गुरुवार, 18 जनवरी 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 42 [ कामिल की मुज़ाहिफ़ बह्रें]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 42 [ कामिल की मुज़ाहिफ़ बह्रें]

Disclaimer Clause--वही जो क़िस्त 1 में हैं---

---पिछली क़िस्त में बह्र-ए-कामिल की सालिम बहर और इसकी मुरब्ब: मुसद्दस और मुसम्मन शकल की चर्चा कर चुका हूँ

अब हम कामिल की मुज़ाहिफ़ बह्रों पर चर्चा करेंगे

शुरु शुरु में जब ज़िहाफ़ात की चर्चा कर रहे थे तो कहा था उर्दू शायरी में लगभग 48 के आस पास ज़िहाफ़ात प्रयोग में लाये जाते हैं [ तस्कीन और तक्ख़्नीक के अमल से बरामद होने वाले अतिरिक्त वज़न को छोड़ कर] ।इन 48 ज़िहाफ़ात में  से 11 ज़िहाफ़ तो  ऐसे है जो सिर्फ़ ’कामिल’ और वाफ़िर ’ पर ही लगते हैं। कामिल के मुसम्मन सालिम का आहंग ही खुद में इतना दिलकश है कि शायरों ने मुज़ाहिफ़ बहर की तरफ़ ख़ास रुख ही नहीं किया । 11 ज़िहाफ़ लगाने की तो बात ही बहुत दूर की है-2-4 जिहाफ़ प्रयोग कर लिया काफी है ।
इसी लिए ,ख़ास ख़ास ज़िहाफ़ का ज़िक्र करना ही मुनासिब होगा
आप तो यह जानते ही है कि बह्र-ए-कामिल की बुनियादी रुक्न ’मु त फ़ाइलुन्’ [1 1 2 1 2]  है और् इस् पर् लगने वाले ख़ास ख़ास मुफ़र्द ज़िहाफ़ निम्न [दर्ज-ए-ज़ैल]हैं

मु त फ़ाइलुन्’ [1 1 2 1 2]  + इज़्मार्   =मुज़्मर = मुस् तफ़् इलुन् = 2212
मु त फ़ाइलुन्’ [1 1 2 1 2]  + वकस् =मौक़ूस् = मफ़ाइलुन्    = 1212   
 मु त फ़ाइलुन्’ [1 1 2 1 2]  +क़तअ’                 =मक़्तूअ’ = फ़इलातुन् = 1122 [ यहाँ  फ़े--ऐन्--लाम्  तीन् मुतहर्रिक् एक् साथ् आ गये है तो तस्कीन् का अमल हो सकता है।
मु त फ़ाइलुन्’ [1 1 2 1 2]  +इज़ाला = मज़ाल् = मु त् फ़ा इला तुन्      = 1 1 2 121 = इस् की चर्चा पिछले क़िस्त् में कर् चुके हैं । यह् अरूज़् और् ज़र्ब के लिए ख़ास है
मु त फ़ाइलुन्’ [1 1 2 1 2]  +तरफ़ील् =मुरफ़्फ़ल= मु त् फ़ा इला तुन् = 1 1 2 1 2 2
मु त फ़ाइलुन्’ [1 1 2 1 2]  +हज़ज़ =महज़ूज़्   = फ़ इ लुन्   = 1 1 2  [ यहाँ फ़े--ऐन्--लाम् तीन् मुतहर्रिक् एक साथ आ गये है तो ’तस्कीन्’ का अमल हो सकता है 

इसकए अतिरिक्त कुछ मुरक़्कब ज़िहाफ़ भी है जो बहर-ए-कामिल पर लगते है
जैसे
इज़्मार+ इज़ाला
इज़्मार+ तर्फ़ील
वकस + इज़ाला
वकस+तरफ़ील
क़तअ’+ तस्कीन  वग़ैरह वग़ैरह
इज़्मार्+ तय्यी

आप जानते है कि हर फ़र्द ज़िहाफ़ का अपना एक तरीक़ा-ए-अमल होता है जो सालिम रुक्न के ख़ास टुकड़े [ सबब-ए-सक़ील पर, सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर या वतद-ए-मज़्मुआ पर] अमल करता है और मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ के दोनो या तीनो ज़िहाफ़  सालिम रुक्न [ मु त फ़ा इलुन =1 1 2 1  2] पर  एक साथ अमल करते है तो मुज़ाहिफ़ वज़न बरामद होती है जैसा कि ऊपर लिख दिया है। तवालत से बचने के लिए हर ज़िहाफ़ का तरीक़ा-ए-अमल यहाँ चर्चा नहीं कर रहा हूँ  ,सीधे बरामद होने वाले मुज़ाहिफ़ शकल ही लिख दिया है।

अब हम उन ख़ास ख़ास मुज़ाहिफ़ बह्रों की मात्र चर्चा करेंगे जो उर्दू शायरी में आसान है या राइज़ हैं  , उदाहरण आप पेश करें [इन मुज़ाहिफ़ बह्रों के वज़न के आधार पर] तो अच्छा रहेगा
मुरब्ब: बह्रें:-
[1] कामिल मुरब्ब: मुज़्मर सालिम ------ आसान है ।पहला रुक्न मुज़्मर [ मुस् तफ़् इलुन् 2212]     रखना है और दूसरा रुक्न सालिम [मु त फ़ाइलुन् 1 1 212] रखना है
मुस् तफ़् इलुन्----मु त फ़ा इलुन्
2    2    1   2 -----1  1 2 1 2
चूँकि आखिरी रुक्न् [अरूज़् और्  ज़र्ब के मुक़ाम पर ]सालिम्  रुक्न है अत:  यहाँ मज़ाल  [मु त् फ़ा इलान्      = 1 1 2 121]  भी लाया जा सकता है और एक नई बहर बन सकती है।} और नाम होगा ---बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: मुज़्मर सालिम मज़ाल
जैसे
[1-क] बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: मुज़्मर सालिम मज़ाल
मुस् तफ़् इलुन्----मु त फ़ा इलान्
2    2    1   2 -----1  1 2 1 21

मिसाल् आप सोचें
[2] कामिल् मुरब्ब्: सालिम् मुज़्मर्------आसान् है}पहला रुक्न् सालिम् [ मु त फ़ाइलुन् 1 1 2 12] रखना है और् दूसरा रुक्न् मुस् तफ़् इलुन् [ 2 2 1 2 ] रखना है
मु त फ़ा इलुन्------मुस् तफ़् इलुन्
1 1   2 1    2--------2 2 1 2 
चूंकि आखिरी रुक्न मुस तफ़ इलुन [2 2 12 है जो बहर-ए-रजज़ की बुनियादी रुक्न हो गई । बहर-ए-रजज़ की जब चर्चा कर रहे थे तो इस पर भी इज़ाला ज़िहाफ़ का प्रयोग किया था जिसका मज़ाल मुस् तफ़् इलान् [ 22121] था जो अरूज़् और् ज़र्ब् के लिए ख़ास् है अत: इस केस मैं भी अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर मुस् तफ़् इलान् [ 22121]  लाया जा सकता है और एक नई बहर बन सकती है और नाम होगा -बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम मुज़्मर मज़ाल
[2-क] बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम मुज़्मर मज़ाल
जैसे -    मु त फ़ा इलुन्------मुस् तफ़् इलान्
1 1   2 1    2--------2 2 1 2 1
मिसाल् आप् सोचें

मुसद्दस बह्रें:-
[3] बह्र्-ए-कामिल मुसद्दस सालिम मुज़्मर सालिम ---आसान है पहला और  तीसरा रुक्न सालिम रखिए और दूसर [हस्व] रुक्न को मुज़मर -देखिए क्या बनता है

मु त फ़ाइलुन्-----मुस् तफ़् इलुन्------मु त फ़ाइलुन्
11212------------2 2 12  -----        1  1 2 1 2

वही बात , अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर ’मु त फ़ा इलुन’ का मज़ाल -’मु त् फ़ाइलान् ’ [ 112121] लाया जा सकता है और् बह्र् का नाम् होगा--बह्र्-ए-कामिल मुसद्दस् सालिम् मुज़्मर् सालिम् मज़ाल्
[3-क] बह्र्-ए-कामिल मुसद्दस् सालिम् मुज़्मर् सालिम् मज़ाल् ---
मु त फ़ाइलुन्-----मुस् तफ़् इलुन्------मु त फ़ाइलान्
11212------------2 2 12  -----        1  1 2 1 2 1

[4]  बह्र्-ए-कामिल् मुसद्दस् मुज़्मर् सालिम् मुज़्मर् --कुछ नहीं , बस सदर/इब्तिदा पे मुज़्मर और हस्व पे सालिम रख दीजिये

मुस् तफ़् इलुन्-----मु त फ़ाइलुन्-----मुस् तफ़् इलुन्
2  2  1  2---------1 1  2 1  2-------2    2    1  2

वही बात् --अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर मुस् तफ़् इलुन् [2212] का मज़ाल् -मुस् तफ़् इलान् [ 2 2 1 2 1] लाया जा सकता और् बह्र् का नाम् होगा--बह्र्-ए-कामिल् मुसद्दस् मुज़्मर्  सालिम् मुज़्मर् मज़ाल्
[4-क्] बह्र्-ए-कामिल् मुसद्दस् मुज़्मर्  सालिम् मुज़्मर् मज़ाल्

मुस् तफ़् इलुन्-----मु त फ़ाइलुन्-----मुस् तफ़् इलान्
2  2  1  2---------1 1  2 1  2-------2    2    1  2 1
यह तो रही ’ इज़्मार’ ज़िहाफ़ की बात
अब ज़रा ’तरफ़ील’ ज़िहाफ़ की बात कर लेते हैं
आप जानते ही हैं कि ’मु त फ़ा इलुन् ’ [1 1 2 1 2] पर ’तरफ़ील’ के अमल से ’मु त फ़ा इला तुन ’ [ 1 1 2 12 2 ] बरामद होता है जिसे ’मुरफ़्फ़ल’ कहते है
[5] बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: मुरफ़्फ़ल
मु त फ़ा इलुन्-----मु त फ़ा इला तुन्
1  1  2  1  2-------1 1 2 1 2   2
एक् और ज़िहाफ़ की चर्चा कर लेते हैं -वो ज़िहाफ़ है ’ वक़स्’ जिसके मुज़ाहिफ़ को ’मौक़ूस’ कहते हैं
मु त फ़ाइलुन [11212] का मौक़ूस है -मफ़ा इलुन [1212] --ऊपर दिखाया जा चुका है
[6] बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: मौक़ूस सालिम
      मफ़ाइलुन----मु त फ़ाइलुन
       1 2 1 2 -------1 1 2 1 2
 कामिल की मुज़ाहिफ़ बहर और भी है और बन सकती हैं अगर आप ---ख़ज़ल ---   क़तअ’.... हज़ज़--का ज़िहाफ़ लगायें या दो दो ज़िहाफ़ एक साथ लगायें --मुमकिन है
फिर बहुत सी मुज़ाहिफ़ रुक्न भी बरामद हुई है जिस में " तीन मुतहर्रिक"-एक साथ आ गये हैं तो तस्कीन का अमल भी हो सकता है
और शे’र की मुरब्ब:---मुसद्दस--मुसम्मन--शकल भी मुमकिन है
कहने का मतलब यह कि कामिल में बहर की संभावनाये तो बहुत है --यूँ मनाही तो नही है ,मगर कोई शायर इन तमाम मुम्किनात बहर में शायरी नहीं करता । हमने तो बस बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम में या 1-2 मुज़ाहिफ़ में ही अश’आर देखें हैं।
आप चाहें तो इन तमाम छोटी छोटी मुज़ाहिफ़ बहर [मुरब्ब: वाली] में प्रयास कर सकते है---
वैसे समझाने के लिए तो ख़ुदसाख्ता अश’आर तो कहे और बनाये जा सकते है मगर मज़ा तो तब है जब आप खुद कहें ।खैर
एक और दिलकश  कामिल की मुज़ाहिफ़ बहर की चर्चा कर इस आलेख को समाप्त करता हूँ। और वो बह्र है---बह्र-ए-कामिल मुसम्मन मुज़्मर]--बह्र आसान है
[7] बह्र-ए-कामिल मुसम्मन मुज़्मर
मु त फ़ाइलुन----मुस् तफ़् इलुन् // मु त् फ़ाइलुन् ---मुस् तफ़् इलुन्
1 1 2 1 2 -------- 2 2  1  2   //  1 1   2 1 2 ------2  2   1  2
 डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से एक उदाहरण भी देख लेते है } आप भी चाहें तो ऐसी मिसाल पेश कर सकते हैं

कभी चाँदनी मै सैर को ,किसी गुलिस्ताँ की जाओ गर
कोई ख़ार दामन थाम ले , मुझे याद करना उस घड़ी

अब तक़्तीअ कर के देख लेते है
1 1     2  1 2  / 2 2 1  2  //  1  1   2 1  2 /  2 2  1 2
कभी चाँदनी /  मै सै र को //,किसी गुलस्ताँ / की जा उ गर   
 1  1   2  1 2  / 2  2 1  2  //    1 1  2 1 2  / 2   2  1  2
कोई ख़ार दा/  मन थाम ले // , मुझे याद कर / ना उस घड़ी

