शनिवार, 11 नवंबर 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 34 [बह्र-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें -4]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 34 [बह्र-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें -4]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

----क़िस्त 30-से लेकर क़िस्त 33 तक] बह्र-ए-हज़ज की बहुत सी मुज़ाहिफ़ बह्र पर चर्चा कर चुके हैं।आज इस क़िस्त में  हम कुछ और मुज़ाहिफ़ बह्र पर चर्चा करेंगे 
अब् हमें नहीं लगता है कि मुरब्ब: ---मुसद्दस---मुसम्मन--मुज़ाइफ़  के बारे मैं कुछ और बताने की कोई ज़रूरत है और न ही  महज़ूफ़---मकफ़ूफ़---मक़्सूर---अखरब---क्या है ,के बारे में ।[ये सब ज़िहाफ़ात है जो सालिम रुक्न के अवयव [ज़ुज़] पे लगते हैं जिस से इनकी  तबादिल शकल बरामद होती है --ये सब उसके नाम है ] इन सब की चर्चा मैने पिछले अक़्सात [ ब0ब0 क़िस्त] में कर चुका हूँ
यहाँ जो हलन्त से हर्फ़ दिखाया गया है -उसे आप साकिन समझिए
जो-लु- दिखाया गया है उसे आप मुतहर्रिक [यानी लाम पर हरकत] समझिए
 निम्नलिखित बहरों के उदाहरण डा0 आरिफ़ हसन खान साहेब की किताब "मेराज-उल-अरूज़’ से साभार लिया गया है ।आप् भी चाहें तो ख़ुद्साख़्ता शे’र कह सकते हैं इन वज़न पर। इस हक़ीर ने भी कोशिश  की ,मगर फ़िलबदीह अश’आर न कह सका इन औज़ान पर । आइन्दा कोशिश करूँगा इन्शा अल्लाह , कामयाबी हासिल हो ।आप से गुज़ारिश है कि यहाँ पर जो शे’र उदाहरण के लिए दिए गये हैं वो डा0 साहब के ख़ुदसाख़्ता अश’आर है जो सिर्फ़ समझने और समझाने और बताने की अल गरज  कहे गये हैं । इस में आप शे’रियत न देखियेगा --तेल देखियेगा और तेल की धार देखियेगा। उनकी शे’रियत या फ़न्न-ए-शायरी देखने के लिये उनकी मुज़्मुआ गज़लियात किताब -" कुछ नज़्में कुछ ग़ज़लें" -देखियेगा।

[1]A  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु-----फ़ऊलुन्
221--------1221-------122 / 1221
उदाहरण--
जब याद तेरी दिल को सताए
अए माहजबीं  नींद न आये
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जब याद/   तिरी दिल कू / सताए
अए माह/  जबीं  नींद     / न आये

[1]B  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ मक़्सूर
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु-----फ़ऊलान्
221--------1221-------1221
उदाहरण
जाने से तेरे दिल हुआ वीरान
जैसे हो कोई उजड़ा हुआ शहर

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जाने से /    तिरे दिल हु / आ वीरान
जैसे हू / कुई उजड़ा    / हुआ शहर   [ शह्  र =21]

शायरी में ’महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[2]A  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ महज़ूफ़ 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन्----फ़ऊलुन् 
221---------1212-------122
उदाहरण--
यह इश्क़ अजीब एक बला है
बख़्शा न बड़े बडों को इस ने

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

ये इश्क़ /  अजीब इक / बला है
बख़्शा न / बड़े बडों    /कू इस ने

[2]B बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ मक़्सूर 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन्----फ़ऊलान्
221---------1212-------1221
उदाहरण
था नाज़ बहुत कि दिल न देंगे
देखा जो उसे तो उड़ गए होश

