गुरुवार, 8 जुलाई 2021

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 79 [ आहंग एक - नाम दो [भाग -2]

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 79 [  आहंग एक - नाम दो   [भाग -2]

पिछली क़िस्त 78 में मैने इसी विषय पर बातचीत की थी कि कैसे एक बहर की आहंग तो एक है और नाम दो हैं
और वो बह्र थी 
1212--    -1212--     -1212---1212-           यानी 
मुफ़ाइलुन--मुफ़ाइलुन--फ़ाइलुन--मुफ़ाइलुन

और इस बह्र की मुज़ाइफ़ शकल [यानी 16-रुक्नी बह्र ] भी अज रू-ए-अरूज़ मुमकिन है ।
-----              ---- 
आज हम ऐसी ही दूसरी बह्र पर भी बातचीत करेंगे। और वो बह्र है 
22---22---22---22 
और इस बह्र की भी मुज़ाइफ़ शकल [ यानी 16-रुक्नी बह्र ]भी  मुमकिन है । देखिए कैसे?

[1] यह बह्र तो आप पहचानते होंगे 
212------212-------212--------212- 

फ़ाइलुन--फ़ाइलुन----फ़ाइलुन----फ़ाइलुन--
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम
अगर आप इस के सभी मुक़ाम पर ख़ब्न का ज़िहाफ़ लगा दें तो [ चूँकि ख़ब्न एक आम ज़िहाफ़ है तो 
शे’र के किसी मुक़ाम पर लगाया जा सकता है सो लगा दिया ] तो हासिल होगा-
112-------112------112---112   यानी 
फ़इलुन --फ़इलुन --फ़इलुन --फ़इलुन 
        यानी  सालिम बह्र की एक मुज़ाहिफ़ शकल 
बह्र-ए- मुतदारिक मख़्बून मुसम्मन 
तस्कीन-ए-औसत और तख़्नीक़ के अमल के बारे में क़िस्त--- में चर्चा कर चुका हूँ [ आप वहाँ देख सकते हैं। फिर भी संक्षेप में
यहाँ लिख दे रहा हूँ 
तस्कीन-ए-औसत = किसी ’एकल मुज़ाहिफ़ रुक्न" में 3-मुतहर्रिक हर्फ़ [ जैसा कि ऊपर वाली बह्र  में है ] में दो 1 , 1 एक साथ 
[ अगल बगल ,आमने सामने ,Adjacent ] आ जाए तो 1 1  मिल कर -2- हो जायेगा।
तस्कीन-ए-औसत  का अमल   मुज़ाहिफ़ रुक्न "पर ही होता है । सालिम रुक्न पर कभी नहीं होता। और शर्त यह भी कि
इनके अमल से बह्र बदलनी नही चाहिए यानी इसका अमल करते करते मूल बह्र की शकल ऐसी न हो जाए कि पहले से किसी 
मान्य और प्रचलित बह्र से मेल खा जाए । यह एक बन्दिश है ।
अगर अब इस बह्र पर ’तस्कीन-ए-औसत का अमल कर दिया जाए तो क्या हासिल होगा ? हासिल होगा
22--22---22---22---    [क]
 इस बह्र की भी मुसम्मन मुज़ाइफ़ शकल यानी 16-रुक्नी बह्र भी मुमकिन है ।और लोग उस बह्र में भी शायरी करते है ।
हालाँकि इस बह्र के और भी मुतबादिल औज़ान [ आपस में बदले जाने वाले वज़न ] बरामद होंगे या हो सकते हैं मगर यहाँ मैने मात्र एक शकल
ही लिया है ।विषय की सुगमता के लिए उन तमाम औज़ान का ज़िक्र यहाँ नहीं कर रहा हूँ। 
===   =====
अच्छा अब एक दूसरी बह्र देखते हैं।
[2 आप यह बह्र भी पहचानते होंगे 
21---121--121--122 