अच्छा ,इस तक़्तीअ’ में आप को एक उलझन ज़रूर पैदा हो रही होगी-
-कि मैने ’कभी’ का --भी
किसी का --सी
कोई का  --’को’  और ’ई’
मुझे    का --झे’   ------
अगरचे देखने में तो 2-सबब-ए-ख़फ़ीफ़ लगते है मगर हम ने यहाँ सबब-ए-सक़ील [2=हरकत+हरकत] के वज़न पर क्यों लिया ?
Simple---बह्र की माँग है
मगर--- अगर ्लफ़्ज़ -’कभी’- को रस्म अल ख़त उर्दू में लिखा जाय [ जो यहाँ लिखना मुमकिन नहीं हो पा रहा है ]  इसे तक़्तीअ में -क-[काफ़]  तो यूँ ही मुतहर्रिक है कारण की लफ़्ज़ का पहला हर्फ़ है जो लाज़िमन मुतहर्रिक ही होगा
"भ [ बे+ दो चश्मी ह] तक़्तीअ में दो चश्मी -ह- को शुमार नही करते कारण कि यह कोई वज़न तो दे नहीं रहा है बस हवा छोड़ रहा है तो वज़न क्या? फिर -’ ई’  के लिए  ’ज़ेर’ [ जो एक हरकत ही है ] लगा दे तो -भी- मुतहर्रिक का वज़न देने लग जायेगा --यानी क बि ---क बि -- हरकत+हरकत =सबब-ए-सक़ील=1 1
और जब शे’र की अदायगी करेंगे तो इस बात का ख़याल रखेंगे---यह नहीं कि --कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है कि तर्ज पर -- भी-- को खींच कर शे’र पढ़ना शुरु कर दें
यही बात और ऊपर्युक्त [ दर्ज-ए-बाला] अल्फ़ाज़ की भी है ।

एक बात और-- इस मज़्मून [आलेख] में मैने जान बूझ कर बहुत से उदाहरण नहीं दिए और न तक़्तीअ किया। कारण कि ज़्यादातर शायरों ने अपनी शायरी में  ’कामिल मुसम्मन’ या  ’कामिल मुसम्मन मुज़मर’ का ही प्रयोग किया है बाक़ी मुज़ाहिफ़ बह्र में बहुत ही कम शायरी की है। इन बाक़ी मुज़ाहिफ़ बह्र को समझाने के लिए हमारे अरूज़ियों ने अरूज़ की किताबों में  कुछ शे’र ज़रूर गढ़े -उन्हीं को बार बार दुहराने क कोई मतलब नहीं है -वो तो आप भी गढ़ सकते है।मुरब्ब: में गढ़ सकते है ,मुसद्दस में गढ़ सकते है< मुझे यक़ीन है कि इस मुक़ाम तक आते आते आप ने इतनी हुनर तो पैदा हो ही गई होगी कि बाह्र और वज़न का पास [ख़याल] रखते हुए कोई शे’र कैसे "गढ़ा’ जा सकता है।

अब अगले क़िस्त में ’बह्र-ए-वाफ़िर’ पर चर्चा करेंगे।

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर में इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 13 जनवरी 2018

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 41 [कामिल की सालिम बहर ]

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 41 [कामिल की सालिम बहर ]

Disclaimer Clause--वही जो क़िस्त 1 में हैं---

---बहर-ए-कामिल कि बुनियादी रुक्न है  " मुतफ़ाइलुन्" [11212] --यह भी एक 7-हर्फ़ी रुक्न है
ध्यान रहे यहाँ मु[मीम] और त[ते] मुतहर्रिक है  --फ़े तो ख़ैर है ही।

यह वज़न  भी दो- सबब और एक- वतद को  मिला कर बनता है जैसे बहर-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न ’मुस तफ़ इलुन [2212]
रजज़ --- मुस तफ़ इलुन्  =2 2 1 2= सबब+सबब+वतद
कामिल---मु त फ़ा इ्लुन् = 1 1 2 1 2= सबब+ सबब+ वतद

बस फ़र्क ये है कि ’रजज़ में दोनो  ’सबब’- सबब-ए-खफ़ीफ़ है जब कि कामिल में पहला सबब --सबब-ए-सक़ील है और दूसरा सबब--सबब-ए-खफ़ीफ़ है
यूँ तो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ और सबब-ए-सक़ील के बारे में पहले भी चर्चा कर चुका हूं ,कुछ मित्रों के आग्रह पर संक्षेप में एक बार फिर दुहरा देता हूँ

सबब-ए-ख़फ़ीफ़ = वो दो हर्फ़ी कलमा जिस में पहला हर्फ़ ’मुतहर्रिक’ हो और दूसरा हर्फ़ साकिन हो [यानी  हरकत+साकिन] जैसे  आ--जा--अब --तब--्जब --दिल  हो -गा---मुतहर्रिक का मतलब है कि उस हर्फ़ पर ’ कोई ’हरकत ’ लगी हो [याने ज़ेर -जबर--पेश] लगा हो
    उर्दू का हर लफ़्ज़ ’मुतहर्रिक’ से प्रारम्भ होता है [हिन्दी में भी होता है ] और ’साकिन’ पर गिरता है यानी उर्दू का कोई जुमला या लफ़्ज़ ’साकिन’ से नहीं शुरु होता । हिन्दी में भी कोई शब्द ’तत्सम’ से प्रारम्भ नहीं होता। अगर कुछ नही होगा   तो पहले हर्फ़ पर ’ छोटा अलिफ़’ की हरकत तो होगी ही होगी । और शायरी में हम इसे [2] की वज़न पर लेते है
सबब-ए-सक़ील  = वो दो हर्फ़ी कलमा जिसमें दोनो हर्फ़ ’मुतहर्रिक’ हो यानी [हरकत+हरकत] । ऊपर कहे के हिसाब से उर्दू में ऐसा कोई कलमा होगा ही  नहीं जिसमें दोनो हर्फ़ पर ’हरकत’ हो । जी बिलकुल सही। लेकिन उर्दू में कुछ तरतीबे हैं[ जो फ़ारसी से आई हैं] जैसे इज़ाफ़त की और ’अत्फ़’ की । जैसे दर्द-ओ-ग़म , ग़म-ए-दौरां ,दिल-ए-नादाँ--शान-ओ-शौकत---------तमाम ऐसे जुमले हैं जो इस तरक़ीब से बन सकते है
अगर मात्र हम  दर्द----ग़म्---दौरान्---दिल्--शान्  कहें तो यक़ीनन आखिरे हर्फ़ -द्---म्---न्--ल्-- साकिन हैं
मगर इज़ाफ़त् या अत्फ़् की तर्क़ीब से पढ़ेंगे तो इन्ही  ----म----न---ल--- के आवाज़ सुनने पर एक ’भारीपन’ महसूस होता ’सक़ील’ महसूस होता है अत: ऐसे केस में --ग़म- या -दिल [1  1 ] का वज़न देगा  जो सबब्-ए-सक़ील् होगा
मु त [हरकत +हरकत ] [1+1] का वज़न देगा । हिन्दी में कभी कभी हम कह देते है --" दो लघु को एक गुरु हो जाता है" लेकिन उर्दू शायरी में ऐसा नहीं है। उर्दू में इन दोनो का treatment  अलग -अलग होता है
’फ़ा [ फ़े पर हरकत + अलिफ़ साकिन] [2] माना जायेगा  सबब-ए-ख़फ़ीफ़
’इलुन’ तो ख़ैर इलुन है -वतद -ए-मज्मुआ है [ ऐन पे हरकत+ (लाम पे हरकत +नून साकिन) ] =हरकत+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ (लुन]=1 2 वज़न माना जायेगा

अब मुत फ़ाइलुन [1 1 2 1 2 ] की चर्चा कर लेते है
मुतफ़ाइलुन [ 1 1 2 1 2 ]  = सबब-ए-सक़ील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़+ वतद-ए-मज्मुआ
    =  मु त [ 1 1 ]     +   फ़ा  [ 2 ]          + इलुन [ 12 ]
     =  1  1   2  1 2 
[नोट : ध्यान रखियेगा जो भी ज़िहाफ़/ज़िहाफ़ात लेगेंगे वो इन्हीं टुकड़ों पर लगेंगे यानी ’ सक़ील’--ख़फ़ीफ़--वतद पर लगेंगे  यानी --’मु त’ ---फ़ा----इलुन-- पर लगेंगे
 उर्दू की दो बह्रें ऐसी हैं जो अरबी छन्द-शास्त्र [अरूज़] से लाई गईं है जो आज भी मुस्तमिल और राइज़ हैं --वो हैं  बह्र-ए-वाफ़िर  और बह्र-ए-कामिल
बह्र-ए-कामिल का मुसम्मन सालिम आहंग इतना मधुर हैं कर्ण-प्रिय है कि उर्दू के ज़्यादातर शायरों ने इसमे अपनी तबअ’ आज़माई की है और आज भी कर रहे है

्कामिल पर लगने वाले एक ज़िहाफ़ की चर्चा अभी कर लेते है , बाक़ी ज़िहाफ़ात की चर्चा आगे करेंगे। वह  ज़िहाफ़ है ’इज़ाला’- अगर किसी रुक्न के अन्त में ’वतद-ए-मज्मुआ’ हो [ जैसे मुसतफ़ इलुन 2212-में -] तो आखिरी साकिन [नून] के पहले एक और साकिन रख देते है -तो ’मुस तफ़ इ ला न’ [2 2 1 2 1] हासिल होता है।इस अमल को   ’इज़ाला’ कहते है और बरामद मुज़ाहिफ़ को ’मज़ाल ’कहते है
उसी प्रकार जब मु त फ़ा इ लुन [ 1 1 2 1 2]  पर यही अमल करेंगे तो ’मु त फ़ा इ ला न [1 1 2 1 2 1] हासिल होगा जिसे ’मज़ाल ’ कहते हैं ।
तो बहर-ए-मुतदारिक [ फ़ा इलुन [2 1 2 ]  में? जी हाँ ,इस में भी लगेगा । जब इस पर ’इज़ाला’ का अमल होगा तो ’फ़ाइलान’ [2121] बरामद होगा जिसे ’मज़ाल’ कहते है
तो  बहर-ए-मुतक़ारिब [ फ़ ऊ लुन 122 ] में ?? जी नहीं ,इस पर नहीं लगेगा । क्यों? क्यों कि इसमें वतद --शुरु में है ,अन्त में नहीं ।
यह अरूज़ और ज़र्ब के लिए मख़्सूस [ख़ास] है और इसे सालिम रुक  [ मुत फ़ाइलुन]  11212 की जगह पर लाया जा सकता है -इजाज़त है।
एक बात औत --’मु त फ़ा इलुन ’[11212] मे 3-मुतहर्रिक [ मीम.ते.फ़े] एक साथ आ गया -तो क्या ’तस्कीन-ए-औसत ’ का अमल लग सकता है ?? नहीं? कदापि नहीं
तस्कीन -ए-औसत का अमल  हमेशा ’मुज़ाहिफ़’ रुक्न पर ही लगता है---सालिम रुक्न पर कभी नहीं लगता। ध्यान रहे।
पर हाँ --मु त फ़ा इ ला न [112121] पर लग सकता है क्योंकि यह मुज़ाहिफ़ है --इस पर लग सकता है  और 2 2 1 21 बरामद हो सकता है

कामिल की सालिम बहरें
[1] बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम
मु त फ़ा इलुन----मु त फ़ा इलुन      [मिसरा में 2-बार ,शे;र में 4-बार]
1  1   2  2  2-----1  1  2 1 2
उदाहरण  : एक खुदसाख़्ता शे’र सुन लें

तू सवाल है कि जवाब है
मेरी ज़िन्दगी मुझे ये बता

अब तक़्तीअ भी देख लेते हैं
1  1  2 1 2    / 1  1 2 1 2
तू सवाल है   / कि जवाब है
1  1   2 1 2 /     1 1 21 2
मिरी ज़िन्दगी  / मुझे ये बता

[नोट ; आप को लगता है कि -तू- को यहाँ 2 की वज़न के बजाय 1 के वज़न पर क्यों लिया।
एक तो यहां बह्र की माँग है और दूसरे ’ते’ पर ’पेश की हरकत डाल दे तो -तू- मुतहर्रिक हो जायेगा 1 के वज़न पर। यही बात मेरी में है । -मीम और रे पर ज़ेर की हरकत है जिससे -’मिरि [हरकत ,हरकत {1,1] पर लिया जायेगा
एक बात और अरूज़ या ज़र्ब के मुक़ाम पर "मज़ाल ’ यानी मु त फ़ा इ लान [ 1 1 2 121] भी लाया जा सकता है। इजाज़त है}

[2] बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम मज़ाल
मु त फ़ा इलुन----मु त फ़ा इलान      [मिसरा में 2-बार ,शे;र में 4-बार]
1  1   2  1  2-----1  1  2 1 2 1
उदाहरण : कमाल साहेब के हवाले से

ग़म-ए-रोज़गार का क्या इलाज
बजुज़ इसके ज़ुल्म पे अह्तजाज़

तक़्तीअ’ कर के देख लेते है
1  1     2 1 2  / 1  1   2   1 2 1
ग़म-ए-रोज़गा / र का क्या इलाज
1   1  2    1    2    / 1  1 2 1  2 1
ब जु जिस के ज़ुल् / म पे अह्तजाज़

[3]  बह्र-ए-कामिल मुसद्दस सालिम
मुतफ़ाइलुन---मुतफ़ाइलुन-----मुतफ़ाइलुन
11212-------11212---------11212      [ मिसर में 3-बार शे’र मैं 6 बार]
उदाहरण डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

ये रह-ए-हयात के फ़ासिले न कटेंगे यूं
मेरे साथ चल मेरे हमनशीं मेरे साथ चल

तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1 1  2 1  2  / 1  1   2 1 2/ 1 1 2 1  2
ये र हे ह या / त के फ़ासिले / न कटेंगे यूं
1  1  2 1  2 /   1  1  2  1 2 / 1 1 2 1 2
मेरे साथ चल / मेरे हमनशीं / मेरे साथ चल