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

था नाज़ /   बहुत कि दिल / न देंगे     [ न देंगे  =122= महज़ूफ़ है]
देखा जू/  उसे तो उड़  /   गए होश   [ गए होश = 1221= मक़सूर]
’महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[3]A   बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दसअख़रब मक़्बूज़ मुख़्निक़ महज़ूफ़
मफ़ ऊलन्------फ़ाइलुन्----फ़ऊलुन्
222----------212----------122
अगर आप ऊपर के रुक्न [2]A-पर ’तख़्नीक’ का अमल करें [यानी " मफ़ऊलु---मफ़ाइलुन "-3 मुतहर्रिक [ लाम---मीम --फ़े] एक साथ आ गए ] तो आप को बहर [3]A बरामद हो जायेगा और इसका नाम भी वही होगा बस ’मुख़्नीक़’ और जोड़ देंगे
उदाहरण--
आँखे  भींगी तड़प उठा दिल
जब जब तेरा ख़याल   आया
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

आँखे  भीं / गी तड़प /उठा दिल
जब जब ते/ रा ख़या  /ल   आया

[3]B   बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ मुख़्निक़ मक़्सूर
मफ़ ऊलुन्------फ़ाइलुन्----फ़ऊलान्
222----------212----------1221
उदाहरण
कर लें जितनी जफ़ायें चाहे
चाहत से हम न आयेंगे  बाज़

  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

कर लें जित/ नी जफ़ा/ ये चाहे           [ य चाहे = 122= महज़ूफ़]
चाहत से    / हम न आ/ यगे  बाज़      [ यगे बाज़= 1221= मक़सूर]
महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[4]A  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ मजबूब 
मफ़ऊलु-------मफ़ाईलु----फ़ अल्
221-----------1221-------12
उदाहरण
प्यारी है ज़बां  सब से मेरी
चर्चा है ज़माने में  यही
  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

प्यारी है/  ज़बां  सब से/  मेरी
चर्चा है / ज़माने में      / यही


[4]B  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ अहतम
मफ़ऊलु-------मफ़ाईलु----फ़ऊल्
221-----------1221------- 121
उदाहरण
बेमिस्ल हमारा है  ये देश
जन्नत से भी प्यारा है ये देश

  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

बेमिस्ल   /हमारा है   / ये देश
जन्नत से / भी प्यारा है /ये देश
[नोट - इस बहर [4] में ’तख़्नीक़’ के अमल से और भी कई वज़न बरामद किए जा सकते है जो आपस में मुतबादिल होंगे जो जायज़ है।

[5] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब
मफ़ऊलु----मफ़ाईलुन्
221--------1222
उदाहरण
हैं लाख हसीं जग में
तुम सा न कोई लेकिन
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

हैं लाख     /  हसीं जग में
तुम सा न  / कुई लेकिन

[6]A   बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब महज़ूफ़
मफ़ऊलु-----फ़ऊलुन्
221-----------122-
उदाहरण
खुशरंग कोई गुल
तुम जैसा कहाँ  है
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

खुशरंग / कुई गुल
तुम जैसा/  कहाँ  है
[6]B   बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब मक़्सूर
मफ़ऊलु------फ़ऊलान्
221-----------1221
उदाहरण
सब ताब पड़े माँद
देखे जो तुझे  चाँद

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है
सब ताब /पड़े माँद
देखे जो  /तुझे  चाँद

[7]A बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्बूज़ मजबूब 
मफ़ा इलुन्------फ़ अल्-
1212----------12-
उदाहरण
तुम्हारी याद ने
खिलाये गुल नए
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

तुम्हारी या   / द ने
खिलाये गुल / न ए


[7]B बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्बूज़ अहतम
मफ़ा इलुन्------फ़ऊल्
1212---------- 121
उदाहरण
जो मुस्करायें आप
तो जल उठे चिराग़
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जो मुस्करा  / ये आप
तो जल उठे / चिराग़

रुबाई की बहर : रुबाई की बह्र हज़ज से ही  पैदा होती हैं ,और 24- वज़न बरामद होते हैं ।चूँकि रुबाई उर्दू काव्य विधा की एक अलग स्वतन्त्र  इकाई है अत: इसकी चर्चा यहाँ करना मुनासिब नहीं .कभी अलग से स्वतन्त्र रूप से इस पर बातचीत करेंगे
आप की जानकारी के लिए थोड़ी सी चर्चा यहां कर देते है
रुबाई  की दो मूलभूत बहर है [जो हज़ज से ही निकलती है ]