[ बह्र-ए-मुतक़ारिब असरम मक़्बूज़ मक़्बूज सालिम अल आख़िर]
यानी यह भी एक मुज़ाहिफ़ शकल है ्बह्र-ए-मुतक़ारिब का।
अब अगर इस बह्र पर  ’तख़्नीक़ ’ का अमल कर दिया जाए तो क्या हासिल होगा ?
तख़नीक़ का अमल बिल्कुल तस्कीन के अमल जैसा होता है ,बन्दिश भी वही होती है । फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि तस्कीन का अमल --जब एकल रुक्न में
3- मुतहर्रिक साथ आते है तब । तख़्नीक के अमल तब होता है जब दो Adjacent रुक्न में ऐसी स्थिति [ यानी आ जाए जैसा कि ऊपर के बह्र में आ गया है ।
] में दो 1 , 1 एक साथ [ अगल बगल ,आमने सामने ,Adjacent ] आ जाए तो 1 1  मिल कर -2- हो जायेगा।
इस अमल से 21--121--121--12 का हासिल होगा
22--22---22--22---[ख]
इस बहे की भी "मुसम्मन मुज़ाइफ़" यानी 16-रुक्नी बह्र मुमकिन है ।लोग उसमे शायरी भी करते है ।
हालाँकि इस बह्र के और भी मुतबादिल औज़ान [ आपस में बदले जाने वाले वज़न ] बरामद होंगे या हो सकते हैं मगर यहाँ मैने मात्र एक शकल
ही लिया है ।विषय की सुगमता के लिए उन तमाम औज़ान का ज़िक्र यहाँ नहीं कर रहा हूँ। 
अगर आप ध्यान से देखें तो [क] और [ख] दोनो की शकल एक आहंग एक -परन्तु नाम दो
एक [क]  मुतदारिक से हासिल हुआ
दूसरा [ ख]  मुतक़ारिब से हासिल हुआ
चलते चलते एक सवाल
अगर आप से कोई मात्र यह शकल दिखा कर पूछे कि 22---22----22---22  कौन सी बह्र है या इसका क्या नाम है ? तो आप क्या जवाब देंगे?
सादर

-आनन्द.पाठक-

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 78 [ आहंग एक -नाम दो ][ भाग-1]

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 78 [ आहंग एक -नाम दो ][ भाग-1]


 उर्दू शायरी में कभी कभी ऐसे मुक़ाम भी आ जाते हैं जब आहंग एक जैसे होते हैं मगर नाम 

अलग अलग होते हैं । यह स्थिति कभी सालिम बह्र पर ज़िहाफ़ लगाने से हो जाती है तो कभी

किसी सालिम बह्रे के मुज़ाहिफ़ शकल पर ’तस्कीन या तख़नीक़ के अमल से पैदा हो जाति है ।

आज हम ऐसी ही 1-2 बह्र पर चर्चा करेंगे। 

एक बह्र है 

1212---1212---1212---1212- यानी

 मफ़ाइलुन --मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन

देखते हैं कैसे ?

[क] आप यह बह्र तो पहचानते होंगे 

2212--------------2212------------2212-----------2212-

मुस तफ़ इलुन -- मुस तफ़ इलुन ---मुस तफ़ इलुन --मुस तफ़ इलुन   यानी

बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम

अब इस बह्र पर ’ख़ब्न का ज़िहाफ़ लगा कर देखते हैं क्या होता ?

आप जानते हैं कि तमाम ज़िहाफ़ात में से एक ज़िहाफ़ "ख़ब्न" भी होता है ।

इसके अमल के तरीक़े आप जानते होंगे। जो नहीं जानते हैं उनके लिए संक्षेप में यहाँ लिख दे रहा हूँ।

ज़िहाफ़ ख़ब्न = अगर कोई सालिम रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [ यहाँ मुस--] से शुरु हो रहा हो तो दूसरे हर्फ़ [ जो साकिन होगा] को गिराने का अमल ख़ब्न कहलाता है ।यानी आसान भाषा में --यदि कोई सालिम रुक्न -2- से शुरु हो रहा है तो ज़िहाफ़ ख़ब्न उसे -1-कर देगा।और जो मुज़ाहिफ़ रुक्न हासिल होगा उसे ’मख़्बून’ कहेंगे।

ख़ब्न का शब्दकोषीय अर्थ ही होता है कंधे पर पड़े चादर या अंगरखे को लपेट कर छोटा करना । अरूज़ के संदर्भ में सालिम रुक्न [ जो 2- से शुरु होता है ] को छोटा कर के -1-कर देना समझ लें।

यह एक आम ज़िहाफ़ है, जो शे’र के किसी मुक़ाम पर [यानी  पहले-दूसरे--तीसरे यहाँ तक कि चौथे मुक़ाम पर भी] लाया जा सकता है।अर्थात 

