बुधवार, 18 दिसंबर 2019

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 65 [फ़िराक़ साहब की एक ग़ज़ल की तक़्तीअ]

फ़िराक़ साहब की एक ग़ज़ल है ----

ये तो नहीं कि ग़म नहीं
हाँ मेरी आँख  नम नहीं

तुम भी तो तुम नहीं हो आज
हम भी तो आज हम नहीं

नश्शा सँभाले हैं मुझे
बहके हुए क़दम नहीं

क़ादिर-ए-दो जहाँ है ,गो
इश्क़ के दम में दम नहीं

मौत अगरचे मौत है
मौत से ज़ीस्त कम नही

अब न ख़ुशी की है ख़ुशी
ग़म भी अब तो ग़म नहीं

मेरी निशश्त है ज़मीं
ख़ुल्द नहीं ,इरम नहीं

-फ़िराक़ गोरखपुरी-

एक मंच पर मेरे किसी मित्र ने इस ग़ज़ल की बह्र जाननी चाही थी। उनका कहना था कि चूँकि यह ग़ज़ल ’फ़िराक़’ साहब की 
है तो यक़ीनन यह किसी न किसी बह्र में होगी
------------------------------------------
यह आलेख उसी सन्दर्भ में लिखा गया है

अगर  शायर ने अपनी ग़ज़ल की ’बह्र’ न लिखी या न बताई हो तो ग़ज़ल की बह्र निकालना अपेक्षाकृत एक मुश्किल काम है ।
वैसे आज भी किसी भी ग़ज़ल -संग्रह में ग़ज़ल के ऊपर " बह्र’ लिखने का प्रचलन नहीं है ।ज़माना-ए-क़्दीम
में भी नहीं था ।कारण मालूम नहीं ।
हो सकता है , पुराने ज़माने में जिन लोगों को शायरी का ज़ौक़-ओ-शौक़ था या अदब आशनाई  थी वो
बह्र के मुत्तालिक़ मज़ीद मालूमात रखते रहे हों और किसी शायर की कही हुई ग़ज़ल पहचान लेते हों और उन्हे मालूम
था कि ग़ज़ल बह्र से कहाँ ख़ारिज़ हो रही है या कहाँ  वज़न पर नहीं है।यह मेरा जाती ख़याल है ।आप का इससे मुतफ़्फ़िक़ होना ज़रूरी नहीं
यह समस्या आज भी है । मेरे एक मित्र ने बताया कि लोग आजकल ’ग़ज़ल’ सुनते है ,सुनाते है
जो बह्र या अरूज़ जानते पहचानते हैं उनके लिए बह्र लिखने की ज़रूरत नहीं और जो नहीं जानते हैं उनके लिए लिखने का कोई फ़ायदा
 नहीं।
ख़ैर
लिखी हुई ग़ज़ल का बह्र निकालना [ अगर वह सामान्य मशहूर , मक़्बूल प्रचलित आम बह्र में नहीं है  तो]  अपेक्षाकृत इसलिए मुश्किल है 
कि बह्र अपनी माँग पर [कुछ शर्तों के साथ ] हर्फ़ का वज़न गिराना माँगती है ।कहाँ हर्फ़ का वज़न गिराना है और कहाँ नहीं गिराना है यह बह्र जानने
के बाद और ’तक़्तीअ” करने के बाद ही पता चलेगा --पहले नहीं
इसका एक सरल उपाय यह है कि ग़ज़ल का हम वह ’मिसरा’ [या शे’र] का इन्तख़ाब करेंगे जिसमे किसी हर्फ़ का वज़न न गिराया गया हो और यदि
गिराया भी गया हो तो कम से कम जायज तरीके से गिराया गया हो। हम यहाँ मिसरा इस लिए कह रहे है कि यदि मिसरा का सही वज़न या बह्र निकल गया तो
फिर शे’र क्या पूरी की पूरी ग़ज़ल उसी  बह्र और वज़न में होगी । इसे आप "रिवर्स इंजीनियरिंग " कह सकते हैं
अब  ’फ़िराक़’ साहब की ग़ज़ल पर आते है
यह ग़ज़ल मैने और मेरे मित्र दोनो ने  ’राजपाल ’ ्प्रकाशन से फ़िराक़ साहब की ग़ज़लों पर प्रकाशित एक संग्रह से नकल किया है।
वस्तुत: यह ग़ज़ल एक लम्बी ग़ज़ल है [ दो ग़ज़लें -एक ही ज़मीन ,एक ही रदीफ़ और एक ही हम क़ाफ़िया  पर कही गई है ।इसमें लगभग 30-अश’आर हैं]
हमने यहाँ अपने मक़सद के लिए चन्द अश’आर ही नकल किए हैं।

