुहब्बत से
घर तक तेरे जाना

:5:
ये दर्द हमारा है
तनहाई में बस
इसका ही सहारा है

-आनन्द पाठक--

रविवार, 14 अक्तूबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 49 [ बह्र-ए-मुन्सरिह]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 49 [ बह्र-ए-मुन्सरिह]

[ Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है ]

मित्रो ! एक अन्तराल के बाद इस ब्लाग पर लौटा हूँ
पिछली क़िस्तों से  मुरक़्क़ब बह्रों की चर्चा कर रहा हूँ और इस कड़ी में अबतक -" बह्र-ए-तवील"- बह्र-ए-बसीत---और बह्र-ए-मदीद की चर्चा कर चुका हूँ
आज अब इस क़िस्त में -"बह्र-ए-मुन्सरिह"- की चर्चा करूँगा
स्प्ष्ट है --मुन्सरिह - एक मुरक़्क़ब बह्र है जो दो सालिम अर्कान ---मुस तफ़ इलुन ---+ मफ़ऊलातु---से मिल कर बनता है जिसे हम सब --2212, 2221 [a, b]  की अलामत से दिखाते या समझते हैं
यूँ तो अरबी शायरी में यह "मुसद्दस ’ शकल [a--b--a ] में ही इस्तेमाल होती है  मगर उर्दू और फ़ारसी में ’मुसम्मन " [[a--b--a--b] शकल में इस्तेमाल होती है और वह भी मुज़ाहिफ़ शकल में ।
यह बह्र अपनी सालिम शकल में इस्तेमाल हो भी नही सकती ।
 कारण?
कारण साफ़ है --जो -- रुक्न 'b'  है वह ’मफ़ऊलातु’ [2221]  और -तु- पर हरकत है यानी मुतहर्रिक है
और आप जानते हैं कि उर्दू शायरी में --किसी मिसरा [शे’र ] का हर्फ़ उल आख़िर [यानी आख़िरी हर्फ़] --मुतहर्रिक- नहीं होता । अगर बह्र मे इसको सालिम शकल में इस्तेमाल करेंगे तो ’अरूज़’ और जर्ब के मुक़ाम पर ’मफ़ऊलातु’ आ जायेगा यानी हर्फ़ उल आखिर -तु- मुतहर्रिक आ जायेगा जो उचित नहीं है
तो फिर ?
कुछ नहीं -मफ़ऊलातु- की मुज़ाहिफ़ शकल प्रयोग करेंगे जिसके आखिर में --हर्फ़-ए-साकिन -आता हो
एक बात और--वैसे  भी उर्दू शायरों ने इस बह्र में कम ही शायरी की है
---
ज़ाहिर है कि इस बह्र में वही ज़िहाफ़ लगेंगे जो .मुसतफ़इलुन [2212] और मफ़ऊलातु [2221] पर लग सकते है पर क़ैद यह कि ------मुअ’क़बा----मुरक़बा--मुकनफ़ा --के  तहत हो । इन क़ैद की चर्चा मैं क़िस्त 45 में कर चुका हूं।
मफ़ ऊलातु [2221] पर लगने वाले कुछ मुख्य ज़िहाफ़ात -----

[1] मफ़ऊलातु [2221] + तय्यी = मुत्तवी= फ़ाइलात [2121]  इसमें आखिरी-त [यानी  ते- साकिन है जिससे इस मुज़ाहिफ़ को शे’र में अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर लाया जा सकता है [ मफ़ऊलातु [2221] को नहीं जा सकता जैसा कि ऊपर बताया है
[2] मफ़ऊलातु [2221]+ वक़्फ़ = मौक़ूफ़ = मफ़ऊलान [2221] -इसमें भी आखिर न [यानी नून] साकिन है इस मुज़ाहिफ़ को भी शे’र में अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर लाया जा सकता है 
[3] मफ़ऊलातु [2221] + तय्यी+ कस्फ़  =   मुत्तवी मक्सूफ़ फ़ाइलुन [212]  
[4]  मफ़ऊलातु [2221]  +नह्र  = मन्हूर  = फ़े’अ  [2] --ऐन साकिन
[5] मफ़ऊलातु  [2221] + जद’अ+ वक़्फ़ = मज्दू’अ मौक़ूफ़ = फ़ा’अ [ 21] --ऐन मुतहर्रिक
मुस तफ़ इलुन [2212] पर लगने वाले कुछ मुख्य ज़िहाफ़ात---
[1] मुस तफ़ इलुन ]2212] + तय्यी          = मुत्तवी =मुफ़ त इलुन [2112] 
[2] मुस तफ़ इलुन [2212] +क़ता’          = मक़्तूअ = मफ़ ऊ लुन [222]