[4]     बहर-ए-मुसद्दस सालिम मज़ाल - यानी अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर सालिम की जगह मज़ाल [112121] लाया जा सकता है जैसा कि मुरब्ब: के केस में लिखा है
मुतफ़ाइलुन---मुतफ़ाइलुन-----मुतफ़ाइलान
11212-------11212---------112121      [ मिसर में 3-बार शे’र मैं 6 बार]

उदाहरण

मेरी ख्वाहिशों ,मेरी आरज़ूओं का है तिलिस्म
मैं जो देखता हूँ वो ख़्वाब है न है  वो शराब

तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
  1  1     2  1 2   / 1 1   2 1 2 / 1  1   2  1  2     1
मेरी ख्वाहिशों ,/मेरी आरज़ू    / ओं का है त लिस म
             1   1  2 1 2    /   1  1  2 1 2 /   1 1 2 1 2 1
मैं जो देखता /  हूँ वो ख़्वाब है /  न है  वो शराब

[5]     बहर-ए-मुसम्मन सालिम : यह बहुत ही मक़्बूल[लोकप्रिय ] बहर है } कि किसी मुज़ाहिफ़ बहर की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।  तमाम शायरों ने अपनी शायरी इस सालिम बहर में की है और बड़े तरन्नुम में सुनाते भी है । बशीर बद्र साहब का वो ग़ज़ल तो आप ने सुनी होगी-----"यूं ही बेसबब न फिरा करो----"
इस बहर के अर्कान हैं
   मुतफ़ाइलुन---मुतफ़ाइलुन-----मुतफ़ाइलुन----मुतफ़ाइलुन 
  11212-------11212---------11212      [ मिसर में 4-बार शे’र मैं 8 बार]
इस बहर में कई मक़्बूल ग़ज़लें है । कुछ की चर्चा कर देता हूँ । तक़्तीअ’ किसी एक का कर के दिखा दूंगा

[क] वो जो हम में तुम में क़रार था ,तुझे याद हो कि न याद हो
    मुझे याद है सब ज़रा ज़रा ,  तुझे   याद  हो  कि न याद  हो
-मोमिन-

[ख] कभी ऎ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़िर ,नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं , मेरी इक जबीन-ए-नियाज़  में

तू बचा बचा के न रख इसे ,तेरा आईना  है  वो आईना
कि शिकस्ता हो तो अज़ीजतर ,है निगाह-ए-आईनासाज़ मैं
-इक़बाल-

[ग[ शब-ए-वस्ल देखी जो ख़्वाब में ,तो सहर का सीना फ़िगार था
यही बस ख़याल था दम-ब-दम कि अभी तो पास वो  यार  था
ज़ुरअत
[घ] यूँ बेसबब न फिरा करो .कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है ,उसे चुपके चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ,ज़रा फ़ासले से मिला करो
- बशीर बद्र
चलते चलते इस हक़ीर के भी दो मिसरे बर्दाश्त कर लें

[च] वो जो चढ़ रहा था सुरूर था ,जो उतर रहा है  खुमार है
वो नवीद थी तेरे आने की,  तेरे   जाने की  ये पुकार   है 
-आनन-
और भी बहुत सी ग़ज़लें है इस बहर में
चलिए [मोमिन] के एक  शे’र की तक़्तीअ कर के देख लेते है
1   1    2    1  2  / 1  1  2 1 2 /  1 2 2 1 2 / 1  1  2  1 2 =11212--11212--11212---11212
वो जो हम में तुम /में क़ रार था ,/तुझे याद हो / कि न या द हो
1  1  2  1  2  / 1  1 2  1  2   /   1  1  2  1 2    / 1 1  2  1 2 =11212---11212---11212--11212
    मुझे याद सब /   है  ज़रा ज़रा , /  तुझे   याद  हो  /कि न याद  हो

अच्छा एक काम करते है---मिसरा सानी को यूँ कहे तो क्या होगा?

" मुझे याद है सब ज़रा ज़रा--तुम्हे याद हो कि न याद हो" 

भाव और अर्थ में तो कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा --मगर मिसरा वज़न से ख़ारिज़ हो जायेगा । कैसे?
    1  1  2 1 2/ 2  1 2 1 2  / -----     /----
" मुझे याद है /सब ज़रा ज़रा/--तुम्हे याद हो /कि न याद हो"  --पहले हस्व में जहाँ ’मुतहर्रिक’ आना था वहाँ ’सब’ [ 2 सबब-ए-ख़फ़ीफ़] आ गया । ये होती है शे’र की बारिकियाँ

[6] बहर-ए-मुसम्मन सालिम मज़ाल
मुतफ़ाइलुन---मुतफ़ाइलुन-----मुतफ़ाइलुन----मुतफ़ाइलान 
  11212-------11212---------11212 -------11 2121
उदाहरण कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से

जो उजाल देगा हयात को ,है उस आफ़ताब का इन्तज़ार
जो करेगा ज़ुल्म का खात्मा ,है उस इन्क़लाब का इन्तज़ार

तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1   1   2 1 2  / 1 1 2 1 2  /  1 1  2  1 2   / 1 1  2   1 2  1
जो उजाल दे /गा हयात को / ,है उ सा फ़ता/ ब का इन् त ज़ार          [यहाँ उस+आफ़ताब = उ साफ़ताब =अलिफ़ का वस्ल हो गया है]
1    1  2 1   2    / 1  1    2 1 2  /    1 1  2  1    2   / 1  1  2  1  2 1
जो क रे गा ज़ुल् /म  का खा त् मा/  ,है उ सिन क ला/ ब का इन् त ज़ा र    [यहाँ   उस+इन        = उ सिन         = ज़ेर का वस्ल हो गया है ]

बहर-ए-कामिल के सालिम बह्र का बयान खतम हुआ
अब अगली क़िस्त में अब कामिल की मुज़ाहिफ़ बहूर की चर्चा करेंगे।

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर में इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-







रविवार, 7 जनवरी 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 40 [ बहर-ए-रजज़ की मुज़ाहिफ़ बहरें]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 40 [ बहर-ए-रजज़ की मुज़ाहिफ़ बहरें]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है

--रजज़ का बुनियादी रुक्न है --’मुस् तफ़् इलुन्’ [2212]--[यानी सबब + सबब+वतद]
सबब से मेरी मुराद ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ से है और वतद से मेरी मुराद ’ वतद-ए-मज्मुआ’ से है

और् जो भी ज़िहाफ़ लगेगा ,वो इसी सालिम रुक्न पर लगेगा [ यानी इसके ’सबब’ और’वतद’ वाले टुकड़े पर लगेगा]
वैसे तो एकल ज़िहाफ़ [फ़र्द] ,मिश्रित ज़िहाफ़ [ मुरक़्कब] या फिर साकिन के अमल से बनने वाले मुज़ाहिफ़ ,कुल मिलाकर इसके ज़िहाफ़ात लगभग 25-30 के आस-पास बैठता है ।
कुछ फ़र्द ज़िहाफ़ जो ’मुस तफ़ इलुन’[2212] पर लगेंगे वो हैं-----
[1] ख़ब्न ---तय्यी---क़तअ--रफ़अ---जदअ--हज़ज़----इज़ाला ---वग़ैरह वग़ैरह

कुछ मुरक़्क़ब  ज़िहाफ़ जो ’मुस तफ़ इलुन’ [2212] पर लगेंगे वो निम्न है} [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ वो ज़िहाफ़ होते है जो दो या दो से अधिक फ़र्द ज़िहाफ़ से मिल कर बनते है और ’मुस तफ़ इलुन" के अवयव [टुकड़े सबब या वतद पर] एक साथ अमल करते है
[2] ख़ब्ल [=ख़ब्न +तय्यी]
तय्यी+क़तअ
ख़लअ [=ख़ब्न+क़तअ]
जदअ+क़तअ
ख़ब्न+इज़ाला
्वग़ैरह---वग़ैरह--
[3] मुज़ाहिफ़ रुक्न पर तस्कीन का अमल होगा जहाँ किसी मुज़ाहिफ़ रुक्न में " तीन साकिन’ एक साथ जमा हो जायें जैसे--मुफ़तइलुन[2112]

वैसे भी कोई शायर इन तमाम मुज़ाहिफ़ बहूर में एक साथ शायरी तो नही करता।उन तमाम ज़िहाफ़ की चर्चा करना Academic discussion  लिहाज़ से तो ठीक है ,मगर जो  ख़ास ख़ास और मक़्बूल ज़िहाफ़ हैं उन्हीं पर यहाँ चर्चा करना मुनासिब होगा ।

मुस् तफ़् इलुन् [2212] पर् लगने वाले ख़ास ख़ास ज़िहाफ़ --
मुस् तफ़् इलुन् [2212] +ख़ब्न =मख़्बून =मफ़ाइलुन    [ 1212]
मुस् तफ़् इलुन् [2212] +तय्यी =मुतव्वी  = मुफ़तइलुन [ 2112]
मुस् तफ़् इलुन् [2212] +तय्यी+तस्कीन  =मुतव्वी मुसक्किन= मफ़ऊलुन [222]   = यह आम ज़िहाफ़ है
मुस् तफ़् इलुन् [2212] +क़तअ = मक़्तूअ =मफ़ऊलुन [222] = यह ज़िहाफ़ अरूज़ और ज़र्ब के लिए ख़ास है
मुस् तफ़् इलुन् [2212] +ख़लअ =मख़्लूअ = फ़ऊलुन [122]
मुस् तफ़् इलुन् [2212] +रफ़अ = मरफ़ूअ=फ़ाइलुन [ 212] = यह सदर और इब्तिदा के लिए मख़्सूस है
मुस् तफ़् इलुन् [2212] +इज़ाला =मज़ाल   = मुफ़ त इलान [ 21121] = यह अरूज़ और ज़र्ब  के लिए मख़्सूस है
मुस् तफ़् इलुन् [2212] +  तरफ़ील =मुरफ़्फ़ल=मुस् तफ़्इलातुन् [ 22122]
मुस् तफ़् इलुन् [2212]+ तय्यी+तरफ़ील = मुतव्वी मुरफ़्फ़ल= मुफ़ त इलातुन  = 21122
मुस् तफ़् इलुन् [2212]+ खब्न+तरफ़ील  = मख़्बून मुरफ़्फ़ल = मफ़ाइलातुन    = 12122

 रजज़  कीसालिम बहरों पर चर्चा पिछले क़िस्त 39 में कर चुके हैं । अब इनकी  मुज़ाहिफ़ बहूर की चर्चा करेंगे।

मुरब्ब: मुज़ाहिफ़:-
[1] बहर-ए-रजज़ मुरब्ब: मुतव्वी /मज़ाल
मुफ़तइलुन-------मुफ़तइलुन--/मुफ़त इलान     
2 1  1   2---------2 112      ’/ 2 1  1 2 1
उदाहरण :
तीर-ए-नज़र दिल पे लगी
हाय ! ख़ुदा ख़ैर करे

तक़्तीअ’ भी देख लेते है
2 1    1  2   / 2    1  1 2
तीर--नज़र / दिल पे लगी
2   1  1    2 / 2 1 1 2
हाय ! ख़ुदा/  ख़ैर करे
मज़ाल का भी एक मिसाल देख लेते हैं [कमाल साहब के हवाले से]

देख ये अन्जाम-ए-बहार
चारो तरफ़ ख़ार ही ख़ार

अब तक़्तीअ’ भी देख लेते है
2 1  1   2    / 2  1    1 2 1
देख ये अन / जाम-ए-बहार
2   1  1 2  / 2 1   1  2 1
चा रू तरफ़ /  ख़ार ही ख़ार
  अरूज़ और  ज़र्ब में   मुफ़ त इलुन [2 1 1 2 ] की जगह ’मज़ाल’ मुफ़ त इलान  [ 21121] या  मज़ाल  मुफ़त इलान[21121]  की जगह मुफ़ त इलुन [ 2112]   लाया जा सकता है -इजाज़त है
इसकी ’मुज़ाइफ़’ [दो गुनी] शकल भी मुमकिन है
अच्छा ,लगे हाथ -तस्कीन के अमल की भी चर्चा कर लेते है
चूँकि मुफ़ त इलुन [2 1 1 2] में 3-मुतहर्रिक एक साथ आ गया है तो ’तस्कीन’ का अमल हो सकता है यानी ’मुस त फ़ लुन" [ 2 1 1 2 ] तब  222 हो जायेगा और इसे   ’मफ़ऊलुन’ [222] से बदल लेंगे यानी
2112-----222- भी एक वज़न हो सकता है या [अगर अरूज़/ज़र्ब पर तस्कीन का अमल करते है तो]
और बहर का नाम होगा---बहर-ए-रजज़ मुरब्ब: मुतव्वी मुसक्किन /मज़ाल
222-----2112  भी  एक वज़न हो सकता हौ   [ अगर सदर/इब्तिदा पर तस्कीन का अमल करते है तो ]

मगर ख़याल रहे --तस्कीन का अमल एक साथ दोनो मुक़ाम पर एक साथ नहीं कर सकते । क्यों?
वो इस लिए कि --अगर आप दोनो रुक्न पर ’तस्कीन’ का अमल एक साथ करेंगे तो बहर हो जायेगी
222---222- या 22--22--22--यानी बहर बदल जायेगी और वज़न ’मुतक़ारिब’ या  ’मुतदारिक" की कोई मुज़ाहिफ़ बह्र हो जायेगी। और आप जानते ही हैं कि तस्कीन के अमल में एक शर्त [क़ैद] यह भी  है कि अमल से बहर न बदल जाये। अत: तस्कीन का अमल दोनो मुक़ाम पर एक साथ नहीं हो सकता। यही बात ’मुसद्दस’ या ’मुसम्मन’ पर भी लागू होगा।
[2] बहर-ए-रजज़ मुसद्दस मुतव्वी /मज़ाल
मुफ़ त इलुन----मुफ़ त इलुन----,मुफ़ त इलुन  / मुफ़ त इलान  
2  1   1  2 ------2 1 1  2-------2   1  1 2   / 2  1  1   2 1
[ -ते- ऐन--लाम   मुतहर्रिक है ---यानी 3-मुतहर्रिक एक साथ आ गया है यहाँ]
उदाहरण  डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