हम इस ग़ज़ल की एक मिसरा  का इन्तेखाब करते है

" खुल्द नहीं ,इरम नहीं "----कारण कि इस मिसरा में हर्फ़ का वज़न गिराने की नौबत ही नही है ।’सेफ़-गेम’

इस मिसरा का वज़न ठहरता है
2     1  1 2  / 1 2  1 2 = 2112---1212
खुल द नहीं / इ रम नहीं

[ अब आप कहेंगे ’इरम’ को आप ने ’इर म [ 21] के वजन पर क्यों नहीं लिया। वज़ह साफ़ है इरम का तलफ़्फ़ुज़ ’इ रम ’[1 2 ] है न कि ’इर म ’ है [ 2 1 ] ख़ैर]

अब हमें इस मिसरा का वज़न 2112---1212 मिल गया
एक बात तो साफ़ हो गई यह कोई ऐसा शे’र है जिसमे मिसरा में दो और शे’र में 4- अर्कान मुस्तमिल है ] और इसमें से कोई सालिम रुक्न इस्तेमाल नहीं हुआ है अत:
यह कोई ;मुरब्ब: और मुज़ाहिफ़ बह्र है
किस सालिम रुक्न का मुज़ाहिफ़ वज़न " [यानी किस सालिम रुक्न पर ज़िहाफ़ लगा है।
थोड़ा सा ध्यान से देखे  2 1 1 2 --- यह कहीं  2 2 1 2 [ मुस तफ़ इलुन ] पर तो कोई  ज़िहाफ़ नहीं लगा है
जी हाँ ,लगा है”मुस तफ़ इलुन ’[2 2 1 2 ] पर अगर ’तय्यी’ का ज़िहाफ़ लगा दें तो वज़न बरामद होगा --2 1 1 2 [ मुफ़ त इलुन ---यहाँ -ते- और -ऐन- मुतहर्रिक है
और इसे ’मुत्तवी’ कहते हैं
 तो फिर 1 2 1 2 क्या है ?- यदि "मुस तफ़ इलुन" [ 2 2 1 2 ] पर ख़ब्न का ज़िहाफ़ लगा दें तो बरामद होगा ’मफ़ा इलुन [1 2 1 2 और इसे मख़्बून कहते है
और मख़्बून आम ज़िहाफ़ भी है यानी यह शे;र के किसी मुक़ाम पर आ सकता है और यह यहाँ ’अरूज़’ और जर्ब के मुक़ाम पर आया है

अब यह बात तो साफ़ हो गई कि उक्त दोनो अर्कान सालिम रुक्न [मुस तफ़ इलुन = 2 2 1  2 ] का ही मुज़ाहिफ़ शकल है और यह "बह्र-ए-रजज़" का बुनियादी रुक्न है
अत: हम कह सकते हैं कि इस ग़ज़ल की बह्र है
"बह्र-ए-रजज़ मुरब्ब: मुतव्वी मख़्बून "

अब एक-दो शे’र की तक़्तीअ कर के और जाँच कर लेते हैं
2  1  1  2 / 1  2   1  2   = 2 1 1 2 - 1 2 1 2 = मुफ़ त इलुन ---मफ़ा इलुन
ये तो नहीं / कि ग़म नहीं
2   1 1  2  / 1  2  1 2 =2 1 1 2 - 1 2 1 2 = मुफ़ त इलुन ---मफ़ा इलुन

हाँ मेरी आँ /ख  नम नहीं

[ध्यान दें-- यहाँ -ये- [2] मुस के वज़न पर लिया गया है । अगर कहीं  किसी अन्य ग़ज़ल में ’बह्र’ की माँग होती तो यही -ये- [ मुतहर्रिक 1 ] की वज़न पर लिया जाता ।और -मेरे को ’मि री ” [दोनो मुतहर्रिक 1 1 ] के वज़न पर किया है जो अज रू- ए- अरूज़ ऐन मुताबिक़ भी है 

दूसरा शे’र देखते हैं
 2   1    1 2   / 1 2 1 2   = 2 1 1 2 - 1 2 1 2 = मुफ़ त इलुन ---मफ़ा इलुन
नश श:  सँभा/ ले हैं मुझे
2    1  1 2  / 1  2 1 2  = 2 1 1 2 -- 1 2 1 2 = मुफ़ त इलुन ---मफ़ा इलुन
बह के हुए / क़ दम नहीं

अब एक शे’र और [ जो परेशानी का सबब बना हुआ है ]
   2   1 1 2  / 1  2 1 2  =2 1 1 2 - 1 2 1 2 = मुफ़ त इलुन ---मफ़ा इलुन
अब न ख़ुशी /की है ख़ुशी
 2      1  2    / 1  2 1  2  = 2 1 2 ----1 2 1 2   [ पहले रुक्न 212 में -एक मुतहर्रिक कम आ रहा है
ग़म भी अब / तो ग़म नहीं