स्पष्ट है कि --तय्यी---वक़्फ़---नह्र--जद’अ ---कस्फ़-क़त’अ- ये सब ज़िहाफ़ के नाम है जो सालिम अर्कान पर लगते है ।
और ’मुत्तवी--मौक़ूफ़---मुन्ह्र---मज्दू’अ  मक्सूफ़ --मक़्तू’अ ---उन्ही का मुज़ाहिफ़ नाम हैं

 यूँ तो और भी ज़िहाफ़ात है जो  ’मुस तफ़ इलुन [2212] और मफ़ऊलातु [2221] पर लगते हैं और लग सकते हैं ।यहाँ पर सब की चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है सिवा इसके की एक ’कन्फ़्यूजन’ पैदा करे और विषय से भटक जाये } अत: यहाँ बस उन्ही ज़िहाफ़ात का जिक्र किया है जो बह्र के समझने के लिए आवश्यक  है

ध्यान देने की बात है कि आप -1- की अलामत पर न जाये-- यही 1 मुतहर्रिक हर्फ़ के लिए भी लिखा जाता है और यही -1- साकिन हर्फ़ के लिए भी} इसी लिए मै कहता हूँ यह 1 22  112221  --जैसा मापनी निज़ाम रुक्न को सही समझने में सहायक नही होता । अर्कान और औज़ान समझने का सही तरीक़ा तो बस ’अफ़ाइल’ या ’तफ़ाइल’ ही होता है

एक बात और --बस समझने के लिए--मफ़ ऊ लातु में ’लातु’ क्या है ? चलिए मफ़ तो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है । "ऊ’ भी सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है तो ’लातु"??
"लातु’ -वतद [ 3 हर्फ़ी लफ़्ज़ है कोई]
3-हर्फ़ी लफ़्ज़ के भी तीन शकल हो सकते है जिसके हरूफ़ [ हर्फ़ का बहु वचन]
[A]    हरकत + हरकत +साकिन    = वतद-ए-मज़्मुआ कहते है
[B]   हरकत  + साकिन + हरकत  =  वतद-ए मफ़रूक़ कहते है   जैसे -लातु-[ लाम+ अलिफ़+ ते]---  अलिफ़ साकिन होता है
[C]   हरकत  + साकिन_साकिन     = वतद-ए-मौक़ूफ़ कहते है        जैसे -ला  [ लाम + अलिफ़ + नून ] ---नून  साकिन है
यानी ’लातु’ का मौक़ूफ़ ’ लान’ यानी  मफ़ऊलातु [2221]  का मौक़ूफ़ ’मफ़ऊलान [2221]
[हम सीधे ’बह्र-ए-मुन्सरिह’ की प्रचलित बह्रों पर आते है

[क] मुन्सरिह मुसद्दस सालिम
     मुस तफ़ इलुन---मफ़ऊलातु---मुस तफ़ इलुन
      2 2 1 2  --------2 2 2 1 -----2 2  1  2
आलिम जनाब कमाल अहमद सिद्दक़ी साहब का दावा है कि बह्र के इस रूप में पहली बार [शायद] उन्होने एक दो ग़ज़लें कही हैं। कोशिश करें तो शायद आप कारीं [पाठक गण] भी कह सकते हैं

[ख]  मुन्सरिह मुसम्मन मुत्तवी ,मुत्तवी मक्सूफ़
 मुफ़ त इलुन---फ़ाइलुन---मुफ़ त इलुन---फ़ाइलुन
2112--------212--------2112--------212
आप जानते हैं कि .मफ़ऊलातु [2221] का ’मुत्तवी मक्सूफ़’ फ़ाइलुन[212] होता है
जिगए मुरादाबादी का एक शे’र है