 मेरी मुहब्बत का हसीं ख़्वाब हो तुम
अपनी निगाहों में बसाया है तुम्हें

तक़्तीअ’ कर के देख लेते है जिससे बात साफ़ हो जाये
2 1  1  2   / 2   1 1   2  /  2 1  1 2
मेरी मु हब् /बत का हसीं / ख़ाब हो तुम
 2    1 1  2    / 2 1  1 2  / 2 1 1 2
अप नी निगा / हों में बसा / या है तु मे


अरूज़ और  ज़र्ब में   मुफ़ त इलुन [2 1 1 2 ] की जगह ’मज़ाल’ [ 21121] या  मज़ाल [21121]  की जगह मुफ़ त इलुन [ 2112]   लाया जा सकता है -इजाज़त है
और अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर जो ’मुफ़ त इलुन’ [2112]  दिख रहा है वो ’तस्कीन-ए-औसत की अमल से [222] "मफ़ ऊ लुन ’ भी किया जा सकता है । तब बह्र के नाम में ’मुसक्किन’ लफ़्ज़ और बढ़ जायेगा।
यहाँ भी ’तस्कीन’ के अमल से अतिरिक्त वज़न प्राप्त किया जा सकता है अगरचे यहाँ पर वो सभी मज़ीद वज़न दिखाया नहीं गया है मगर आप कर सकते है।
[3] बह्र-ए-रजज़ मुतवी मरफ़ूअ’ .मज़ाल
मुफ़तइलुन----मुफ़त इलुन--- फ़ाइलुन \फ़ाअ लान
2 1 1 2     ---2 1 1 2------212 \2121
उदाहरण : मीर का एक शे’र है

इश्क़ में नै  ख़ौफ़-ओ-ख़तर चाहिए
जान को देने को जिगर    चाहिए

ख़ौफ़ क़यामत का यही है कि ’मीर’
हम को जिया बार-ए-दीगर चाहिए

तक़्तीअ कर के देख लेते है
2     1  1  2 /    2 1   1  2    / 2 1 2
इश् क में नै /  ख़ौफ़--ख़तर /चाहिए
2 1   1   2  / 2 1   1 2       / 2 1 2
जान को दे /ने को  जिगर       / चाहिए

2   1  1  2   / 2  1  1 2   / 2 1  2  1
ख़ौफ़ क़या/ मत का यही / है कि ’मीर’
2    1   1   1  /   2 1  1  2    / 2 1 2
हम को जिया / बार-- दिगर  /चाहिए

[ नोट :- उर्दू में शे’र के वज़न को मिलाने के लिए ’न’ [1] को कभी कभी ’नै’ या  ’नइ’ [2] के वज़न पर लिखते है और  बोलते है। यहां मतला के  मिसरा उला में उसी का प्रयोग हुआ है।
[ नोट : मकता के मिसरा उला में अरूज़ के मुक़ाम पर  मुज़ाहिफ़  "मरफ़ूअ’ मज़ाल’" का प्रयोग किया गया है जो रवा है।
[यहाँ भी ’मुफ़ त इलुन" 2112 पर तस्कीन का अमल हो सकता है ।
[4]  बहर-ए-रजज़ मुसम्मन मुतव्वी / मज़ाल
       मुफ़ त इलुन----मुफ़ त इलुन----,मुफ़ त इलुन  -----मुफ़ त इलुन----/मुफ़त इलान
       2  1  1  2     -----2112-----------2112----------2112---------/ 21121
उदाहरण : डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से

अपनी निगाहों से मुझे यार गिराना न कभी
ख़्वाब मेरी चाह का मिट्टी में मिलाना न कभी
अब तक़्तीअ कर के देखते हैं
2    1   1  2   / 2   1  1 2/ 2 1 1 2/ 2  1 1 2
अप नि निगा / हों से मुझे / यार गिरा /ना न कभी
2   1   1  2 /   2  1 1   2  /  2  1  1  2   / 2 1 1 2
ख़ा ब मिरी / चाह का मिट् / टी  में मिला / ना न कभी

अरूज़ और  ज़र्ब में   मुफ़ त इलुन [2 1 1 2 ] की जगह ’मज़ाल’ [ 21121] या  मज़ाल [21121]  की जगह मुफ़ त इलुन [ 2112]   लाया जा सकता है -इजाज़त है
यहाँ भी ’तस्कीन’ के अमल से अतिरिक्त वज़न प्राप्त किया जा सकता है
============================
अब ज़रा ,"ख़ब्न और तय्यी" ज़िहाफ़ की भी चर्चा कर लेते हैं
[5] बहर-ए-रजज़ मुरब्ब: मुतव्वी मख़्बून \ मख़्बून मज़ाल
मुफ़ तइलुन---मफ़ा इलुन  \मफ़ाइलान
2  1  1   2-----12 12      \ 1 2 1 21
आप जानते है कि ’मुस तफ़ इलुन"[ 2 2 12 ]  का मुतव्वी-- मुफ़ त इलुन [ 2 1 12] है  ,  इसका ’मख़्बून -मुफ़ाइलुन’[1212] है और मज़ाल - मुफ़त इलान [ 12121] है --ऊपर देखे
अब बहर आसान हो गई होगी समझने में
कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से

ऐन हजूम-ए-फ़िक्र में
आप का आ गया ख़याल

तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
2 1 1 2         /  1    2    1  2
ऐन हजू         / में -फ़िक् र में
2   1  1    2 /  1 2  1 2 1
आप का आ/  गया ख़याल

यहाँ ज़र्ब में ’मज़ाल’ मुज़ाहिफ़ का प्रयोग हुआ है । यहाँ मफ़ा इलुन [1212] भी लाया जा सकता है .इजाज़त है।
[6] बहर-ए-रजज़ मुसम्मन मुतवी मख्बून
मुफ़तइलुन---मफ़ा इलुन----//मुफ़ त इलुन ---मफ़ाइलुन
2112-------1212----------// 2112---------1212
यह बहर  शिकस्ता है -बहर-ए-शिकस्ता के बारे में पहले भी चर्चा कर चुका हूं
मफ़ाइलुन [1212] की जगह मफ़ाइलान [ 12121] लाने की इजाज़त है
उदाहरण :- ग़ालिब की एक ग़ज़ल है आप ने भी सुनी होगी

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यों
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई  हमें  सताए  क्यों

दैर नहीं ,हरम नहीं ,दर नहीं ,आस्तां  नहीं
बैठे  हैं  रह गुज़र पे हम ,ग़ैर हमें उठाए क्यों

एक शे;रकी तक़्तीअ कर के देखते है
2 1 1  2         / 1 2  1  2      //  2  1 1   2  / 1  2   1  2
दैर नहीं         /,ह रम नहीं     ,// दर नहीं ,आ /स्  ताँ   नहीं 
2 1  1   2   / 1 2 1   2     //  2 1 1 2 / 1 2 1 2
बैठे  हैं  रह / गु ज़र पे हम //,ग़ैर हमें  / उठाए क्यों

एक बात ध्यान दें---मिसरा सानी में अगर ---" बैठे हैं रहगुज़र पर हम----" कह दें तो क्या हो जायेगा? मानी मैं तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा मगर शे;र वज़न से ’खारिज़’ हो जायेगा } क्यों ?
क्यों कि -पे’ जहाँ है वहाँ मुतहर्रिक हर्फ़ की माँग है --"पर" का वज़न  [सबब-ख़फ़ीफ़ [2] का हो जायेगा । और यही होती है शे’र और वज़न की बारीक़ियाँ
बहर-ए-शिकस्ता इस लिए कि बात  इस अलामत // के पहले ही ख़त्म हो जाती है .तक़्तीअ में कोई लफ़्ज़ का हर्फ़ // के उस पार नहीं जा रहा है
 बाक़ी की तक़्तीअ आप कर लें -आसान है।
[7]   बहर-ए-रजज़ मुसम्मन मख़्बून मुतव्वी
 मफ़ाइलुन------मुफ़ त इलुन------// मफ़ाइलुन----मुफ़ त इलुन
1212------------2112--------//    1212------2 1  1 2
बहर [5] और बहर [6] ध्यान से देखें -- कुछ नहीं किया बस ’मुतव्वी’ और ’मख़्बून’ का स्थान एक दूसरे से बदल दिया और नाम उसी के अनुसार रख दिया
यह बह्र भी शिकस्ता है। शिकस्ता बह्र के बारे पहले ही चर्चा कर चुका हूँ । अरूज़ और ज़र्ब में मुतवी की जगह ’मुतव्वी मज़ाल [ मफ़ाइलान=12121] भी लाया जा सकता है
उदाहरण-डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से

सुनो सुनो हम वतनो          //,ज़रा सुनो मेरी जुबान
बताओ सच तुम को क़सम //,कभी सुनी ऐसी जुबान

तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1  2   1  2 /  2 1 1 2          //  1212     / 12 1 2
सुनो सुनो  / हम वतनो          //,ज़रा सुनो /मिरी जुबाँ
1  2   1  2    /  2   1  1 2   //    1  2  1 2 / 1 2  1 2
बताओ सच / तुम को क़सम //,कभी सुनी  / ऐसी जुबाँ
इस में अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर ’मुफ़ त इलान’ [21121] भी लाया जा सकता है चाहे आप एक मुक़ाम पे लाएँ या दोनो मुक़ाम पे लाएँ।
उदाहरण -- बिलकुल आप के सामने है \ कहीं दूर जाने की ज़रूरत नही हैं] ,ऊपर के उदाहरण में अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर जो ’ मिरी ज़ुबाँ’ [1212]  है , बस उसे ’ मिरी’जुबान’ [12 121] लिख दें । कितना आसान है।

[8] बहर-ए-रजज़ मुसम्मन मरफ़ूअ मख़्बून
फ़ाइलुन---मफ़ाइलुन----// फ़ाइलुन----मफ़ाइलुन
212---------1212-----// 212-------1212
आप जानते हैं कि मुस तफ़ इलुन [ 2212] का मरफ़ूअ [ रफ़अ ज़िहाफ़ लगा हुआ] फ़ाइलुन [212] है [ऊपर देखें] और यह सदर और इब्तिदा ले लिए मख़्सूस है
[अत: बहर [5] और [6] की तरह यहाँ " मख़्बून---मरफ़ूअ’ की तरतीब नहीं कर सकते कारण मरफ़ूअ जब भी आयेगा तो सदर और इब्तिदा के मुक़ाम पर ही आयेगा न कि हस्व के मुक़ाम पर]

उदाहरण : डा0 ख़ान साहब के ही हवाले से

हक़ से हूँ मै  बेख़बर  मुझ को रास्ता देखा
मुझ को हर गुनाह से ऎ मेरे ख़ुदा   बचा

अब तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
  2      1    2/ 1  2 1  2  //  2    1  2   / 1  2 1 2
हक़ से हूँ / मै  बे ख़बर //  मुझ को रा / स ता दिखा
2       1   2  / 1  2 1 2 // 2  1 2      / 1 2 1 2
मुझ को हर / गुनाह से //  ऎ    मिरे    / ख़ुदा   बचा
[9] बहर-ए-रजज़ मुसद्दस मख़्बून मरफ़ूअ मख़्लूअ
मफ़ाइलुन-----फ़ाइलुन----फ़ऊलुन
1212----------212-------122
उम्मीद है कि अब तो आप " मुसतफ़इलुन" [2212] का मख़्बून और मरफ़ूअ तो आप समझ गए होंगे ,ऊपर चर्चा कर चुका है } हाँ  ’मुसतफ़ इलुन [ 2 2 12]  पर ’ख़लअ ’ ज़िहाफ़ लगाने पर मुज़ाहिफ़ मख़्लूअ ’फ़ऊलुन’ [122] होता है
अत: बह्र का नाम भी उसी अनुसार लिखा जाता है
उदाहरण-डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

जला रहे हैं जो घर को मेरे
वो मेरे भाई हैं जानता हूं

तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
1  2   1 2 / 2 1   2  / 1  2 2
जला रहे/  हैं जो घर / को मेरे
1   2 1 2  /  2 1 2   / 1 2 2
वो मेरे भा/ ई हैं जा   / नता हूं

[10] बहर-ए-रजज़ मुसम्मन मख़्बून मुरफ़्फ़ल
मफ़ाइलातुन----मफ़ाइलातुन---मफ़ाइलातुन---मफ़ाइलातुन
12122---------12122-------12122---------12122
उदाहरण ; ’अदम’  का एक शे’र

ग़म-ए-ज़माना सता रहा है ,ग़म-ए-ज़माना मसल रहा है
मगर मेरे दिन गुज़र रहे हैं ,मगर मेरा वक़्त  टल रहा है

अब तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
12  122     /12 122     /  1 2  122  /  1 2     1 2 2
ग़मे ज़माना / सता रहा है / ,ग़मे ज़माना / म सल रहा है
1  2   1 2  2   /  1 2  122   /  12 1 2   2      / 1 2 1 2 2
म गर मिरे दिन /गुज़र रहे हैं ,/ मगर मिरा वक़्/ त  टल रहा है

जोश मलीहाबादी का एक शे’र है

मिला जो मौक़ा तो रोक दूँगा जलाल रोज़-ए-हिसाब तेरा
पढूँगा रहमत का वो क़सीदा कि हँस पड़ेगा इताब तेरा