मुस तफ़ इलुन [2 2 1 2 ] + ख़ब्न = मख़्न्बून 1 2 1 2 = मफ़ाइलुन 

अब आप इस ज़िहाफ़ को [क] के सभी मुक़ाम पर लगा दें तो क्या होगा ? कुछ नहीं, नीचे वाला आहंग बरामद होगा


[का] 1 2 1 2 ---1 2 1 2  ----1 2 1 2 ----1 2 1 2 

मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन   और नाम होगा

बह्र-ए- रजज़ मख़्बून  मुसम्मन 

इस बह्र की मुसम्मन मुज़ाइफ़ [ दो-गुनी ]शकल भी होती है और शायरी भी होती है मगर बहुत कम । कहने का मतलब कि इस बह्र में शायरी की जा सकती है ।

एक ग़ज़ल ्के चन्द अश’आर इस बहर में उदाहरण के तौर पर लगा रहा हूँ । यह ग़ज़ल मेरे मित्र नीरज गोस्वामी [ जयपुर ] का है जो उनकी किताब

[डाली मोगरे की--संग्रह से साभार ]

ग़ज़ल 

तुझे किसी से प्यार हो तो हो रहे तो हो रहे 

चढ़ा हुआ ख़ुमार हो तो हो रहे तो हो रहे 


जहाँ पे फूल हों खिले वहाँ तलक जो ले चलो

वो राह, ख़ारज़ार हो तो हो रहे तो हो रहे 


उजास हौसलो को साथ में लिए चले चलॊ

घना जो अन्धकार हो तो हो रहे तो हो रहे 


मेरा मिजाज़ है कि मैं खुली हवा में साँस लूँ

किसी को नागवार हो तो हो रहे तो हो रहे 


 तक़्तीअ’ आप कर के देख लें ।

एक शे’र की तक़्तीअ’ आप की सुविधा के लिए कर दे रहा हूँ।

1 2  1 2   / 1 2  1 2 / 1 2 1 2 / 1 2 1 2

तुझे किसी /से प्यार हो /तो हो रहे /तो हो रहे   = 1212--1212--1212--1212

1 2 1 2   / 1 2 1 2 / 1 2 1 2 / 1 2 1 2 

चढ़ा हुआ /ख़ुमार हो /तो हो रहे /तो हो रहे  = 1 2 1 2 --1 2 1 2--1 2 1 2--1 2 1 2 


===   ========   =======

अब एक दूसरी बह्र देखते हैं 

[ख ] आप यह बह्र तो पहचानते होंगे 

1222------1222-----1222-------1222  यानी 

मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन  यानी

बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम

 आप जानते हैं कि तमाम ज़िहाफ़ात में से एक ज़िहाफ़ ’कब्ज़’ भी होता है।

इसके अमल के तरीक़े आप जानते होंगे। जो नहीं जानते हैं उनके लिए संक्षेप में यहाँ लिख दे रहा हूँ।

ज़िहाफ़ कब्ज़  = अगर कोई सालिम रुक्न वतद-ए-मज्मुआ [ यहाँ मफ़ा --] से शुरु होता है और उसके ठीक बाद ’सबब--ए-ख़फ़ीफ़ [यहाँ -ई- ] हो तो  ’पाँचवे ’ हर्फ़ [ जो साकिन होगा ] को गिराना-कब्ज़ का अमल कहलाता है ।और जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होगी उसे ’मक़्बूज़’ कहते हैं

आसान भाषा में आप इसे यूँ समझ लें 

--कि अगर कोई बह्र 1222 -से शुरु हो रहा है - तो तीसरे मक़ाम पर -2- को -1- कर देना कब्ज़ कहलाता है ।

अर्थात 

मफ़ाईलुन [1222 ] + कब्ज़ = मक़्बूज़ 1 2 1 2 [ मफ़ाइलुन ] 

यह एक आम ज़िहाफ़ है, जो शे’र के किसी मुक़ाम पर [यानी  पहले-दूसरे--तीसरे यहाँ तक कि चौथे मुक़ाम पर भी] लाया जा सकता है।