 यक़ीनन मिसरा सानी वज़न में नहीं आ रहा है । कहीं कुछ कमी तो है 
चूँकि हमने यह ग़ज़ल ’देवनागरी’ [हिंदी वर्जन] से नकल किया है अत: हो सकता है
उर्दू वर्जन में शायद यह शे’र सही नकल हो -कह नहीं सकता।

यदि किसी सज्जन को उर्दू वर्जन का सही शकल दस्तयाब हो सके तो बराय मेहरबानी इस हक़ीर को आगाह कराइएगा ताकि इस शे’र की सही तक़्तीअ पेश की जा सके ।

चलते चलते एक बात और---

यदि मेरे इस मज़्मून में कोई ग़लतबयानी हो गई हो तो दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि बराय मेहरबानी उसकी निशानदिही ज़रूर कर दें ताकि आइन्दा अपने आप को दुरुस्त कर सकूँ
सादर
-आनन्द.पाठक-

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 64 [ एक गीत की तक़्तीअ]

[नोट :--मेरे एक मित्र ने एक गीत के चन्द [मुखड़े] मिसरे की तक़्तीअ जाननी चाही है ।यह आलेख उसी सन्दर्भ में  लिखा गया है। मैने सोचा कि इस ब्लाग के अन्य पाठक गण जो ग़ज़ल बह्र अरूज़ में दिलचस्पी रखते हैं वो भी इस सवाल के उत्तर से लाभान्वित हो सकें। 
एक बार पुन: स्पष्ट कर दूँ कि मैं कोई शायर या अरूज़ी नही हूँ -न ही मैं ऐसा कोई दावा ही करता हूँ --बस अदब आशना हूँ-अरे अरे आप नाराज़ न होईए--यह मेरा तकिया-कलाम है--हा हा हा 
मेरे इन आलेखोंसे पता नही आप लाभान्वित होते है या नहीं ,कह नहीं सकता ,मगर आप के सवालों से मुझे बहुत फ़ायदा होता है । उत्तर देने के बहाने --अरूज़ की किताबों का एक बार नज़र-ए-सानी कर लेता हूँ और मुस्तफ़ीद होता हूँ। 
       येअरूज़ का सबक़ है ,होता कहाँ है पूरा
       हर बार पढ़ रहा हूँ  ,हर बार  है अधूरा 
                                   --आनन्द.पाठक-

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सवाल :--     आदरणीय पाठक साहब
                   आदाब
सर एक तो मुझे "कसमें वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या "की तक़ती अगर बता सकें तो मेहरबानी होगी
दूसरे जो आपके ब्लाग थे उरुज़ से मुताअल्लिक़ अगर वो सब के सब आप मुझे भेज दें तो बड़ी मेहरबानी होगी
      धन्यवाद

उत्तर :
दूसरे भाग का उत्तर कल दे चुका हूँ

पहले भाग --यानी तक़्तीअ -का उत्तर अब देने की कोशिश कर रहा हूँ
इस गीत का 2-शे’र ले रहा हूँ । समझने समझाने में सहूलियत होगी

क़स्मे,वादे,प्यार वफ़ा सब // बातें हैं बातों का क्या !
कोई किसी का नहीं,ये झूठे// नातें हैं नातों का क्या !

होगा मसीहा सामने तेरे  // फिर भी न तू बच पायेगा
तेरा अपना ख़ून ही आख़िर // तुझ को आग लगायेगा