अब तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
1  2   1  2  2   / 1   2 1  2 2  /  1 2  1  2 2 / 1 2 1 2 2
  मिला जो मौक़ा / तो रो क दूँगा / जला ल रोज़े /हिसा ब तेरा
1  2  1  2   2  / 1   2 1 2 2    / 1    2   1 2 2   / 1 2 1 2 2
पढूँ गा रहमत / का वो क़सीदा / कि हँस पड़ेगा / इता ब तेरा

हम यह तो नहीं कहा सकते है कि " मुसतफ़इलुन" [ 2212] पर लगने वाले सभी ज़िहाफ़ की चर्चा कर लिया हूं । अभी भी बहुत से ज़िहाफ़ हैं फ़र्द भी मुरक्क़ब भी  मुसक्किन भी जो ’ मुस तफ़ इलुन ’ [2212] पर लगाए जा सकते हैं और लगते भी हैं। आप किसी भी प्रमाणित अरूज़ की किताब में देखी जा सकती है । यहाँ पर सभी की चर्चा करना मुनासिब न होगा ।अत: मात्र मक़्बूल ज़िहाफ़ की ही चर्चा की है 
चलते चलते एक वज़न की और चर्चा करते चलते हैं--जो ग़ैर मुनासिब न होगा
एक वज़न है
[11] बहर-ए-रजज़ मुसम्मन मुतव्वी मुरफ़्फ़ल
मुफ़तइलातुन  -----मुफ़तइलातुन  ------मुफ़तइलातुन  -----मुफ़तइलातुन 
21122    ---------21122-------------21122------------21122  [ ध्यान रहे-- ते---ऐन-- लाम  तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गये है अत: ’तस्कीन-ए-औसत’ का अमल लग सकता है । पर चारों मुक़ाम पर एक साथ नहीं लग सकता ,कारण कि तब यह बह्र  बदल जायेगी - 22-22--22-22----22-22---22-22
या तो मुतदारिक के वज़न में चली जायेगी या मुतक़ारिब के वज़न में चली जायेगी
अगर आप तस्कीन-ए-औसत का अमल ’एक के बाद एक’ मुक़ाम पर किया जाय तो आप ख़ुद देख लें कि कितना अतिरिक्त वज़न बरामद हो सकता है
एक बात और
21122 को [21-112] में तोड़ा जा सकता है अत: ऊपर के वज़न को इस प्रकार भी लिख सकते है
21--122    ---------21--122-------------21--122------------21--122  --यह मुतक़ारिब के वज़न में आ गया यानी
[फ़अ लु---फ़ऊलुन]---[फ़अ लु---फ़ऊलुन]-----[फ़अ लु---फ़ऊलुन]----[फ़अ लु---फ़ऊलुन]
अब आप चाहें तो इस वज़न को रजज़ के अन्तर्गत रखें या मुतक़ारिब के तहत
ख़ैर इस बहर का एक उदाहरण कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से देख लेते हैं

दार पे मरना नंग नहीं है ,ख़ून है वो मेरा  रंग नहीं है
ये न छूटेगा ,ये न कटॆगा ,ये न हटॆगा , ज़ंग नहीं है

तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
2 1 1  2  2   / 2 1 1 2 2  /  2 1 1 2 2  / 2 1 1 2 2
दार पे मरना / नंग नहीं है / ,ख़ून है  मेरा /रंग  नहीं है
2  1  1 2 1 /  2 1 1 2 2  / 2 1 1 2 2  / 2 1 1 2 2
ये न छटेगा /,ये न कटॆगा ,/ये न हटॆगा ,/ ज़ंग नहीं है
तस्कीन-ए-औसत के अमल से और भी बहुत सी वज़न बरामद हो सकती है  बस नाम में ’मुसक्कन’ जोड़ देगे।
 आप के मश्क़ [मिहनत] और फ़न-ए-शायरी  पर निर्भर करेगा

मैं यह तो नहीं कह सकता कि रजज़ के मुज़ाहिफ़ बहर का बयान मुकम्मल हुआ पर हाँ काफी बहर पर चर्चा कर लिया जो मक़्बूल-ओ-मारूफ़ हैं } और भी बहर बरामद हो सकती है क्योंकि अभी और भी ज़िहाफ़ात बाक़ी है । तस्कीन के अमल से कई बहर और बरामद हो सकती थी --मगर मैने आप की सुविधा के लिए कि कही आप ’बोर’ न हो जायें या उलझ न जाये और तवालत से बचने के लिए चर्चा नहीं किया। ऐसे बहूर किसी भी अरूज़ की किताब में दस्तयाब [प्राप्य] हो जायेंगी} शायरी /शे’र या गज़ल कहने के लिए ये भी ज़ख़ीरा कम तो नहीं ।

अब अगले क़िस्त में ’बहर-ए-कामिल’ पर चर्चा करेंगे
आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर में इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-










रविवार, 24 दिसंबर 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 39 [रजज़ की सालिम बह्रें]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 39 [ रजज़ की सालिम बह्रें ]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

बहर-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न  है -मुस् तफ़् इलुन् ’ [2212]

यह एक सालिम रुक्न है। सालिम क्यों? क्यों कि इस रुक्न पर अभी कोई ज़िहाफ़ नहीं लगा है
यह बह्र भी " दायरा-ए-मुज्तल्बिया " से निकली है  जैसे बहर-ए-हज़ज और बहर-ए-रमल  निकली हुई है।
यह बहर भी एक वतद[1] और दो  सबब [2] से मिलकर बनती है -यानी 7-हर्फ़ी रुक्न है हज़ज और रमल की तरह
रजज़ = मुस तफ़ इलुन [ 2 2 12] = सबब-ए-ख़फ़ीफ़  [ मुस ] +सबब-ए-खफ़ीफ़ [तफ़] +वतद-ए-मज्मुआ [इलुन]
  = मुस +तफ़ +इलुन
  =  2  +2  +  3     = 7 हर्फ़  यानी यह भी एक सुबाई बह्र है

[ थोड़ा हट कर कुछ और चर्चा कर लेते है- शायद आप को दिलचस्प लगे।जब तमाम सालिम बह्र वतद और सबब के combination aut permutation से ही बनती है तो फिर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के लिये [ --फ़ा---ई---लुन---मुस---तफ़--मुफ़---ऊ---] लाने की क्या ज़रूरत थी सबका वज़न तो - 2- है। किसी एक से भी काम चल सकता था।
और उसी तरह वतद के लिए [--मफ़ा---इला---इलुन---लतुन--] लाने की क्या ज़रूरत थी ।सबका वज़न तो -3- ही होता है। इसमें से किसी एक से भी तो काम चल सकता था
ख़ैर--कमाल अहमद साहब ने भी इस पर सोचा ,मैने भी सोचा --आप भी सोचिए-- शायद कोई बात निकल आए। क्लासिकल अरूज़ी की बातें है सदियों से ऐसे ही चला आ रहा है । हम भी ऐसा ही मानते हुए आगे बढ़ते है
जैसे बहर-ए-रमल  की बुनियादी रुक्न [फ़ाइलातुन’ [ 2 12 2 ] को दो तरीक़े से लिखा जा सकता है
[1] मुत्तसिल शकल
[2] मुन्फ़सिल शकल
उसी प्रकार ’मुस तफ़ इलुन’  [2 2 12] भी दो तरह से लिखा जा सकता है

[1] मुतस्सिल शकल = रुक्न की वो शकल जिसमें सारे हर्फ़ [मीम,सीन,ते,फ़े ,ऐन ,लाम.नून] -उर्दू स्क्रिप्ट में मिलाकर [ सिलसिलेवार] लिखे जाते है यानी मुसतफ़इलुन [ इसमें "इलुन’ वतद मज्मुआ के शकल [हरकत+हरकत+साकिन] के शकल में रहती है। यानी इस वतद में दोनो हरकत वाली हर्फ़ एक साथ ’जमा’ हो गई है इसी किये इसे ’वतद मज्मुआ’ कहते है
[2] मुन्फ़सिल शकल= रुक्न की वो शकल जिसमें कुछ हर्फ़ ’फ़ासिला’ देकर [ख़ास तौर से   "तफ़ अ"[ ते,फ़े,ऐन-यहाँ -ऐन मय हरकत है] लिखते है । इसमें ’तफ़ अ’ --;वतद मफ़रूक़’ है यानी [हरकत+साकिन+हरकत] यानी दो हरकत वाले हर्फ़ में फ़र्क है-इसी लिए इसे वतद मफ़रूक़ कहते है
खैर - यह बात पिछले क़िस्त में भी कर चुका हूं। ख़ूबी यह कि दोनो शकलों में  वज़न एक ही है [2212] और दोनो ही 7-हर्फ़ी रुक्न है
अच्छा ,तो फिर इस शकल [वतद-ए-मफ़रुक़] की ज़रूरत क्यों पड़ी? कारण वही जो बहर-ए-रमल में बयान किया था । एक बार फिर चर्चा कर देता हूँ कि बात अच्छी तरह ज़ेहन नशीन हो जाये।
दरअस्ल "वतद-ए-मफ़रुक़"  वाली शकल की रुक्न,  मुरक्क़ब बहरों में प्रयोग की जाती है जैसे--मुजतस---ख़फ़ीफ़---ज़दीद--में इस शकल का प्रयोग होता है और इन बहरों में ज़िहाफ़ ’वतद-ए-मज्मुआ’ वाला नहीं ,’वतद-ए-मफ़रूक़ ’ वाला लगेगा। यह निकात की बात है । लोग ग़लती से इन बहूर में मात्र ’वतद’ देख कर  वतद-ए-मज्मुआ’ पर लगने वाली ज़िहाफ़  लगा देते हैं ।इस बात की चर्चा विस्तार से उधर ही करूंगा जब ’मुरक़्कब बहर की चर्चा करेंगे। शोशा:  यहीं छोड़े जाता हूं।
एक दिलचस्प बात और --
अब आप के पास ’रमल’ और ’रजज़ " के दो रुक्न ऐसे हो गए जो ’वतद-ए-मफ़रूक़’ [ हरकत+साकिन+हरकत] वाली शकल के है
इसके अतिरिक्त एक रुक्न और है जिसमें ’वतद-ए-मफ़रूक़’ का प्रयोग होता है और जिसकी चर्चा भी बहुत पहले शुरु शुरु में की थी --"मुझे याद है कुछ ज़रा ज़रा तुम्हे याद हो कि न याद हो"-- और वह रुक्न है  =मफ़ऊलातु= [ 2 2 2 1]
यानी -लातु- [लाम ,अलिफ़, ते]में -तु- मुतहर्रिक है यानी [हरकत+साकिन+हरकत]-यानी यह भी ’वतद-ए-मफ़रूक़’ वाली शकल के हैं अर्थात अब कुल मिला कर अब 3- रुक्न ऐसे हो गए आप के पास।
अगरचे ,’मफ़ऊलातु’ सालिम रुक्न तो है मगर किसी सालिम बहर में आता नहीं ---कारण कि इसका आखिरी हर्फ़ -तु- मुतहार्रिक है और किसी शे’र या मिसरा के आखिर हर्फ़ ’मुतहर्रिक ’ नहीं होता
अत: तीनो रुक्न [ वतद-ए-मफ़रुक़ की शकल वाली] सालिम मुफ़र्द [एकल रुक्न वाली बहर] में नहीं होता न ही इस से कोई सालिम बहर ही बनती है .बल्कि मुरक़्क़ब बहरों में होता है।
ख़ैर--
बहर-ए-रजज़ की सालिम बहर -मुरब्ब:--मुसद्दस--मुसम्मन पर चर्चा तो आसान है।
[1] बहर-ए-रजज़ मुरब्ब: सालिम
मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलुन [यहाँ रुक्न को तोड़ तोड़ कर इस लिए दिखा रहे हैं कि आप को पता चलता रहे कि रुक्न सबब+सबब+वतद से बना है ।वरना तो रुक्न ’मुसतफ़इलुन’[2212] ही है
2   2  1 2        ---2 2 1 2 [शे’र में चार बार -]
उदाहरण-खुदसाख़्ता एक शे’र हैं

होगा यकीं तुम को नहीं
हर साँस में हो तुम बसी 
तक़्तीअ कर के देखते हैं 2   2  1 2  /  2  2   1 2
होगा यकीं  /तुम को नहीं
2     2  1 2 /  2  2 1  2
हर साँस में /हो तुम बसी

[2] बहर-ए-रजज़ मुरब्ब:  मज़ाल
मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलान
2   2   12        ---2 2 1 21
एक ज़िहाफ़ होता है ’इज़ाला’ जो "वतद-ए-मज्मुआ’ [यानी इस केस में ’इलुन’ [12] पर लगेगा ]’पर लगता है और मुज़ाहिफ़ का नाम होता है "मज़ाल’ और यह ज़िहाफ़ अरूज़ और ज़र्ब के लिए ख़ास होता है । इस ज़िहाफ़ में रुक्न के आखिर में एक साकिन [अलिफ़]बढ़ जाता है अत: ’मुस तफ़ इलुन" [2212 ] पर इज़ाला का अमल होगा तो मुज़ाहिफ़ मज़ाल ’ मुस तफ़ इलान ’[ 22121] हो जायेगा। और आप जानते ही हैं कि शे’र के आखिर में एक हर्फ़-ए-साकिन के बढ़ जाने से बहर/वज़न में कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।
इसी कारण अरूज़  और ज़र्ब में ’मुसतफ़इलुन’2212]  की जगह ’मुस तफ़ इलान [22121]’ और मुस तफ़ इलान[22121]’ की जगह ’मुस तफ़ इलुन’[2212] लाया जा सकता है
उदाहरण -
क़ातिल् लुटेरे आज कल्
पाते हैं इनाम-ए-ख़तीर 