हम इसे सभी मुक़ाम पर लगा कर देखते हैं । तो हासिल होगा 

[खा]      1 2 1 2 -  --1 2 1 2 --  -1 2 1 2 -- 1 2 1 2 

मफ़ाइलुन---मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन  और नाम होगा 

बह्र-ए-हज़ज मक्बूज़ मुसम्मन 

इस बह्र में भी शायरी की जा सकती है । मगर लोग न जाने क्यों इस दिलकश बह्र में भी बहुत कम शायरी करते हैं

और इस बह्र की भी मुसम्मन मुज़ाइफ़ [ दो-गुनी ] शकल मुमकिन है । 

एक ग़ज़ल ्के चन्द अश’आर इस बहर में उदाहरण के तौर पर लगा रहा हूँ । यह ग़ज़ल मेरे मित्र नीरज गोस्वामी [ जयपुर ] का है जो उनकी किताब

[डाली मोगरे की--संग्रह से साभार ]

ग़ज़ल 

चमक है जुगनूऒं में कम, मगर उधार की नहीं

तू चाँद आबदार हो तो हो रहे तो हो रहे 


जहाँ उसूल दाँव पर लगे वहाँ उठा धनुष

न डर जो कारज़ार हो तो हो रहे तो हो रहे 


फ़क़ीर है मगर कभी गुलाम मत हमे समझ

भले तू ताजदार हो तो हो रहे तो हो रहे 


-नीरज गोस्वामी -

इन अश’आर की तक़्तीअ’ आप खुद कर के देख लें और निश्चिन्त हो लें ।

======

अब अपनी बात समेटते हुए

 [का] 1 2 1 2 ---1 2 1 2  ----1 2 1 2 ----1 2 1 2 

[खा]      1 2 1 2 -  --1 2 1 2 --  -1 2 1 2 -- 1 2 1 2 


दोनॊ आहंग एक जैसा --पर नाम अलग अलग 

पहली बह्र ---रजज़ -+ ख़्बन  से बरामद हुई

दूसरी बह्र --हज़ज   + कब्ज़   से बरामद हुई

मगर आहंग -एक -है नाम अलग अलग है।


अच्छा अब एक बात और 

1212--1212---1212---1212-- [ रजज़ बह्र का मख़्बून ----}

1212--1212---1212--1212  -  [  हज़ज का मक़्बूज़-----]

 और दोनों बह्रें  अरूज़ के क़ायदे के मुताबिक़ ही बरामद की थी 

मगर अरूज़ की किताबों में ’हज़ज के मक़्बूज़ मुज़ाहिफ़ वाले बह्र का चर्चा तो है । मगर 

रजज़ के इस मख़्बून शकल [1212--1212--1212--1212-] की हू ब हू की कोई  चर्चा नहीं मिलता।

जब कि  रजज़ के दीगर मख़्बून शकल की चर्चा  है।

पता नहीं क्यों ?

अपने अपने दलाइल [ दलीलें ] हो सकते हैं 

शायद एक कारण यह हो कि दो बह्र का एक नाम या एक जैसे नाम से ’कन्फ़्यूजन ’ न पैदा हो इसलिए इस बह्र की चर्चा एक ही जगह [ हज़ज में ] की गई हो और यही मान्यता प्राप्त हो।हज़ज बह्र में ही इस बह्र की ही तर्ज़ीह दी गई है ।

आप लोगों की क्या राय है। बताइएगा ज़रूर।

सादर

-आनन्द.पाठक -


उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 77 [ बड़ी बह्र ]

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 77 [ बड़ी बह्र ]

[नोट : इस लेख के साथ क़िस्त 62 भी देखें ]

पिछली क़िस्त 62 में "छोटी बह्र " पर एक चर्चा की थी।

आज हम ’बड़ी बह्र या लम्बी बह्र ’ पर बात करेंगे कि क्या कोई बड़ी या लम्बी बह्र पर होती है ? क्या अरूज़ में ऐसी कोई मख़्सूस ] ख़ास निर्धारित की गई है ।या छोटी बह्र की तरह यह भी एक Perception मात्र है ?
 अभी तक किसी शायर को यह लिखते हुए नहीं देखा -
"-- बड़ी बह्र में एक ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है---" । शायद आप ने देखा हो ।
अच्छा, जब किसी ने यह लिखा ही नहीं -तो बहस  किस बात की ! 