[1] मफ़ऊलु-----मफ़ाईलु-----मफ़ाईलु-----फ़ अल् /फ़ऊल्
    221----------1221--------1221-------12-/ 121

[2] मफ़ऊलु-----मफ़ा इलुन्------मफ़ाईलु--- फ़ अल्/ फ़ऊल्
     2 2 1----------12 12---------1221------12-/121

इन्हीं दो बुनियादी बहरों पर् -तख़्नीक़- के अमल से 24-वज़न बरामद होते है और ये -24- वज़न आपस में मुतबादिल होते हैं [ यानी आपस में बदले जा सकते हैं ]
यानी रुबाई के चारो लाईनों में अलग अलग वज़न [ but out of these 24-vazan] लाए जा सकते हैं
बात यहीं छोड़े जाता हूँ -जब रुबाई के बह्र की चर्चा करेंगे तो बात यहीं से उठायेंगे
-----------------------------
ख़ुदा ख़ुदा कर , बहर-ए-ह्ज़ज का बयान पूरा हुआ। मैं यह दावा तो नहीं करता कि मैने हज़ज के सभी वज़न cover कर लिया है .पर हाँ ,बहुत हद तक   cover कर लिया है। आप चाहें तो हज़ज की और भी कई मुज़ाहिफ़ बहर बरामद कर सकते है

अगले किस्त में हम बहर-ए-हज़ज की उन तमाम बहूर /औज़ान  को एक साथ एक जगह सम्पादित [मुरत्तब] करेंगे जिनकी चर्चा हम गुजिस्ता अक़सात में कर चुके हैं जिससे  पाठको को एक जगह पढ़ने की सुविधा मिल सके।
अस्तु

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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or
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-आनन्द.पाठक-



शनिवार, 4 नवंबर 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 33 [बह्र-ए-हज़ज कि मुज़ाहिफ़ बहूर-3]

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 33 [ बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें-3]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है

[क्षमाप्रार्थी हूँ विलम्ब से उपस्थित होने पर----

बिना पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है
हो न हो मुजरिम दिखाई  देता  है

अत: विलम्ब के लिए आज सफ़ाई  पेश नहीं करूँगा। बस आप यूँ समझ लें ---कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी--वरना इतना ’विलम्ब’ नहीं होता। सच तो यह है कि बहर-ए-हज़ज के इतने मुज़ाहिफ़ बहर हैं कि उनके तज़्किरा [चर्चा ]करते करते मैं खुद ही बिखर गया --कि खुद को समेटूँ तो कहाँ से समेटूँ
ख़ैर--फिर एक कोशिश कर के आप के सामने हाज़िर हूँ --आप की दुआओं  का तलबगार हूँ


पिछले अक़्सात [क़िस्तों ] में  हम हज़ज की सालिम बह्र [मुरब: ,मुसद्दस.सालिम] की चर्चा कर चुके है  [क़िस्त30]
और इसकी मुज़ाहिफ़ बहर महज़ूफ़ और मक़्सूर की भी चर्चा कर चुके हैं      [क़िस्त 31[
साथ ही इसकी मुज़ाहिफ़ बहर मक्बूज़ ,मक़्फ़ूफ़,मक़्फ़ूफ़+महज़ूफ़+मक़्सूर आदि की भी चर्चा कर चुका हूँ   [क़िस्त  32]

ख़र्ब’ और ’कफ़’ ज़िहाफ़ एक साथ लेते है देखते हैं क्या होता है

आज हम और ज़िहाफ़ की चर्चा करेंगे जो हज़ज [रुक्न मुफ़ाईलुन -1222 ] पर लगता है
आप घबराईए नहीं । ये सब ज़िहाफ़ academic discussion के लिए हैं और आप की जानकारी के लिए कर रहे हैं अगर आप सब मिला कर देखेंगे तो ऐसे बहर की संख्या सैकड़ों में बैठती है लेकिन कोई भी शायर इन तमाम बहूर में शायरी नहीं करता । ’मीर’ ने लगभग 30 बह्र , ग़ालिब ने- लगभग 20 -और इक़बाल ने  लगभग 51 बह्र प्रयोग किया है।
आप भी अपनी मनपसन्द बहर को चुन सकते हैं मगर तमाम बहर को पढ़ने समझने के बाद ।