कम नहीं ज़ुल्मत भी कुछ अहल-ए-नज़र के लिए
कौन रहे शब नशीं नूर-ए-सहर के लिए

अब तक़्ती’अ कर के देख लेते हैं
 2       1 1 2    / 2  1    2    /     21    1   2    / 2 1 2
कम नहीं ज़ुल / मत भी कुछ / अहल-ए-नज़र / के लि ए
2  1  1  2 / 2 1   2 /  2 1   1 2    /  2 1 2
कौन रहे / शब नशीं /नूर-ए-सहर / के लि ए
अब आप कहेंगे -नहीं- को 11 के वज़न पर क्यों लिया  12 के वज़न पर क्यों नहीं ?
कारण एक -कि बहर की माँग 1 1 की है और -न- [ मुतहर्रिक 1] जो मुफ़ त इलुन में -त-[ मुतहर्रिक ] के मुक़ाबिल में है -हीं-- में -ह- पर ज़ेर की अलामत तो -ह- भी मुतहर्रिक [1] हो गया जो मुफ़ त इलुन में -ऐन- [ मुतहर्रिक के मुक़ाबिल पर है [ नून गुन्ना तक्ती’अ में नहीं लेते]
इसी लिए कहता हूँ कि उर्दू शायरी में किसी लफ़्ज़ का वज़न स्थायी नहीं होता है अपितु बह्र की माँग के मुताबिक बदलता रहता है [मगर क़वायद] के मुताबिक और दायरे में ही]

[ग] मुन्सरिह मुसम्मन मुत्तवी मौक़ूफ़ /मक्सूफ़
मुफ़ त इलुन---फ़ाइलातु---मुफ़ त इलुन---फ़ाइलान / फ़ाइलुन
2112----------2121-----2112---------2121---/ 212
स्पष्ट है--- मुफ़ त इलुन [2112] मुत्तवी है ’मुस तफ़ इलुन ’[2212] का ,यानी ’मुस तफ़ इलुन’ पर ’तय्यी’ का ज़िहाफ़ लगा है
और     ---- फ़ाइलातु [2121]   मुत्तवी है  ’मफ़ऊलातु’ [2221]    का  , यानी ”मफ़ऊलातु’ पर    ’तय्यी’   का ज़िहाफ़ लगा है
और     ------फ़ाइलान [ 2121] मौक़ूफ़ है ’ ’मफ़ऊलातु’ [2221] का , यानी  ’मफ़ऊलातु’ पर  ’वक़्फ़’   का ज़िहाफ़ लगा है
और ------ फ़ाइलुन    [ 212]   ’मुत्तवी मक्सूफ़’  है म’मफ़ऊलातु’ का यानी   ’मफ़ऊलातु’ पर ’तय्यी और कस्फ़ [कश्फ़] ’ का ज़िहाफ़ एक साथ लगा है
चलिए डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से उनका एक ख़ुद साख़्ता  शे’र भी देख लेते है इस बह्र में-उदाहरण के तौर पर

आओ मेरी जान पास  ,जान है लबों पर मेरी
अब न करो इन्तिज़ार ,पास मेरे  आओ  तो

तक़्तीअ भी देख लेते हैं
2   1  1  2  /    2 1 2 1 /  2 1  1  2 /   2  1 2
आओ मिरी/  जान पास / ,जाँ है लबों / पर मिरी    [मौक़ूफ़]
2     1  1  2 / 2   1  2 1  / 2 1  1 2 /    2 1  2
अब न करो/  इन त ज़ार / ,पास मिरे /  आओ  तो

 ध्यान देने के बात है--आओ -में -’ओ’ की वज़न [मुतहर्रिक] पर क्यों लिया
कारण यह कि एक तो बह्र की माँग है और ’हमज़ा’[अलिफ़] पर पेश की हरकत लगा कर अदा हो रही है तो मुतहर्रिक है और यह अज़ रू-ए-बह्र ग़लत भी नहीं है

इसी प्रकार आप चाहें तो खुद भी एक शे’र कह सकते है जिसके अन्त में [अरूज़ और जर्ब के मक़ाम पर] फ़ाइलान [2121] वज़न का लफ़्ज़ आए --जैसे बार बार [2121] बारगाह [2121] कोरचश्म [2121] कोर् निश [2121] हज़ारो शब्द ऐसे मिल जायेंगे
तब बह्र का नाम हो जायेगा ’मुन्सरिह मुसम्मन मुत्तवी मक्सूफ़"
यूं तो अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ’मक़्सूफ़’ और मौक़ूफ़ आपस मे मुत्बादिल है [यानी एक दूसरे की जगह लाए जा सकते है]
मगर--बह्र का नामकरण जर्ब के मुक़ाम पर आने वाले ’रुक्न’ से तय होता है  ्यानी की आप ने मौक़ूफ़ लगाया है या मक्सूफ़ लगाया है