अब तक़्तीअ भी देख लेते हैं-
2   2      12  / 2 2 1    2
क़ा तिल् लुटे / रे आज कल्/
2  2 1  2   /  2  1  1 2  1
पाते हैं ई   / ना  मे  ख़तीर
यहाँ ज़र्ब में मुस तफ़ इलान [22121] है जब कि अरूज़ में ’मुस तफ़ इलुन [2212] है और यह जायज है और बह्र का नाम निर्धारण भी इसी ज़र्ब में मुस्तमिल रुक्न के आधार पर होगा ।


[3]  बहर-ए-रजज़ मुरब्ब: मज़ाल  मुज़ाइफ़  : यानी मुरब्ब: मज़ाल  को दुगुना [मुज़ाइफ़] कर देने के बाद बरामद हुई बह्र
मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलान-//--मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलान
2   2  1 2        ---2 2 1 21 //-----2   2  1 2        ---2 2 1 21
उदाहरण :कमाल अहमद सिद्दीक़ी  साह्ब के हवाले से

हूँ जिसकी ज़ुल्फ़ों का असीर ,वो गुलबदन बद्र-ए-मुनीर
वो है बहारों का सफ़ीर ,इसकी नहीं कोई नज़ीर

तक़्तीअ भी आप देख लें--एक इशारा कर देता हूँ
2    2    1    2    /  2  2    1  2 1//  2  2   12     / 2 2  1 2 1
हूँ जिस की ज़ुल / फ़ो का असीर//  ,वो गुल बदन / बद् रे मुनीर
2   2  1 2  / 2  2  1 2  1  //    2 2 1  2  / 2 2  1 2 1
वो है बहा / रों का सफ़ीर ,// इसकी नहीं /  कोई नज़ीर--

यहां एक बात स्पष्ट कर दें-- अगर ’मुरब्ब:सालिम" को ’मुज़ाइफ़’ [2-गुना ] कर दें तो हर मिसरा में 4-रुक्न हो जायेगा[यानी शे’र में 8-रुक्न] तो फिर ये ’मुसम्मन सालिम’ का भरम होने लगेगा ।
मगर ज़िहाफ़ मज़ाल --अरूज़ और जर्ब के लिए मख़्सूस है अत: अगर यह ज़िहाफ़ किसी  सालिम मुसम्मन के अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर भी लगा होगा तो भी  ्मुसम्मन सालिम मज़ाल ’ का भरम पैदा करेगा
मगर जब ’दूसरे" या छ्ठें  मक़ाम पर ’मज़ाल’ हो तो यक़ीनन वह शे’र ’मुरब्ब: मज़ाल मुज़ाइफ़’ ही होगी -कारण कि मुरब्ब: मे ’हस्व’ का मुक़ाम नही होता जब कि मुसम्मन के मिसरा में 2-हस्व के मुक़ाम होते है
एक बात और ---मुरब्ब: मुज़ाइफ़ में ’अरूज़ी वक़्फ़ा’ // ज़रूर होगा जब कि ’मुसम्मन’ में यह अनिवार्य [नागुज़ीर] शर्त नहीं है यानी मुसम्मन में यह अरूज़ी वक़्फ़ा आ भी सकता है और नहीं भी आ सकता है
[4] बहर-ए-रजज़ मुसद्दस सालिम /मज़ाल ; यानी मुसतफ़ इलुन [2212] शे’र में 6-बार [मिसरा में 3- बार]
मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलुन--मुस तफ़ इलुन / मुस तफ़ इलान
2  2  1 2---------2 2 1 2---------2 2 1 2 / 22121
उदाहरण-खुदसाख़्ता एक शे’र है

वादा निभाना  आप को आता नही
अस्बाक़-ए-उलफ़त आप को समझाए कौन ?

तक़्तीअ भी देख लेते हैं-
2  2   1 2  /   2   2  1   2  / 2  2  1 2
  वादा निभा /   ना  आप को / आता नही
2      2  1   2   /  2    2  1  2   / 2  2  1  2 1
अस् बाक़ उल/  फ़त आप को / समझाए कौन ?
यानी पहला मिसरा मुसद्दस सालिम का है और दूसरा मिसरा मुसद्द्स मज़ाल का है -और दोनों का ख़्ल्त जायज़ है -यानी अरूज़ और ज़र्ब में सालिम [2212] और मज़ाल [22121] लाया जा सकता है। और आप चाहे तो दोनो ही जगह यानी अरूज़ और ज़र्ब में ’मज़ाल ’ मुस तफ़ लान’ ला सकते हैं।

[5]-  बहर-ए-रजज़ मुसद्दस सालिम मुज़ाइफ़  : यानी एक शेर में 12 रुक्न [मिसरा में 6 रुक्न]
मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलुन--मुस तफ़ इलुन -----मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलुन--मुस तफ़ इलुन
2  2  1 2---------2 2 1 2---------2 2 1 2 --------2  2  1 2---------2 2 1 2---------2 2 1 2
उदाहरण--एक बार फिर कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से

जो कुछ हमारे साथ इस ज़ालिम ज़माने ने किया, तुम जानते हो और हम
ख़ामोश क्यों बैठे रहे ,क्यों जुल्म हम सहते रहे, झूटा है ये सारा  भरम

तक़्तीअ भी देख लेते हैं
2     2    1   2/ 2 2 1   2   / 2  2    1   2   / 2 2 1 2    / 2   2  1  2/ 2  2 1 2
जो कुछ हमा / रे साथ इस /  ज़ालिम ज़मा / ने ने किया, / तुम जानते / हो और हम
2     2  1   2  / 2 2 1 2/  2  2      1  2    /  2  2   1  2 / 2  2 1 2  / 2  2   1 2
ख़ामोश क्यों / बैठे रहे ,/ क्यों जुल् म  हम /  सहते रहे, / झूटा है ये   /  सारा  भरम

यहाँ एक दो बात कर लेना ज़रूरी समझता हूँ ।
 बह्र-ए-रजज़ मुसद्दस सालिम मुज़ाल का अगर मुज़ाइफ़ शकल बनाई जाए तो --????
कुछ नही। बस ऐसे ही बनेगा । बस  तीसरे  ---छठे---नौवें और बारहवें मुक़ाम पे ’मुज़ाल’[यानी  ’मुस तफ़ इलान" 22121 ज़रूर लाना होगा और साथ ही तीसरे और नौवें रुक्न के बाद ’अरूज़ी वक़्फ़ा’ भी होना चाहिए ।

[6] बहर-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम 
मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलुन--मुस तफ़ इलुन ---मुस तफ़ इलुन
2  2  1 2---------2 2 1 2---------2 2 1 2  ------ 2 2 1 2
उदाहरण---इब्ने इन्शा की एक बहुत ही मशहूर ग़ज़ल है-आप ने भी सुना होगा

कल चौदहवीं की रात थी ,शब भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है ,कुछ ने कहा चेहरा  तेरा

हम भी वहाँ मौज़ूद थे ,हमसे भी सब पूछा  किए
हम हँस दिए हम चुप रहे मंज़ूर था पर्दा तेरा

मतला की तक़्तीअ देख लेते है -एक बार
   2   2   1 2  /2  2 1 2    /  2   2   1 2 /   2 2 1 2
कल चौदवीं / की रात थी ,/ शब भर रहा / चर् चा  तिरा
2      2  1  2  / 2  2 1  2/    2  2  1  2    /2  2 1 2
कुछ ने कहा / ये चाँद है ,/ कुछ ने कहा    /चेरा  तिरा

दूसरे शे’र की तक़्तीअ आप कर सकते हैं-प्रयास कीजिए

[7] बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम मज़ाल
मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलुन--मुस तफ़ इलुन ---मुस तफ़ इलान
2  2  1 2---------2 2 1 2---------2 2 1 2  ------ 2 2 1 2 1
उदाहरण---एक मिसाल देख लेते है [कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से]

गो देखने में सादा है ,आइना है उसका ज़मीर
इल्म-ओ-अमल,दानिश का वो रखता है सरमाया ख़तीर 
तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
2   2   1  2   / 2 2 1 2  /     2 2 1 2  /  2   2   1 2 1
गो दे ख ने   /में साद: है ,/  आई न:  है  /उस का ज़मीर
2    2   1  2     / 2  2     1  2   /   2  2  1 2    / 2 2 1 2 1
इल् मो अ मल /,दानिश का वो /  रखता है सर /माया ख़तीर

यहाँ अरूज़ और ज़र्ब दोनो ही मुक़ाम पर ’मुस तफ़ इलान ’[22121] लाया गया है  । वैसे इस बहर के लिए ’ज़र्ब’ में ही अगर ;मज़ाल’ लाया जाता तो भी बह्र का नाम यही रहता चाहे अरूज़ में भले ही ’सालिम’ मुस तफ़ इलुन’ 2212 क्यों न लाया गया हो} ख़ैर
[8]  बहर-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम मुज़ाइफ़ :  [यानी एक शे’र में 16-बार या मिसरा में 8-बार ] कभी कभी इस को 16-रुक्नी बहर भी कहते हैं
मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलुन--मुस तफ़ इलुन ---मुस तफ़ इलुन---मुस तफ़ इलुन----मुस तफ़ इलुन--मुस तफ़ इलुन ---मुस तफ़ इलुन
2  2  1 2---------2 2 1 2---------2 2 1 2  ------ 2 2 1 2     -----2  2  1 2---------2 2 1 2---------2 2 1 2  ------ 2 2 1 2
उदाहरण--कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से एक बार फिर
[यह कमाल साहब का ही कमाल है कि इतनी बड़ी बहर में शे’र कहा है]ख़ैर

दुनिया को मत इल्ज़ाम दो अच्छे है सब लेकिन दबा रख्खा है इनको जब्र ने ,इस जब्र से हम सब लड़ें
बर्दास्त करना  ज़ुल्म सहना जुर्म है नाकारा कर रख्खा है हमको सब्र ने ,इस  सब्र  से हम सब लड़ें

तक़्तीअ भी देख लेते है ज़रा-
 2   2    1   2  / 2   2   1   2/    2 2 1  2    /  2 2 1  2   / 2   2  1    2 /  2   2  1 2 /  2   2    1  2 / 2  2  1   2
दुन या कू मत / इल जा म दो / अच्छे है सब / लेकिन दबा / रख्खा है इन /को जब् र ने ,/ इस जब र से / हम सब लड़ें
2    2    1  2   /   2  2  1    2   /  2  2  1   2  /  2  2 1  2  /  2   2    1  2   /  2   2  1  2 /  2  2    1  2   / 2  2   1 2
बर् दास्  कर / ना  ज़ुल् म् सह / ना जुर् म्  है / नाकार कर / रख् खा  है हम / को सब् र् ने / ,इस सब् र्  से/ हम सब लड़ें
[यहाँ बर्दास्त् के बारे में थोड़ा चर्चा कर लेते है
बर्दास्त [ बर् दा स् त् -में अन्त में  3 साकिन [अलिफ़--सीन--ते ] एक साथ आ गए} ऐसी स्थिति में  ’दूसरा साकिन’ मुतहर्रिक और  ’तीसरा साकिन ’साक़ित’ हो जायेगा । इसी लिए यहाँ मैने -आखिरी -’त्’ को साक़ित कर दिया। अच्छा जब 3-मुतहर्रिक एक साथ आ जाये तो ???? अजी छोड़िए भी---यह तो आप जानते ही है -फिर से क्या बताना !
बहर-ए-रजज़ के सालिम रुक्न का बयान खत्म हुआ ।अब अगले क़िस्त में बहर-ए-रजज़ की मुज़ाहिफ़ बहूर की चर्चा करेंगे

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर में इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्बत ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीर : क़िस्त 38 ( बह्र-ए-रमल की मुसम्मन मुज़ाहिफ़ बह्रें]

उर्दू बह्र पर एक बातचीर : क़िस्त 38 ( बह्र-ए-रमल की मुसम्मन मुज़ाहिफ़ बह्रें]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

---पिछले क़िस्त में बहर-ए-रमल की मुरब्ब: और मुसद्दस मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा कर चुका हूँ । अब इस क़िस्त में रमल की मुसम्मन मुज़ाहिफ़ बह्र पे चर्चा करूंगा।
अगर आप ने रमल की मुसद्दस बह्र समझ लिया है तो समझिए कि आप ने रमल का मुसम्मन बह्र भी समझ लिया है। क्या फ़र्क है--मुसम्मन और मुसद्दस में । एक अतिरिक्त रुक्न का ही तो फ़र्क है और वो भी ’हस्व’ के मुक़ाम पे -वरना तो जो ज़िहाफ़ात मुसद्दस में लगेंगे वही मुसम्मन में भी लगेंगे।
रमल में [ या यूँ कहें कि हज़ज और रजज़ में भी] शायरों ने अपनी शायरी ज़्यादातर मुसद्दस और मुसम्मन में ही  की है और इसके काफी उदाहरण भी  मौज़ूद हैं।
एक -एक कर के उन पर चर्चा करते है
[1] बहर-ए-रमल मुसम्मन सालिम : इस बहर के बारे में पिछले क़िस्त में विस्तार से चर्चा कर चुका हूं } आप चाहें तो एक बार देख सकते है
[2] बहर-ए-रमल मुसम्मन महज़ूफ़: आप जानते है कि रमल की बुनियादी रुक्न ’फ़ाइलातुन’ है [2122] और इसका इसका महज़ूफ़ फ़ा इलुन’ [212]   है और ’महज़ूफ़’ अरूज़’ और ’जर्ब’ के लिए ख़ास है तो बहर की वज़न होगी
फ़ाइलातुन----फ़ाइलातुन----फ़ाइलातुन--- फ़ा इलुन
2122---------2122---------2122-------212
उदाहरण  :- गालिब का एक शे’र है