एक बात और--ये बह्र और वज़न तो शायरी का मात्र एक हिस्सा [अवयव] है फ़न-ए-शायरी मेअसल बात तो भाव और कला पक्ष की है

ज़िहाफ़ ख़र्ब- एक मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है [मिश्रित ज़िहाफ़] है जो दो ज़िहाफ़ से मिल कर बना है --कफ़+ ख़रम  । मुज़ाहिफ़ को आप -"मक्फ़ूफ़ अख़रम" भी कह सकते हैं---’अख़रब’ भी कह सकते है ।
बज़ाहिर  ’ख़र्ब’ ज़िहाफ़ से  रुक्न का अखरब शकल [221 मफ़ ऊलु]   हासिल होगा [क़िस्त-31] यानी -लु- [लाम मय हरकत यानी ’लाम’ मुतहर्रिक है]
’कफ़’ ज़िहाफ़--- से रुक्न का ’मक्फ़ूफ़’ शकल  [ मफ़ाईलु  1221 ] हासिल होगा यानी यहाँ भी -लु - मय हरकत है यानी ’लाम’ मुतहर्रिक है
यानी ये दोनो ज़िहाफ़ अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर नहीं लाए जा सकते कारण कि दोनो में -लाम- मय हरकत है और कोई शे’र का हर्फ़ उल आखिर ’हरकत’ पर नहीं गिरता

और वैसे भी ज़िहाफ़ ;खर्ब’ और ख़रम  तो सदर/इब्तिदा के लिए मख़्सूस है

तो आख़िरी मुक़ाम [यानी अरूज़ और जर्ब पर अब क्या लाएं?  --कुछ नहीं बस हज़ज का सालिम रुक्न 1222 [मफ़ाईलुन] ही ला देते हैं -इसकी तो कोई मुमानियत [मनाही]  नहीं है और शे’र का  हर्फ़ उल आखिर लुन का नून साकिन है

अब बह्र का नाम होगा
[1] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर [आप चाहें तो इसे ’मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर भी कह सकते है-कारण वहीं -जो मैने ऊपर लिखा है।
मगर
 बह्र के नाम करण में अन्य प्रकार से [allied way] से समझने की नौबत ही क्यों सीधे सीधे [explicit way] नाम से और ज़िहाफ़ के अमल से पहचाना जाये तो ज़्यादा आसान होगा
तो मैं इस बह्र को -बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर - नाम से पहचानना चाहूंगा।यानी जैसे जैसे ज़िहाफ़ का क्रम है वैसे वैसे ही ।
 आप की क्या राय है?
अच्छा ! तो फिर मुसम्मन या मुसद्दस क्यों  जोड़ रहें है? जब ;रुक्न’ की संख्या तो साफ़ साफ़ बता रही है कि रुक्न 3 है या 4 है? ठीक .बिल्कुल ठीक। मुरब्ब: मुसद्दस मुसम्मन जर्ब-उल-मिसाल की तरह ज़ुबान पर इतने चढ़ गये है कि छोड़ने का मन नहीं करता ।Double check का काम करेगा।
ख़ैर----

[क] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर 
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु---मफ़ाईलु------मफ़ाईलुन
221--------1221-------1221-------1222
उदाहरण
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से ही लेते है

दुनिया में कोई  दूसरा ऐसा नहीं ऎ हमदम
जैसा ये हसीं मेरा  वतन मेरा ये भारत है 
तक़्तीअ आसान है चाहे तो आप कर सक्ते है--इशारा मै कर देता हूं~

 दुन या   म   /कु ई  दूस /र ऐसा न /हीं ऎ हम दम   ---हर्फ़ गिरा कर दिखा दिया जो शायरी में जायज है