[घ] मुन्सरिह मुसम्मन मुत्तवी मन्हूर/ मज्दू’अ मौक़ूफ़ 
      मुफ़ त इलुन ---फ़ाइलातु ---मुफ़ त इलुन --फ़े/फ़ा’अ
        2 1  1   2   ----2121------2 1 1 2----2   /21
कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से एक शे’र देखते है

हुस्न अगर ख़्वाब है ,यह ख़्वाब की ता’बीर
फ़िक्र-ओ-नज़र का वतन है,ख़ित्त-ए-कश्मीर

अब तक़्ती’अ भी कर के देख लेते हैं
2    1   1   2  / 2  1  2 1   /2 1  1   2    / 21
हुस् न अ गर / ख़ा ब है ,ये /ख़ाब की ता’ /बीर
2        1  1 2  /  2  12 1   /   2     1  1  2    / 2 1
फ़िक् र नज़र/  का वतन है / ,ख़ित् त-ए-कश /मीर

[खित्त:-ए-कश्मीर = कश्मीर का इलाका /क्षेत्र]
ध्यान रहे --यह मज्दू’अ मौक़ूफ़ की मिसाल है जिसके ’अरूज़’ और जर्ब के मुक़ाम पर ’फ़ा’अ [21] आया हुआ है

आप चाहे तो मुन्सरिह मुसम्मन मुत्तवी मन्हूर की मिसाल आप खुद दे सकते एक शे’र कह कर
सैय्यद इन्शा का एक शे’र है

कोई नहीं आस पास ख़ौफ़ नहीं कुछ
होते हो क्यों बेहवास ,खौफ़ नहीं कुछ

इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
2    1  1 2 /  2 1 2 1 / 2 1  1 2 / 2
कोई नहीं/ आस पास /ख़ौफ़ नहीं/ कुछ
2   1  1   2 /  2 1 2 1   / 2 1  1 2 / 2
होते हो क्यों/ बे ह वास /,खौफ़ नहीं /कुछ

अब यहाँ देखिए --नहीं - का वज़न 1 2 लिया है जब कि ऊपर मैने --नहीं --- 1 1 लिया था
कारण कि यहाँ बह्र की माँग ही 1 2 का है जो तलफ़्फ़ुज़ में दुरुस्त भी है और ऐन मुताबिक़ भी है

इसी बह्र में ग़ालिब की ग़ज़ल के 1-2 शे’र देखते हैं

आ,कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़त-ए-बेदाद-ए-इन्तिज़ार नहीं है

तूने क़सम मैकशी की खाई है ’ग़ालिब’
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार  नहीं  है

इसकी तक़्तीअ आप खुद कर सकते हैं और मुतमय्यिन हो सकते हैं

[च] मुन्सरिह मुसद्दस मुत्तवी
मुफ़ त इलुन--- फ़ाइलातु----मुफ़ त इलुन
2112------------2121------2112

डा0 आरिफ़ हसन खान साह्ब के हवाले से ही

दिल में तेरी याद के चिराग़ जले
साथ चिराग़ों के दिल के दाग़ जले

अब तक़्ती’अ कर के भी देख लेते है
2     1   1  2 / 2 1 2  1   / 2112
दिल में तिरी/  याद के चि /राग़ जले
2  1  1   2  / 2   1   2   1 / 2 1 1 2
साथ चिरा / ग़ों के दिल के /दाग़ जले

[छ] मुन्सरिह मुसद्दस मुत्तवी मक़्तू’अ
मुफ़ त इलुन---फ़ाइलातु--मफ़ऊलुन
2112---------2121---222
एक उदाहरण देखते हैं -किसी का शे’र है

आँखों में मय का ख़ुमार अब तक है
सच कहूँ हम को तो आप पर शक है

अब तक़्ती’अ कर के भी देख लेते है
 2   1   1  2   / 2  1  2  1 / 2 2  2
आँखों में मय /का ख़ुमार/ अब तक है
2     1  1  2  / 2   1    2  1 /   2 2 2 
सच कहूँ हम/ को तो आप  / पर शक है

अब आप कहेंगे --आँखों -- को 21 के वज़न पर क्यों लिया  -22 - का वज़न क्यों नहीं?
पहले तो स्पष्ट कर लें---तक़्ती’अ में --चन्द्रबिन्दु--नून गुन्ना--दो चश्मी ’ह’  की गणना नहीं करते
और तब आँखों----हर्फ़ में [अलिफ़-अलिफ़-काफ़ पर पेश यानी "आ  मुफ़ के वज़न पर [ क पर पेश "-मुतहर्रिक  -त- के वज़न पर] आ जायेगा इसी लिए आँखों को 2 1 के वज़न पर लिया गया है
अब कुछ मुरब्ब: के उदाहरण भी देख लेते है