मगर इस पर विचार करने में हर्ज भी क्या है । विचार तो किया जा सकता है ।

अच्छा, अब मूल विषय पर आते हैं--लम्बी बह्र क्या है या क्या हो सकती है 
बज़ाहिर [ स्पष्टत: ] लम्बी बहर वह बहर हो सकती है जिसमें मापनी [ अर्कान ] की संख्या और मात्रा भार [वज़न ]ज़्यादा से ज़्यादा हो ।
सामान्यतया लोग मुसम्मन  [ यानी शे;र में  मापनी की संख्या 8 वाली] बहर में शायरी करते है और सुविधाजनक भी है । अगर इनको मुज़ाइफ़ [ दो गुना ] कर दे तो बह्र का नाम होगा --मुसम्मन मुज़ाइफ़-- और अर्कान की संख्या होगी 16 यानी 8 x 2  होगी जो क्लासिकल अरूज़ के लिहाज़
से सबसे ज़्यादा अर्कान वाली बह्र होगी। ऐसी बह्र को 16-रुक्नी बह्र भी कहते हैं।
[ नोट - मुसम्मन और मुज़ाइफ़ की चर्चा पहले कर चुका हूँ।
मुज़ाहिफ़ और मुज़ाइफ़ से आप  confuse न हों ।तलफ़्फ़ुज़ लगभग एक जैसा है ।
 मुज़ाहिफ़  रुक्न --सालिम रुक्न पर ज़िहाफ़ लगाने से हासिल होता है।
और "मुज़ाइफ़"--माने किसी चीज़ को "दो गुना’ करना होता है । ख़ैर।


अब कुछ 16- रुक्नी बह्र में अज़ीम शो’अरा की ग़ज़ल के 2-4 शे’र  देख लेते है फ़िर उनमें इस्तेमाल हुई " मात्रा भार [वज़न ] की संख्या" पर विचार करेंगे।
पूरी ग़ज़ल ’रेख्ता’ साइट पर मिल जायेगी।
इस बह्र को आप पहचानते होंगे
 21--121--121--122 // 21-121-121-12 
जी बिलकुल सही पकड़ा।
जी हाँ ।  यह ’मीर’ की बह्र है --जिसके एक शे’र में  16-रुक्न इस्तेमाल होते हैं यानी मिसरा में -8
हमारे बहुत से मित्र 21--121--121--122 को ही मीर का बह्र कह देते है या समझ लेते हैं
या फिर    21--121--121---12  को ही मीर का बह्र कह देते है ।
Individually ये दोनॊ अलग अलग बह्र हैं और इनके अलग अलग नाम भी हैं ।।लेकिन जब यह 
combined हो कर एक साथ आती हैं तो -मीर की बह्र -कहलाती हैं ।
[ मीर की बह्र --पर एक विस्तृत आलेख मेरे ब्लाग ’ उर्दू बह्र पर एक बातचीत " -किस्त 59 पर उपलब्ध है } इच्छुक पाठकों 
की सुविधा के लिए और विशेष जानकारी के लिए लिन्क रहा हूँ
https://aroozobahr.blogspot.com/2020/06/60.html
उर्दू बह्र पर एक बातचीत -किस्त 59
इन तमाम बह्र और अर्कान [ मापनी ] के नाम भी हैं ।मैं इन सब के नाम  जानबूझ कर नहीं लिख रहा हूँ।कारण?
कारण  कि मेरे बहुत से  साथी बह्र को उनके नाम से से नही बल्कि Numerical अलामत [ चिह्नों [ जैसे 1222--1222 आदि से जानते और पहचानते है
नाम लिखने से  उन लोगों को लेख समझना और दुरूह हो जाएगा।
मीर ने इस बह्र में  कई ग़ज़लें कहीं है .जिसमें --एक मशहूर ग़ज़ल यह भी है
 
मूल बह्र  21--121--121--122 // 21-121-121-12 = 16/14 = 30 मात्रा भार वज़न एक मिसरा में।


पत्ता पता बूटा बूटा  हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है


आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के जिया को इश्क़ में उसके अपना वारा जाने है


-मीर तक़ी मीर-

नीचे वाली गज़ल  मीर का है पर  मीर की बहर नहीं है -
नीचे [121-22 ] को ग्रुपिंग कर के दिखा रहा हूँ कि समझने में सुविधा हो । वास्तव में ये दो अलग-अलग मुज़ाहिफ़ रुक्न है जो सालिम रुक्न पर ज़िहाफ़ के अमल से बरामद होते हैं
मूल बह्र 121-22   /  121--22/    121-22/     121-22/= 32 मात्रा भार वज़न एक मिसरा मे। मिसरा में 8-रुक्न