जै सा य / हसीं  मेर / वतन मेरा/ य भा रत है  ----  तदैव--
नोट-यह शे’र एक साख़्ता शे’र [समझाने की गरज से ]बनाया हुआ ]  है जो सिर्फ़  समझाने की गरज से लिखा गया है ---इसे आप कोई मयार का शे’र न समझ लें। चाहें तो आप भी ऐसे शे’र गढ़ सकते है ,कह सकते हैं।
ख़ैर-- ऊपर की वज़न को एक बार ज़रा ध्यान से देखें  मफ़ ऊलु-------मफ़ाईलु------बड़ी दिलचस्प बात निकलेगी। क्या है इसमे?? कुछ नहीं है--बस 2-रुक्न है और क्या । मगर मफ़ऊलु का ’लाम’
 मुतहर्रिक है--सामने म फ़ा.... का मीम और फ़े--मुतहर्रिक है यानी---[दो रुक्न में 3-मुतहर्रिक एक साथ आ गये तो- ’तख़्नीक़’’ का अमल लग जायेगा -अगर आप लगाना चाहें तो]।  तस्कीन-ए-औसत और अमल-ए-तख़्नीक़ के बारे में पहले ही बता चुका हूँ==चाहे तो एक बार आप देख लें -यानी बीच वाला ’मुतहर्रिक --मीम--[जो अभी मुतहर्रिक है] साकिन हो जायेगा। यानी लु म् [2] का हो जायेगा और बचा हुआ हिस्सा --फ़ा ---का वज़न 2 रहेगा
यानी एक नई बहर/वज़न मिल जायेगी
यानी नीचे लिखी बहर भी बरामद होगी [आप एक बार तख़्नीक़ का अमल [रुक्न 2 और 3 पर] करें

[ख] 221---1222---221--1222-  इस बहर का नाम होगा’हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़्फ़ूफ़ मक़्फ़ूफ़ मुख़्नीक़ सालिम अल आख़िर" । मुख़्नीक़---लफ़्ज़ इस लिए जोड़ दिया गया है ताकि सनद रहे कि यह बहर ’तख़्नीक़’ के अमल से बरमद हुई है
एक बात और ---इस तर्तीब   221---1222   // 221---1222  को बह्र-ए-शिकस्ता भी कह्ते हैं  ,जहाँ शे’र के मध्यान्तर में ’अरूज़ी-वक़्फ़ा’ कहते हैं  । बह्र-ए-शिकस्ता के बारे में पहले भी चर्चा कर चुका हूं~
इस बह्र का एक उदाहरण लेते है--
अल्लामा इक़बाल का  एक शे’र है

फिर बाद-ए-बहार आई , इक़बाल ग़ज़ल्ख़्वाँ हो
गुंचा है अगर गुल हो ! गुल है तो गुलिस्तां  हो 

एक हिन्दी फ़िल्म [बारादरी -तलत महमूद का गाया हुआ] है -दो लाईन लिख रहा हूँ। यू ट्यूब पर उपलब्ध है  https://www.youtube.com/watch?v=eOnw5V1SPVs

तस्वीर बनाता हूँ     //तस्वीर नहीं बनती
इक ख़्वाब सा देखा है// ताबीर नही बनती

इसकी तक़्तीअ कर देता हूं~
 2    2  1 - 1 2 2 2   //  2    2   1--1 2 2 2             =  221---1222 // 221--1222
तस् वीर / बनाता हूँ     //तस् वीर / नहीं बन ती
2      2  1  - 1  2 2  2//  2  2 1 - 1 2 2   2 =221---1222 // 221--1222
इक ख़ाब  /स देखा  है// ,ता बीर  नही बन ती यहाँ -से- को -स- [1] की वज़न पर पढ़ लिया जो जायज़ है

अगर आप गाना सुने तो आप को पता चलेगा कि ये कितनी दिलकश बहर है
इसी बहर में इस हक़ीर का भी 1 शे’र बर्दास्त कर लें