[ज] मुन्सरिह मुरब्ब: सालिम मौक़ूफ़
मुस तफ़ इलुन---मफ़ऊलान
2212----2221
सालिम इस लिए कि मुस तफ़ इलुन [2212] अपनी सालिम शकल में है
मफ़ऊलान [2221] [ नून -साकिन है] -- मफ़ऊलातु [2221] का मौक़ूफ़ है
अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ’मफ़ऊलातु’ [2221] तो ला नही सकते--आप जानते ही है अत: मफ़ऊलान [नून साकिन] या मफ़ऊलात [ 2221--ते- साकिन] ही ला सकते है जो लाए है

हैं साज़ में सुर बेचैन 
आँखें सभी हैं सरशार

तक़्ती’अ कर के देख लेते हैं
2    2  1 2 / 2  2 2 1
हैं साज़ में / सुर बेचैन
2   2   1 2  /  2 2 2 1
आँखें सभी / हैं सर शार

इसकी मुज़ाइफ़ [दो गुनी]  शकल भी हो सकती है

यूँ तो होने के लिए मुन्सरिह बह्र की और भी मुज़ाहिफ़ शकल हो सकती है क्यों कि सालिम रुक ’मुस तफ़ इलुन [2212] और ’मफ़ऊलातु [2221] पर और भी कई ज़िहाफ़ लग सकते है और लगते भी है
मैं यहाँ यह दावा तो नहीं कर सकता कि मैने मुन्सरिह की तमाम बहूर ’कवर’ कर लिया है मगर हाँ कुछ हद तक अवश्य कर लिया है
अस्तु
अब अगले क़िस्त में बह्र-ए-मज़ारि’अ की चर्चा करेंगे
-----------------------
{क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।
-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

ग़ज़ल 104 ; जड़ों तक साज़िशें---

एक ग़ज़ल : जड़ों तक साजिशें गहरी---


जड़ों तक साज़िशें गहरी ,सतह पे हादसे थे
जहाँ बारूद की ढेरी , वहीं  पर  घर  बने थे

हवा में मुठ्ठियाँ ताने  जो सीना  ठोकते थे
ज़रूरत जब पड़ी उनकी ,झुका गरदन गए थे

कि उनकी आदतें थी देखना बस आसमाँ ही
ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली फिर भी खड़े थे

अँधेरा ले कर आए हैं ,बदल कर रोशनी को
वो अपने आप की परछाईयों  से यूँ   डरे थे

बहुत उम्मीद थी जिनसे ,बहुत आवाज़ भी दी
कि जिनको चाहिए था जागना .सोए पड़े थे

हमारी चाह थी ’आनन’ कि दर्शन आप के हों
मगर जब भी मिले हम आप से ,चेहरे चढ़े  थे

-आनन्द.पाठक--

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

एक सूचना---

  एक सूचना----

मित्रो !
---लगभग 6 महीने के ’अमेरिका-प्रवास’ के उपरान्त ,मैं  दिनांक 20-09-2018  को भारत वापस आ गया
 अब  "उर्दू बह्र पर एक बातचीत" का सिलसिला शीघ्र ही पुन: शुरु करूँगा और बाक़ी बचे बह्र पर रोशनी डालने की कोशिश करूँगा
इन्शा अल्लाह
सादर
-आनन्द पाठक-

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल : कौन बेदाग़ है---

एक ग़ज़ल

कौन बेदाग़ है  दाग़-ए- दामन नहीं ?
जिन्दगी में जिसे कोई उलझन नहीं ?

हर जगह पे हूँ मैं उसकी ज़ेर-ए-नज़र
मैं छुपूँ तो कहाँ ? कोई चिलमन नहीं

वो गले क्या मिले लूट कर चल दिए
लोग अपने ही थे कोई दुश्मन नहीं

घर जलाते हो तुम ग़ैर का शौक़ से
क्यों जलाते हो अपना नशेमन नहीं ?

बात आकर रुकी बस इसी बात पर
कौन रहजन है या कौन रहजन नहीं

सारी दुनिया ग़लत आ रही है नज़र
साफ़ तेरा ही मन का है दरपन नहीं

इस चमन को अब ’आनन’ ये क्या हो गया
अब वो ख़ुशबू नहीं ,रंग-ए-गुलशन नहीं

-आनन्द.पाठक--