करो तवक्कुल कि आशिक़ी में न यूँ करोगे तो क्या करोगे
अलम जो यह है दर्द मन्दॊं कहाँ तलक तुम दवा करोगे


ग़म-ए-मुहब्बत से ’मीर’ साहब बतंग हूँ मैं फ़क़ीर हो तुम
जो वक़्त होगा कभी मुसाइद तो मेरे हक़ मे दुआ करोगे


-मीर तक़ी मीर-
16-रुक्नी बह्र में कुछ अन्य शायरो की ग़ज़ल से 2-4 शे’र लिख रहा हूँ 
[ख]  
मूल बह्र 22-112/22-112//22-112/22-112 = 32 मात्रा भार एक मिसरा में ।यानी मिसरा में 8-रुक्न


मयख़ाना-ए-हस्ती में अकसर हम अपना ठिकाना भूल गए
या होश में जाना भूल गए या होश में आना भूल गए


मालूम नहीं आइने में चुपके से हँसा था कौन  "अदम"?
हम जाम उठाना भूल गए ,वो साज़ बजाना भूल गए 
अब्दुल हमीद ’अदम’-
[ग] 
मूल बह्र 121--22/121-22//121-22/ 121-22 = 32 मात्रा भार एक मिसरा में


लतीफ़ पर्दों से नुमायां मकीं के जल्वे मकां से पहले
मुहब्बत आइना हो चुकी थी वजूद-ए-बज़्म-ए-जहाँ से पहले


अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ किस्मत में जौर-ए-पैहम
खुली जो आँखें इस अंजुमन में नज़र मिली आस्मां से पहले
शकील बदायूनी


22--112/ 22-112 //22-112/ 22-112
हंगामा-ए-ग़म से तंग  आकर इज़हार-ए-मसर्रत कर बैठे
मशहूर थी अपनी ज़िन्दा-दिली दानिस्ता शरारत कर बैठे


अल्लाह तो सब की सुनता है ,जुर्रत है ”शकील’अपनी-अपनी
’हाली’ ने ज़बाँ से उफ़ भी न की ,’इक़बाल’ शिकायत कर बैठे
शकील बदायूनी
इन सब उदाहरणों से स्पष्ट है कि 16- रुक्नी मक़्बूल [ लोकप्रिय ] बह्र में एक मिसरा में ज़्यादातर वजन =32 का आता है।
जब कि मीर की बहर में =30 मात्रा ही आ रही है यानी -2- कम } इसे अरूज़ की भाषा में -सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [ 2] बोलते है।
बाक़ी सभी बह्रे मुज़ाइफ़ बह्रें हैं --मीर की बह्र मुज़ाइफ़ बह्र नहीं है ।
मुजाइफ़ बह्र के लिए ज़रूरी है कि इसको दो बराबर -बराबर भाग में बाँटा जा सकें जब कि मीर की बह्र 16//14  unequal हैi|
ख़ैर।
अब इन मुज़ाइफ़ बह्रों की कल्पना कीजिए 
जो 16-रुक्नी तो है मगर मात्रा भार [वज़न ] अलग है 
122--122--122-122 // 122--122--122-122 = 40  मात्रा भार एक मिसरा में [ नाम आप जानते होंगे}
------
212---212---212---212-// 212--212--212--212  = 40 मात्रा भार वज़न  बह्र का भी नाम आप जानते होंगे।
"मुतदारिक सालिम मुसम्मन मुज़ाइफ़ " इस बह्र में भी एक ग़ज़ल के चन्द अश’आर देख लीजिए--


212--212--212--212-// 212--212--212-212= 

दिल दुखाए कभी ,जाँ जलाए कभी, हर तरह आज़माए तो मैं क्या करूँ ?
मैं उसे याद करता रहूँ हर घड़ी , वो मुझे भूल जाए तो मैं क्या करूँ ?