देखा तो नहीं तुमको ,लेकिन हो ख़यालों में
सीरत की तेरी मैने ,तस्वीर बना  ली है

 आप तक़्तीअ कर के बता दीजियेगा कि कहीं यह शे’र मैने बहर[वज़न] से ख़ारिज़ तो नहीं कर दिया।
एक बात और--
ये जो बीच में [शे’र के मध्यान्तर मे ]  // का जो निशान देख रहे हैं उसे शायरी के भाषा में ’अरूज़ी वक्फ़ा" [शेर में ठहराव का मुकाम] कहते हैं और इस की ख़ासियत यह है कि जो बात आप कह रहें हो वो  //  के पहले ही ख़तम हो जानी चाहिए यानी दूसरे भाग  // के बाद जा कर बात खत्म न हो। ऐसी बहर को बहर-ए-शिकस्ता भी कहते हैं।  इस मक़ाम पर ऐसा कोई लफ़्ज़ न आ जाये कि तक़्तीअ करते वक़्त कुछ हर्फ़ तो  // के इस पार रहे और बाक़ी हर्फ़ // के उस पार चला जाये ।पहली स्थिति में बहर ’ना-शिकस्ता ’ कहलायेगी  ।।यूं शे’र ज़िन्दा तो रहेगा मगर  आहंग की ख़ूबसूरती ख़त्म हो जायेगी । इस विषय पर डा0 शम्स्सुर्हमान फ़ारूक़ी साहब ने अपनी किताब ---------में विस्तार से चर्चा की है ।ख़ैर --बात निकली तो बात कर ली--
ऊपर जो गाना लिखा है वो ’परफ़ेक्ट’  बहर-ए-शिकस्ता की मिसाल है

[ग] 221---1221----1221----122/1221  इस बहर का नाम होगा ---बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़्फ़ूफ़ महज़ूफ़/मक़्सूर

इस बहर की तुलना ऊपर की बहर [ख] से करें -आप को कोई विशेष अन्तर नहीं लगेगा । लगभग एक ही जैसा है -बस आख़िरी रुक्न में ज़रा सी तब्दीली है और वो तब्दीली है कि सालिम रुक्न ’ मफ़ाईलुन’ पर -’हज़्फ़’ और ’कस्र’ का ज़िहाफ़ लगा है और इसी लिए इसमें महज़ूफ़ और मक़्सूर जोड़ दिया है और इत्तिफ़ाक़न इन  दोनों का  आपस  में ख़ल्त जायज है
एक उदाहरण लेता हूँ [डा0 आरिफ़ हसन ख़ाँ साहब के हवाले से]

आशिक़ हूँ तेरा मैं तो ,मुझे चाहे न चाहे
मैने तुझे चाहा है ,निभाऊँगा हमेशा

मुझे उम्मीद है कि आप इस की तक़्तीअ कर सकते हैं ।चलिए एक कोशिश मैं भी करता हूँ आप भी करें
221-------/ 1221---/1221----/122
आशिक़ हूँ / तेरा मैं तो/ ,मुझे चाहे /न चाहे
221---/1221----/1 2 2 1    /1 2 2
मैने तु/ झे चाहा है /,निभाऊँगा /ह मे शा

[ बह्र की माँग पर यहाँ  मात्राएँ गिराई गईं है जो जायज भी है और रवा भी। आप भी चाहे तो ऐसा ही कोई मिसरा कह सकते हैं-
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अब हम बहर-ए-हज़ज की कुछ मज़ीद बहर पर बात करेंगे
[1] बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अखरब मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर
    मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन----मफ़ाईलुन----   [ ध्यान रहे -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]
    221---------1212--------1222--
उदाहरण---डा0 आरिफ़ हसन खां साहब के हवाले से

जब जब भी वफ़ा का ज़िक्र होता है
आती हैं ज़फ़ायें याद तेरी तब 
 इशारा मैं कर देता हूँ ,तक़्तीअ  आप कर के देख लें और निश्चिन्त हो जायें ----आप भी कुछ ऐसे ही मिसरा/शे’र कह सकते है --कोशिश तो करें।

जब जब भी /   वफ़ा का ज़िक / र होता है
आती हैं     /  ज़फ़ा ये या /    द तेरी तब

[2] बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन----मफ़ाइलुन
221------------1212-------1212            ----   [ ध्यान रहे यहां भी  -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]

उदाहरण---उदाहरण कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से

जो बात यक़ीं से कह रहे हो तुम
बेलाग अगर नहीं तो कुछ  नहीं 

तक़्तीअ कर के देखते हैं
2    2  1 / 1 2  1  2    / 1 2 1 2
जो बात / यक़ीं से कह /रहे हो तुम   [ यहाँ पे -से- और-हो- से [वज़न] गिराया गया है जो रवा है जायज है