[क] नक़्श फ़रियादी है किस की शोखी-ए-तहरीर का
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर  का
तक़्तीअ भी देख लेते है
2    1      2   2   / 2  1  2     2  /   2  1  2  2   / 2 1 2
नक़् श  फ़र या / दी है किस की / शोख-ए-तह /रीर का
2  1   2  2      /  2 1  2  2       /  2 1  2   2   / 2 1 2
काग़ज़ी है      /  पै र हन हर     /  पै क रे-तस् /वीर  का

[ख] मीर का भी एक शे’र देख लें

ज़िन्दगी होती है अपनी ग़म के मारे देखिए
मूँद ली आँखें इधर से तुम ने प्यारे   देखिए

इशारा मैं कर देता हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें
2      1  2   2/ 2  1  2   2   /  2  1    2 2 / 212
ज़िन द गी हो /ती है अप नी / ग़म के मारे/ देखिए  [ यहाँ बह्र की माँग पर - है-- के- पर मात्रा गिराई गई है
2  1  2  2   / 2 1 2  2      /    2  1  2  2   / 2 1 2
मूँद ली आँ /खें इधर से       / तुम ने प्यारे /   देखिए [ यहाँ भी -ने- पर मात्रा गिराई गई है]

[3]  बहर-ए-रमल मुसम्मन मक़्सूर  :आप जानते है कि रमल की बुनियादी रुक्न ’फ़ाइलातुन’ है [2122] और इसका मक़्सूर  फ़ाइलान’ [2121 ] है और ’मक़्सूर ख़ास तौर से ’ अरूज़’ और ’जर्ब’ के लिए मख़्सूस  है तो बहर होगी
फ़ाइलातुन----फ़ाइलातुन----फ़ाइलातुन--- फ़ा इलान
2122---------2122---------2122-------2121
ख़ास बात यह कि  शे’र मैं ’महज़ूफ़’ [212]की जगह ’मक़्सूर[2121] ’ और ’मक़्सूर’[2121] की जगह ’महज़ूफ़’[212]  लाया जा सकता है और इसकी इजाज़त भी है।  मगर बह्र का नामकरण ’मिसरा-सानी’ में प्रयुक्त ज़िहाफ़ के लिहाज़ से ही होगा। इस बात की चर्चा पहले क़िस्त में कर चुका हूं
ग़ालिब का एक दूसरा शे’र [उसी ग़ज़ल से ] लेते हैं

[क] काव-कावे सख़्तजानी हाय तनहाई न पूछ
सुबह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का
एक बार तक़्तीअ देख लेते हैं
2   1  2   2  /  2    1   2  2  /   2 1  2  2   / 2 1 2 1   
काव-कावे  /  सख़ त  जानी /  हाय तन हा /ई न पूछ
2     1   2  2   /   2 1  2  2   / 2 1  2  2 / 2 1 2
सुब ह करना  /  शाम का ला /ना है जू-ए-/शीर का
यहाँ अरूज़ के मुक़ाम पर मक्सूर[2121] लाया गया है जब कि जर्ब के मुक़ाम पर महज़ूफ़ [212]  अत: ग़ज़ल की बहर होगी--" बह्र-ए-रमल मुसम्मन महज़ूफ़’   --न कि मक्सूर
[ख] एक शेर मीर का भी देख लेते हैं

किसकी मसजिद ? कैसे मयख़ाने ? कहां के शैख़ो-शाब ?
एक गर्दिश में तेरी चश्म-ए-सियह की  सब खराब
एक बार इस की तक़्तीअ भी देख लेते हैं
2        1    2    2      /  2 1  2  2    / 2 1  2 2     /  2 1 2 1
किस की मस जिद ?/ कैसे मयख़ा  /ने  कहां के    / शैख़-शाब ?
2   1  2  2            /  2 1  2  2     / 2 1  2    2   /  2   1 2 1
एक गर् दिश        / में तिरी चश   / मे सियह की / सब खराब
्संयोग से ,यह शे’र शुद्ध रूप से बहर-ए-रमल मुसम्मन मक़्सूर का उदाहरण है । कारण कि दोनो मिसरों में ’फ़ाइलान’ [ 2121] का प्रयोग हुआ है।मगर किसी ग़ज़ल मे ’फ़ाइलुन[212] और फ़ाइलान [2121] आपस में बदले जा सकते है
बहुत से शायरो ने इस बहर में ग़ज़ल कही है सब को यहाँ लिखना मुनासिब नहीहै-बस इतना ही समझ लीजिये कि बड़ी मक़्बूल बहर है यह।
-------------------------------------------
अच्छा , अब कुछ रमल पर खब्न ज़िहाफ़ की बात कर लेते है यानी ’रमल मुसम्मन मख्बून’ और रमल मुसम्मन म्ख़्बून महज़ूफ़/मक़्सूर’ पर कुछ बात कर लेते हैं
आप जानते है कि ’फ़ाइलातुन’ [2122] का मख़्बून है ’फ़इलातुन’ [1122]  और यह एक आम ज़िहाफ़ है जो शे’र में किसी मुक़ाम पर लाया जा सकता है
और  महज़ूफ़ [212] और मक़्सूर [ 2121] ख़ास ज़िहाफ़ है जो अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ही लाया जा सकता है
और  सदर और इब्तिदा के के मुक़ाम पर सालिम फ़ाइलातुन [2122] की जगह फ़इलातुन भी [1122] लाया जा सकता है । क्यों? मालूम नहीं।
और  फ़ इलातुन [1122] पर ’तस्कीन’ का अमल हो सकता है
यह सब बात पिछले क़िस्त में मुसद्दस की बहस के दौरान लिख चुका हूँ ।एक बार फिर लिख दिया
इन सब बातों पर विचार करने पर combination & permutation से  रमल मुसम्मन मुज़ाहिफ़  की 8-वज़न बरामद हो सकती है 
[A] बहर-ए-रमल मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़इलुन
2122-------1122-------1122-------112
उदाहरण ; ग़ालिब का एक शे’र देखें

शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामां निकला
क़ैस तस्वीर के पर्दे में भी उरियां   निकला
इशारा हम  कर देते हैं --तक़्तीअ आप देख लें
  2 1  2    2   / 1 1 2 2 /   1 1    2 2      /    1 1 2
शौक़ हर रन्/ ग रक़ीबे  / स र-ए-सामां        / निकला    [सर्-ए-सामां   --में इज़ाफ़त-ए-कसरा के कारण -र- पर हरकत आ गई सो 1-के वज़न पर लिया गया है]
2   1    2  2   / 1 1  2   2  / 1  1  2   2   / 1 1 2
क़ैस तस वी / र के पर दे / में भी उर यां  / निकला [ -के--में-भी-  बह्र की मांग पर मात्रा गिराई  गई है]
[B] फ़इलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़इलुन
1122-----1122---------1122--  --112 [ फ़ाइलातुन [2122] की जगह  फ़इलुन [1122] लाया जा सकता है]
-------------------------------------------------
[C] बहर-ए-रमल मुसम्मन मख़्बून मक़्सूर
फ़ाइलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़इलान
2122------1122--------1122---  -1121
[D] फ़ाइलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़इलान
1122-----1122---------1122----1121 [ फ़ाइलातुन [2122] की जगह  फ़इलुन [1122] लाया जा सकता है]
नोट  यह चारो वज़न [A]--[B]--[C]--[D] आपस में मुतबादिल है यानी एक दूसरे के स्थान पर लाए जा सकते है 
==================================
[E] बहर-ए-रमल मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़ मुसक्कन
फ़ाइलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़अ लुन [ फ़अ लुन [22]--में -ऐन-साकिन]
2122------1122--------1122---------22
[F] फ़इलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़इलुन
1122-------1122-----1122---------22 [ फ़ाइलातुन [2122] की जगह  फ़इलुन [1122] लाया जा सकता है]
-----------------------------------
[G] बहर-ए-रमल मुसम्मन मख़्बून मक़्सूर मुसक्कन
फ़ाइलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़अ लान [फ़अ लान[221] में -ऐन साकिन है] 
2122------1122-------1122-------221
[H] फ़इलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़अ लान 
1122----1122--------1122-------221 [ फ़ाइलातुन [2122] की जगह  फ़इलुन [1122] लाया जा सकता है]।
नोट- यह चारो वज़न [E]---[F]----[G]---[H]  आपस में मुतबादिल है यानी एक दूसरे के स्थान पर लाए जा सकते है 
============================================
उदाहरण --
यूँ तो किसी शे’र के दोनो मिसरों को किसी भी एक वज़न में  बांधा जा सकता है मनाही नही है और उसी वज़न में पूरी की पूरी ग़ज़ल भी कही जा सकती है। पर  यह आप के फ़न-ए-शायरी और कमाल-ओ-हुनर पर निर्भर करेगा। मगर ज़्यादातर शायरों ने अपनी ग़ज़ल मे इन तमाम औज़ान [वज़नों] का ख़ल्त किया है और जायज भी है। हम कुछ उदाहरण  में ग़ालिब की ग़ज़लों के चन्द  अश’आर से लेते है जिससे बात साफ़ हो जाये। और मिसरा के अन्त में वज़न की निशान्दिही   A   B   C   D ----भी कर देंगे। ग़ालिब का एक शे’र है--आप ने भी सुना होगा

नुक़्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने
क्या बने बात जहाँ   बात बनाए   न बने

इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ’ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए  न बुझे    

इसकी तक़्तीअ भी देख लेते हैं--
  2  1    2  2   / 1  1   2      2     / 1  1  2 2 / 1 1 2 ---[A]
नुक़ त चीं है   / ग़म-ए-दिल उस /को सु ना ए /न ब ने
2    1  2   2 / 1  1 2  2        / 1 1 2 2     / 1 1 2 --[A]
क्या बने बा /  त जहाँ   बा      / त ब ना ए     /न ब ने

2    1    2   2    / 1  1  2 2 / 1 1  2     2   / 2  2 --[E]
इश् क़ पर जो  /र नहीं है   / ये वो आतिश /’ग़ालिब’
1    1  2 2    /1  1 2  2   / 1  1 2  2      / 1 1 2 ----[F]
कि लगाए     /न लगे औ  /र बुझाए         / न बु झे   

दोनो शे’र एक ही ग़ज़ल के है --पहले शे’र में कोई ख़ल्त नहीं है
चूँकि मतला के दोनो मिसरा में ’मक्सूर’ बाँध दिया गया है [ख़ास तौर से मिसरा सानी में ]अत: बह्र का नाम होगा ’बहर-ए-रमल मुसम्मन मख्बून मक्सूर’

मगर दूसरे शे’र [मक़्ता] में मिसरा ऊला के सदर मे 2122[सालिम]  और मिसरा सानी के इब्तिदा मे 1122 [मख़्ब्बून] लाया गया है जो जायज़ है
साथ ही  अरूज़ में [22] और जर्ब में 112 लाया गया है  जो जायज है
ग़ालिब के ही दो -तीन अश’आर और देखते हैं--

 इशरत-ए-क़त्ल गहे अहले तमन्ना न पूछ
ईद-ए-नज़्ज़ारा है शमशीर का उरियां होना

दिल हुआ कश्मकश -ए-चारा-ए-जहमत में तमाम
मिट गया घिसने से इस उक़्दे का वा हो जाना 

मुँद गई खोलते ही खोलते आँखें ’ग़ालिब’
यार लाए मेरी बाली पे उसे , पर किस वक़्त

तक़्तीअ कर के देखते है
  2  1   2   2  / 1 1  2  2   / 1 1  2    2   / 1 12 ---- A
इश र ते क़त्/ ल  ग हे अह / ल त मन ना /  न पूछ
1 1       2    2 /  1 1   2   2   / 1  1   2  2    / 2 2 -----F
ईद-ए-नज़ ज़ा / रा है शम शी / र का उरि यां /   होना


2     1  2    2    / 1 1  2  2   / 1  1  2    2    / 1 1 2 1 ----C
दिल हुआ कश/ म क शे-चा / रा-ए-जह मत /में तमाम
2     1  2   2    / 1  1 2    2     / 1  1   2  2 /  2 2 ---E
मिट गया घिस / ने से इस उक़ / दे का वा हो  /जाना

2     1 2  2 / 1 1  2   2  / 1 1  2 2  /  2  2 ---E
मुँद गई खो / ल ते ही खो /ल ते आँखें  / ’ग़ालिब’
2 1   2 2  /  1  1 2 2   / 1 1  2  2    / 2     2  1 ---G
यार लाए /  मेरी बाली   / पे उ से , पर / किस वक़् त

आप चाहें तो आप भी इसी वज़न में अश’आर कह सकते है
 
एक बात और
फ़इलातुन [1122] में तस्कीन-ए-औसत का अमल हो सकता है तब इसकी शकल " मफ़ऊलुन’ [222] हो जायेगी। यानी फ़इलातुन [1122] की जगह मफ़ऊलुन [222] भी लाया जा सकता है मगर शर्त यह कि बहर न बदल जाये। इस पर नीचे विस्तार से चर्चा कर दिया है
------------------------------
[9]  बहर-ए-रमल मुसम्मन मख़्बून   : ज़ाहिर है कि इस वज़न में हर रुक्न ’मख्बून’ का ही होगा -यानी
फ़इलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़इलातुन
1122-------1122-----1122---------1122
यही बात [तस्कीन-ए-औसत की ]यहां भी लागू होगी
उदाहरण-- डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से

मेरी आवाज़ पे क्या  बाँध लगायेगा ज़माना
मैं हूं ’आरिफ़’ कोई तुग़यानी पे आया हुआ दरिया

इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
1   1   2  2 / 1  1  2   2   / 1 1 2 2  / 1 1 2 2
मेरी आवा  / ज़ पे क्या  बाँ/ ध ल गाये /गा ज़माना          [ यहाँ मेरी को  ’मि रि ’ को 1 1 के वज़न पर लिया गया है ,कोई को कु इ [1 1] के वज़न पर लिया गया है और बाक़ी जगह बह्र की माँग पर मात्रायें गिराई गई है।
1  1   2    2   /   1  1 2   2    / 1  1  2 2 / 1 1  2  2
मैं हूं ’आरिफ़’/ कोई  तुग़ या / नी पे आया / हुआ दरिया
 एक बात और --
अगर आप ध्यान से देखें तो ’फ़इलातुन [1 1 2 2 ] में तीन मुतहर्रिक [फ़े --ऐन---लाम ] एक साथ आ गये हैं जिस पर ’तस्कीन-ए-औसत का अमल लग सकता है जिससे ’ फ़ इलातुन [1122] --- ’मफ़ ऊ लुन [2 2 2] हो सकता है
इस हिसाब से किसी एक मख़्बून  या सभी मख़्बून को ’मफ़ उ लुन ’[2 2 2] से बदला जा सकता है शर्त यह कि बह्र न बदल जाये
मतलब यह कि ऊपर दिखाये गये अगर सभी मख़्बून [1122] को मफ़ ऊ लुन [222] से बदल दे तो ?
बहर हो जायेगी

मफ़ ऊ लुन------मफ़ ऊ लुन-----मफ़ ऊ लुन-----मफ़ऊलुन
222-------------222-------------222-----------222
  यानी आहंग अब ’मुतक़ारिब’ का हो जायेगा } अत: हम "मख़्बून’ के सभी रुक्न को ’मफ़ऊलुन’[222] से नहीं बदल सकते । क्यों कि बहर बदल जायेगी
अगर हम [बहर-ए-रमल मुसम्मन मख़्बून]  के आखिरी रुक्न [जो अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर है ]  पर तस्कीन-ए-औसत का अमल लागाये तो? बहर हो जायेगी --
"[10]  रमल मुसम्मन मख़्बून मुसक्कन अल आखिर"
फ़इलातुन--फ़इलातुन----फ़ इलातुन---फ़ऊलुन
1122-------1122-----1122---------222
 इस का दूसरा नाम ’रमल मुसम्मन मख़्बून मुश’अश भी है क्योंकि ठीक यही वज़न ज़िहाफ़ ’तश’इश’ ले अमल से बरामद हो सकती है\ मगर पहला नाम और अमल ज़्यादा आसान है} हमे तो आम खाने से मतलब है पेड़ गिनने से क्या !
एक उदाहरण भी देख लेते हैं [ डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से ही]

गली कूचों से कोई जोड़ नहीं इन महलों का
मेरे हमदम मैं तेरा साथ नहीं दे सकता  हूँ

तक़्तीअ भी देख लेते हैं 
1  1   2  2  / 1  1  2  2  / 1  1  2 2   / 2 2   2
गली कूचों / से  कु ई जो / ड़ न हीं इन / मह लों का
1    1  2  2    / 1  1 2  2   / 1 1 2  2     /2   2   2
मि रे हम दम / मैं तिरा सा /  थ न हीं दे   /सक ता  हूँ
=======================

अब ज़रा ज़िहाफ़ ’शकल’ की भी चर्चा कर लेते हैं --फ़ाइलातुन [2122] पे
पिछले क़िस्त 37 में -लिखा था
फ़ाइलातुन [2122] +शकल ज़िहाफ़ =  फ़इलातु [1121]  बरामद होगा जो ’फ़ाइलातुन ’का मुज़ाहिफ़ है -मश्कूल है --ध्यान रहे -तु- मुतहार्रिक है और किसी मिसरा या शेर के अन्त  में -कोई ’मुतहर्रिक’ नहीं  आता यानी आखिरी हर्फ़ ’मुतहर्रिक’ पर नहीं गिरता ।अत: हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि शे’र में अरूज़ और जर्ब के  मुक़ाम पर फ़ इलातु[1121] नहीं लाया जा सकता।मगर सदर और इब्तिदा या हश्व के मुक़ाम पर तो मनाही नहीं है । ख़ैर---
"शक्ल"--एक मुरक्क्ब ज़िहाफ़ है जो दो ज़िहाफ़ [ ख़ब्न + कफ़] से मिल कर बना है और इन दोनो ज़िहाफ़ का अमल ’फ़ाइलातुन [2122] पर "एक साथ’ होता है तो ’फ़इलातु [ 1121] बरामद होता है जिसे ’मश्कूल’ कहते है । यद्दपि इस की चर्चा पिछले किसी क़िस्त में कर चुके हैं।
[11] बहर-ए-रमल मुसम्मन मश्कूल
फ़ इलातु-------फ़ाइलातुन----फ़ इलातु---फ़ाइलातुन
1121---------2122----//------1121------2122
उदाहरण - कमाल सिद्दीक़ी साहब के हवाले से

ये ज़मीन भी पुरानी    ,ये ख़याल भी पुराना
है कुछ और फ़न ग़ज़ल का,कि ग़ज़ल मिसल नही है  
तक़्तीअ भी देख लेते हैं---
1  1 2  1   /   2 1 2 2  //     1  1 2 1/  2 1 2 2
ये ज़मीन    /  भी पुरानी //   ,ये ख़याल / भी पुराना

1  1  2  1  /  2   1 2   2  //     1  1  2   1    / 2 1 2  2
है कु छौ र / फ़न ग़ज़ल का // ,कि ग़ज़ल मि/ सल नही है   [यहाँ --कुछ और- वस्ल हो कर ’कु छौर ’ का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा ह इ इस लिए इसे   [121] की वज़न पर लिया गया
इस बहर के बारे में कुछ बातें और करनी है
[1] पहली बात -यह बहर एक ’शिकस्ता’ बह्र भी है । शिकस्ता बहर के बारे में पहले भी चर्चा कर चुका हूं । एक बार फिर कर देता हूँ । ऐसी बहर जिसका मिसरा ठीक दो बराबर भागों में बँट जाये [तक़्सीम हो जाये] और आप की  एक बात  मिसरा के पूर्वार्द्ध में .और दूसरी बात मिसरा की उत्तरार्द्ध में मुकम्मल हो जाये --- को बह्र-ए-शिकस्ता कहते है ।और उसे --//- के निशान से दिखाते हैं । अगर ऐसा नही है तो फिर ’शिकस्ता -ना रवा’ कहते है । ख़ैर--
[2] दूसरी बात-इस बहर में भी--’फ़इलातु[ [1121] पर तस्कीन का अमल हो सकता है । क्यों ? कारण कि यहाँ भी [ फ़े ऐन--लाम --तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गये ] और वज़न ’मफ़ ऊलु [ 2 2 1] बरामद किया जा सकता है और इस से एक बहर और  बरामद की जा सकती है और ’फ़ इलातु- [1121] की जगह मफ़ऊलु [221] लाया जा सकता है
 [क]   221-----2122--// 221---2122
यह बात और है कि उर्दू शायरी में इस बहर में बहुत कम शे’र मिलते है --लगभग न के बराबर। आप चाहें तो एक प्रयास कर सकते है }क्षेत्र अछूता है।
[3] तीसरी बात-अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर सालिम की जगह ’ फ़ाइलिय्यान. [ 21221] जिसे मुसब्बीग़ भी कहते हैं , लाया जा सकता है 

रमल मुसम्मन की एक बहर और देख लेते है
[12]रमल मुसम्मन मक्फ़ूफ़, मख्बून मुसक्कन, मकफ़ूफ़, मख़्बून मुसक्कन 
फ़ा इलातु ,---- मफ़ऊलुन  // फ़ाइलातु -----, मफ़ऊलुन
2121----------222-----// 2121---------222
ज़ाहिर है कि फ़ाइलातुन [2122] पर ’ कफ़’ का ज़िहाफ़ लगा है और इसका मकफ़ूफ़ --फ़ाइलातु [2121]--- होता है। और जब  मख़्बून   फ़इलातुन [1122] पर तस्कीन का अमल करते है तो -मफ़ ऊ लुन - [222] बरामद होती है । यह बात तो आप जानते ही हैं --कोई नई बात नही है --वही ऊपर लिखा भी है ।
एक उदाहरण डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से देख लेते है

ज़िन्दगी के सहरा में हर तरफ़ है बेमहरी
जिस तरफ़ नज़र डालूँ दश्त-ए-करबला देखूँ

अब तक़्तीअ भी देख लेते हैं
2121        /   222    //   2  1  2  1  / 2 2  2
ज़िन्दगी के / सहरा में // हर तरफ़ है/ बे मह री
2      1  2   1  / 2  2  2 //    2 1    2    1   / 2 2 2
जिस तरफ़ न / ज़र डालूँ // दश्त-ए-करब/ ला देखूँ

यह बह्र भी शिकस्ता है।

एक रुक्न और देख लेते  हैं

[13] रमल मुसम्मन मख़्बून सालिम मख़्बून सालिम

फ़ इलातुन ------फ़ाइलातुन // फ़ इलातुन-----फ़ाइलातुन 
1122------------2122----// 1122---------2122
उदाहरण [डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के ही हवाले से]

मेरी कश्ती  फँस गई है , जो मसाइब के भंवर  में 
मेरे मौला तू बचा ले  , तुझे सदक़ा  मुस्तफ़ा का 

तक़्तीअ भी देख लेते है
1  1   2   2     / 2     1 2 2  //   1  1 2   2    / 2 1 2   2
मेरी कश् ती   / फँस गई है ,//  जो म सा इब  / के भं वर  में
1  1   2   2 /  2  1 2   2 //  1 1  2   2     / 2    1 2 2
मेरे मौला   /  तू बचा ले  // , तुझे सदक़ा   / मुस तफ़ा का

यह बह्र भी ’शिकस्ता बह्र ’ है
=============
हम यह दावा तो नही कर सकते कि रमल मुसम्मन की तमाम बहरे  हमने cover कर ली
और भी बहुत से वज़न और बहर रमल की बरामद हो सकती है कभी फ़र्द ज़िहाफ़ के अमल से कभी मुतक्कब ज़िहाफ़ की अमल से कभी तस्कीन के अमल से} वो सब बहरे academic discussion and knowledge के लिए तो ठीक हैं मगर उर्दू  शायरी में न ही उतनी मक़्बूल है और न ही राइज़ है }आप चाहें तो ऐसी तमाम बह्रें किसी मुसतनद अरूज़ की किताब में देख सकते है } ग़ालिब ने भी उन कम राइज बह्रों का इस्तेमाल नहीं किया। ख़ैर---

चलते चलते एक बहर  पर और चर्चा करना चाहूँगा जो सैद्धान्तिक रूप से संभव तो है मगर कहीं कोई ग़जल या शे’र मेरी निगाह से अभी तक गुज़रा नहीं } डा0 आरिफ़ हसन खान साहब ने अपनी मुस्तनद किताब ’मेराज-उल-अरूज़’ में इस का ज़िक्र किया है। और वो बहर है----
[14] रमल मुसम्मन मख़्बून मुज़ाइफ़ [16-रुक्नी बहर]--बहर आसान है मगर है बहुत लम्बी --सच्चा शे’र कहना मुश्किल। ख़ैर--
फ़इलातुन----फ़इलातुन---फ़इलातुन---फ़इलातुन--//-फ़इलातुन---फ़इलातुन---फ़इलातुन---फ़इलातुन
1122--------1122--------1122-------1122---//--1122-------1122-------1122------1122
उदाहरण भी डा0 साहब ने खुद साख़्ता शे’र से दिया है ,उन्ही के हवाले से---

मेरे हमदम तेरी जुल्फ़ों की घनी छांव मयस्सर न थी जब तक तू मेरे जीने का मक़सद न था कुछ भी
तुझे देखा तो मेरे दिल ने कहा मुझ से  यही है तेरे जीने का सहारा तेरा मक़सद   तेरी मन्ज़िल 

अब तक़्तीअ भी देख लेते हैं
1  1  2   2   / 1 1    2   2   /  1 1  2    2 /  1  1 2 2  /  1  1   2  2     /  1  1 2  2 / 1 1  2    2     / 1 1  2   2
मिरे हमदम / तिरी जुल् फ़ो / की घनी छां / व मयस्सर//  न थी जब तक / तू मिरे जी / ने का मक़सद / न था कुछ भी

1  1   2  2 /    1   1  2  2  / 1 1  2   2   / 1  1  2  2/ 1 1 2  2/   1  1 2  2  / 1 1  2    2      /  1  1   2   2
तुझे देखा  /   तो मिरे दिल / ने कहा मुझ / से  यही है // तिरे जीने /  का सहारा /  तिरा मक़सद    /  तिरी मन् ज़िल

यहाँ बहर की माँग पर वही मात्रायें गिराई गई है जो शायरी में रवा है
इस बहर पर डा0 साहब ने एक हिदायत भी की है --उन्ही के शब्दों में--"ग़लती से नावाक़िफ़ लोग इसे बहर-ए-तवील कहते है"
जब बह्र-ए-तवील की चर्चा करेंगे तब की तब देखेंगे।
एक बात और ---डा0 साहब ने यह तो नहीं लिखा है कि यह बहर ’शिकस्ता बहर’ भी है । अमूमन ऐसी बहर ’शिकस्ता ’ होतीं हैं --मैं समझता हूँ कि यह बहर [16-रुक्नी] भी बह्र-ए-शिकस्ता है

ख़ुदा ख़ुदा कर के बह्र-ए-रमल का बयान मुकम्मल हुआ
अब अगली किस्त में --"बह्र-ए-रजज़" कुछ चर्चा करेंगे

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का  और कुछ दीगर दोस्तों का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर में इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-