मैने माना कि कोई ख़राबी नहीं , पर करूँ क्या तबियत ’गुलाबी’ नहीं
मैं शराबी नहीं ! मैं शराबी नहीं ! वो नज़र से पिलाए तो मैं क्या करूँ ?
सरवर आलम राज़ ’सरवर’


यदि यही Logic अन्य सालिम बह्रों  पर  लगाया जाए ,जैसे -

हज़ज [ 1222 ] ,रमल [2122] ----- कामिल [11212] जैसी बह्रों का ’मुसम्मन मुज़ाइफ़" बनाया जाए तो क्या होगा ?
बनाया जा सकता है ।Theoretically and technically possible है } । अरूज़ में मनाही तो है नही कि इन मुज़ाइफ़ बह्रों में ग़ज़ल 
नहीं कही जा सकती । आप कर सकते हैं अगर आप में हुनर है । मुझे यक़ीन है कि आप कर सकते है [ तबअ’ आज़माई के तौर पर ही
सही या फ़नी  एतबार से ही सही }
मगर आज तक ऐसी कोई ग़ज़ल मेरी नज़र से गुज़री नही । अगर आप की नज़र से गुज़री हो तो अलग बात है।
1222--1222--1222--1222-// 1222--1222-1222-1222- = 56 मात्रा एक मिसरा में या ऐसे ही और कोई सालिम बह्र
तो क्या यह सबसे लम्बी बह्र हो सकती है ?


 हो सकती है । मगर अमलन [ Practically या व्यावहारिक रूप से ] होती नहीं ।कोई शायर इतनी लम्बी बह्र में शायरी करता नहीं।
 कारण ? नहीं मालूम 
--शायद एक कारण यह हो  कि इतनी लम्बी बह्र में शे’र को पढ़ना आसान काम न हो। स
--शायद इतनी लम्बी बह्र में भाव को ,अल्फ़ाज़ [ शब्दों ] को एक साथ बाँध कर [ गुम्फ़ित कर के condensed कर के ] जमाए रखना आसान काम न हो
--शायद मिसरा या शे’र का कसाव ढीला हो जाए तो शे’र हल्का हो जायेगा श्रोताऒ कॊ बाँध न पाए।
कारण जो भी हो । मैने लम्बी बह्र की एक संभावना व्यक्त की है कि यह सबसे लम्बी बह्र हो सकती है ।
एक मज़ेदार बात और ।
क्या आप जानते है कि जदीद शायरी मे [ आधुनिक शायरी ] में एक मिसरा में 5-अर्कान [ यानी एक शे’र में 10-रुक्न ] कुछ लोग शायरी करते है ।जहाँ क्लासिकल अरूज़
[ मुसम्मन तक ] खत्म हो जाता है उसके आगे की शायरी। हालाकि ऐसी ग़ज़ल  बहुत प्रचलन में नहीं है मक़्बूलियत हासिल नहीं है  ,मान्यता नहीं मिली मगर कुछ लोग करते हैं।
आटे में नमक के बराबर ही सही।आप भी कर सकते हैं ।मनाही  नहीं है ।
 अगर कल्पना करें कि ऐसे शे’र [ एक मिसरा में 5-रुक्न ] का मुज़ाइफ़ करेंगे तो क्या हासिल होगा : ? यानी एक शेर में 20- अर्कान ।यानी ज़्यादा से ज़्यादा 7x 20 =140 मात्रा भार वज़न [ अगर 7- हर्फ़ी सालिम रुक्न का इस्तेमाल हुआ हो तो ]
 बस बस अब रहने दीजिए । छोड़िए अब यह बात, बहुत हो गई । हा हा हा हा ।
 ज़्यादातर शायर मुसम्मन और मुसद्दस बहे में शायरी करना पसन्द करते है ?
इसलिए कि अनुभव के आधार पर यही Optimum स्थिति है जिसमे शे’र कसा हुआ रहता है  भाव गठे हुए रहते हैं  अदायगी बेहतर होती है ।
।आप जिस बह्र मे comfortable feel करें उसी बह्र में शायरी करें। "छोटी बह्र" --"लम्बी बह्र" की बह्स में न उलझे । बात निकली तो बेबात की बात कर ली।

[नोट - इस मंच के गुरुजनॊ  से करबद्ध प्रार्थना है कि अगर इस लेख में कुछ तथ्यात्मक दोष दृष्टिगोचर हो  तो कृपया ध्यान में अवश्य लाएं जिससे मैं स्वयं को सही कर सकूँ ]
सादर

[नोट : इस लेख के साथ क़िस्त 62 भी देखें ]
-आनन्द पाठक--