2  2 1 /  12 1 2  / 1 2  1  2 
बेलाग / अगर नहीं /तो कुछ  नहीं    [ यहाँ भी  -तो- से वज़न गिराया गया है

[3] बहर-ए-हज़ज  मुसद्दस अखरब मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर
    मफ़ऊलु------मफ़ाईलु------मफ़ाईलुन---
   221---------1221-----------1222- ----  [ध्यान रहे यहां भी  -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]
उदाहरण ---डा0 आरिफ़ खाँ साहब के हवाले से

दुनिया ही बदल दी थी मेरी हमदम
जब तूने मुझे प्यार से देखा  था 

इशारा मैं कर देता हूँ तक़्तीअ आप कर लें--

दुनिया ही/   बदल दी थी / मिरी हमदम  [ यहाँ -ही- पर वज़न गिराया गया है जो रवा है और जायज़ है ]
जब तूने  /मुझे प्यार / से देखा  था         [ यहाँ -ने- और -से पर वज़न गिराया गया है जो रवा है और जायज़ है

अस्तु

अब अगले क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के कुछ और ऐसी ही मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-

आप अपनी राय से मुझे   akpathak3107@gmail.com पर अवगत करा सकते हैं।

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : मिलेगा जब भी वो हम से---

एक ग़ज़ल : मिलेगा जब भी वो हमसे---

मिलेगा जब भी वो हम से, बस अपनी ही सुनायेगा
मसाइल जो हमारे हैं  , हवा  में  वो   उड़ाएगा

अभी तो उड़ रहा है आस्माँ में ,उड़ने  दे उस को
कटेगी डॊर उस की तो ,कहाँ पर और जायेगा ?

सफ़र में हो गया तनहा ,तुम्हारे  साथ चल कर जो
वो यादों के चरागों को  जलायेगा  ,बुझायेगा

कहाँ तक खींच कर लाई ,तुझे यह ज़िन्दगी प्यारे
अगर तू लौटना चाहे , नहीं  तू  लौट पायेगा

इस आँगन का शजर है बस इसी उम्मीद में ज़िन्दा
परिन्दा जो गया है छोड़ , वापस लौट आयेगा

वो रिश्तों की लगाता बोलियाँ बाज़ार में जा कर
जिसे करनी तिजारत है वो रिश्ते क्या निभायेगा

अरे ! क्या सोचता रहता यहाँ पर बैठ कर ’आनन’
गये हैं लोग सब कुछ छोड़ ,तू  भी  छोड़ जायेगा 

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर---

एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर--

छुपाते ही रहे अकसर ,जुदाई के दो चश्म-ए-नम
जमाना पूछता गर ’क्या हुआ?’ तो क्या बताते हम

मज़ा ऐसे सफ़र का क्या,उठे बस मिल गई मंज़िल
न पाँवों में पड़े छाले  ,न आँखों  में  ही अश्क-ए-ग़म

न समझे हो न समझोगे ,  ख़ुदा की  यह इनायत है
बड़ी क़िस्मत से मिलता है ,मुहब्बत में कोई हमदम

हज़ारों सूरतें मुमकिन , हज़ारों  रंग भी मुमकिन
मगर जो अक्स दिल पर है किसी से भी नहीं है कम

ख़िजाँ का है अगर मौसम ,दिल-ए-नादाँ परेशां क्यूँ
सभी मौसम बदलता है  ,बदल जायेगा ये मौसम

नहीं देखा सुना होगा  ,जुनून-ए-इश्क़ क्या होता
कभी ’आनन’ से मिल लेना ,समझ जाओगे तुम जानम

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : बहुत हो चुकी बातें---


ग़ज़ल : बहुत अब हो चुकी बातें------

बहुत अब हो चुकी बातें तुम्हारी ,आस्माँ की
उतर आओ ज़मीं पर बात करनी है ज़हाँ की

मसाइल और भी है ,पर तुम्हें फ़ुरसत कहाँ है
कहाँ तक हम सुनाएँ  दास्ताँ  अश्क-ए-रवाँ की

मिलाते हाथ हो लेकिन नज़र होती कहीं पर
कि हर रिश्ते में रहते सोचते  सूद-ओ-जियाँ की

सभी है मुब्तिला हिर्स-ओ-हसद में, खुद गरज हैं
यहाँ पर कौन सुनता है  अमीर-ए-कारवां  की

वही शोले हैं नफ़रत के ,वही फ़ित्नागरी  है
किसे अब फ़िक़्र है अपने वतन हिन्दोस्तां की

हमें मालूम है पानी कहाँ पर मर रहा  है
बचाना है हमें बुनियाद  पहले इस मकाँ  की

तुम्हारे दौर का ’आनन’ कहो कैसा चलन है?
वही मारा गया जो  बात करता है ईमाँ  की

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
मसाइल =समस्यायें
अश्क-ए-रवाँ = बहते हुए आँसू
सूद-ओ-ज़ियाँ = हानि-लाभ/फ़ायदा-नुक़सान
मुब्तिला =लिप्त
हिर्स-ओ-हसद= लोभ लालच इर्ष्या द्वेष
पित्नागरी = दंगा फ़साद

रविवार, 24 सितंबर 2017

एक ग़ज़ल : ये गुलशन तो सभी का है---

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल :---ये गुलशन तो सभी का है----

ये गुलशन तो सभी का है ,तुम्हारा  है, हमारा है
लगा दे आग कोई  ये नही   हमको गवारा  है

तुम्हारा धरम है झूठा ,अधूरा है ये फिर मज़हब
ज़मीं को ख़ून से रँगने का गर मक़सद तुम्हारा है

यक़ीनन आँख का पानी तेरा अब मर चुका होगा
जलाना घर किसी का क्यूँ तेरा शौक़-ए-नज़ारा है?

सभी  तैयार बैठे हैं   डुबोने को मेरी कश्ती --
भँवर से बच निकलते हैं कि जब आता किनारा है

जो तुम खाते ’यहाँ’ की हो, मगर गाते ’वहाँ’ की हो
समझते हम भी हैं ’साहिब’!कहाँ किस का इशारा है

उठा कर फ़र्श से तुमको ,बिठाते हैं फ़लक पे हम
जो अपनी पे उतर आते ,जमीं पर भी उतारा है

ये मज़लूमों की बस्ती है ,यहाँ पर क़ैद हैं सपने
उठाते हाथ में परचम ,बदल जाता नज़ारा है

मुहब्बत की निशानी छोड़ कर जाना ,अगर जाना
कहाँ फिर लौट कर कोई कभी आता दुबारा है

यही तहज़ीब है मेरी ,यही है तरबियत ’आनन’
कि मेरी जान हाज़िर है किसी ने गर पुकारा है

-आनन्द पाठक-

शब्दार्थ
तरबियत  =पालन-पोषण

बुधवार, 9 अगस्त 2017

एक ग़ज़ल : वो जो चढ़ रहा था----

एक ग़ज़ल : वो जो चढ़ रहा था----

 वो जो चढ़ रहा था सुरूर था  ,जो उतर रहा है ख़ुमार है
वो नवेद थी तेरे आने की  , तेरे जाने की  ये पुकार  है

इधर आते आते रुके क़दम ,मेरा सर खुशी से है झुक गया
ये ज़रूर तेरा है आस्ताँ  ,ये ज़रूर   तेरा दयार   है

न ख़ता  हुई ,न सज़ा मिली , न मज़ा मिला कभी इश्क़ का
भला ये भी है कोई ज़िन्दगी ,न ही गुल यहाँ ,न ही ख़ार है

मेरी बेखुदी का ये हाल है ,दिल-ए-नातवाँ का पता नहीं
कि वो किस मकाँ का मक़ीन है , कि वो किस हसीं पे निसार है

ये जुनूँ नहीं  तो  है और क्या . तुझे आह ! इतनी समझ नहीं
ये लिबास है किसी और का ,ये लिबास तन का उधार है

ये ही आग ’आनन’-ए-बावफ़ा  ,तेरी आशिक़ी की ही देन है
तेरी सांस है ,तेरी आस है  ,  तेरी   ज़िन्दगी  की बहार है

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
नवेद = आने की शुभ सूचना
दिल-ए-नातवाँ =  दुखी दिल
मक़ीन              = निवासी/मकान मे रहने वाला