आसमान के उड़ने वाले // मिट्टी में मिल जायेगा 
कस्मे वादे प्यार वफ़ा सब -----

// --यहाँ अरूज़ी वक़्फ़ा है और यह मिसरा बह्र-ए-शिकस्ता भी है
इन अश’आर की तक़्तीअ [मेरे ख़याल से] "मीर की बह्र"** से की जा सकती है
[** यह  जनाब शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब का दिया हुआ नाम है -कारण कि मीर तक़ी मीर ने अपनी ग़ज़लों में]इस बहर का कसरत से इस्तेमाल किया है
मीर की बह्र पर एक विस्तृत आलेख अपने ब्लाग www.urdu-se-hindi.blogspot.com [ or www.urdusehindi.blogspot.com] उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 59 
पर लगा चुका हूँ आप चाहें तो एक बार वहाँ देख सकते हैं। पूरा का पूरा मज़्मून यहाँ लगाना मुनासिब नहीं ]
मीर की बह्र के मूल अर्कान यूँ है
फ़े’लु---फ़ऊलु--फ़ऊलु--फ़ऊलुन // फ़े’लु---फ़ऊलु--फ़ऊलु--फ़ अ’ल
21-----121-----121----122---//  21----121----  -121--  -12 
---------------A--------------//  ----------B-------------
यह बह्र   --बह्र-ए-मुतक़ारिब की दो मुख़तलिफ़ मुज़ाहिफ़ बह्रों से मिल कर बनी है
’तख़नीक’ के अमल से A  के 16-औज़ान और  B  --- के 16-औज़ान बरामद किए जा सकते हैं जो बाहम मुतबादिल होते है । इन सारे औज़ान का ज़िक़्र मैने अपने ब्लाग में किया है
पार्ट --B --  में   पार्ट  -A- के बनिस्बत ’एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ =2"  कम है
यहाँ हम उन्हीं औज़ान का ज़िक्र करेंगे जो हमारे तक़्तीअ करने में दरपेश होगी
A  के उन 16-औज़ान में से दर्ज-ए-ज़ैल वज़न भी शामिल हैं
[क]      22---22---21---122
[ख[       21---121--122--22
[ग] 21---122--21---122
[घ]  22---21----122---22
समझने में सुविधा हो --इस लिए  हर लाइन में  ’रुक्न’ के नाम नहीं लिख रहा हूँ आप चाहें तो लिख सकते है जैसे
22= फ़े’लुन
21= फ़े’लु
122= फ़ऊलुन  वग़ैरह वग़ैरह

B  के उन 16-औज़ान में से दर्ज-ए-ज़ैल वज़न भी शामिल हैं

[च] 22---22---22---2
[ख]  21---122---22--2
[ग] 22   -21--122   -2
समझने में सुविधा हो --इस लिए  यहाँ भी हर लाइन में ’रुक्न’ के नाम नहीं लिख रहा हूँ आप चाहें तो लिख सकते है जैसे

अब आप के दिए हुए गीत के मिसरे की तक़्तीअ पर आते हैं
22     /22   / 21  / 122      //  22 / 2  2 / 2 2 /  2 
क़स्मे,/वादे,’/प्यार/ वफ़ा सब // बातें/ हैं बा /तों का/ क्या !
---------क----------------//---------च-----
______________________________________________

21    /  121       / 122   / 2 2 //   22 / 22  / 22    / 2
कोई / किसी का / नहीं,ये/  झूठे// नातें /हैं ना /तों का /क्या !   
-----  ख-----------------------//--------च------
___________________________________________________
 2  1 /  122  /  21  / 1 2 2 // 2   1   / 1 2   2 / 2 2 /2
होगा /मसीहा /साम /ने तेरे  // फिर भी/ न तू बच/ पाये /गा
----ग---- // ------  ख------   
_____________________________________________
22   / 2 2  /  21  / 122      // 2  2      / 21  / 122  / 2
तेरा /अपना /ख़ून /ही आख़िर // तुझ को/ आग/ लगाये/ गा
----------क---                  //     ------ग-------
_______________________________________________
22--21      /  1 2  2  /   2 2//  22  /    2 2    / 2 2 /2 
आसमान** /के उड़ने /वाले // मिट्टी /   में मिल/ जाये/ गा 
----------घ--------------//--------च------

**एक सवाल ---कि यहाँ ’आसमान’ को 22-21 की वज़न पर क्यों लिया ?
वैसे तो ’आसमान ’ का वज़न --- 2121 [फ़ाइलान ] होगा
या फिर ’आसमाँ’  का वज़न       212     [ फ़ाइलुन ] होगा
जी बिल्कुल सही । आप दुरुस्त हैं । मगर
यहाँ  ’आसमान’ जिस मुक़ाम पर आ रहा है और बह्र की माँग भी है इस लिए इसे हम ने तोड़ दिया  ---"आ सम्--आन’ [22-21 ] --इससे न तो अर्थ में फ़र्क़ पड़ा .न ही धुन में ,न ही गाने में .न ही भाव में और बह्र की माँग भी पूरी  होगई
अगर आप मन्ना डे जी का इस गीत का गायन ध्यान से सुने तो गाया भी इसी लय में है
यह तो आप जानते ही होंगे कि यह गीत हिंदी फ़िल्म ’उपकार’ का है और गीतकार  ’इन्दीवर’ जी है ।
उन्होने लिखा ---आसमान के उड़नेवाले----
चलते चलते एक सवाल----
सवाल यह कि
[1]  आसमान पे उड़नेवाले ---
[2]   आसमान  में  उड़नेवाले
[3]    आसमान के उड़नेवाले

अगर यह गीत आप लिखते तो ऊपर के तीन  विकल्पॊ में से कौन सा विकल्प चुनते ?
बह्र और वज़न के लिहाज़ गीत में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा।
सवाल इस लिए कर रहा हूँ कि ग़ज़ल कहने में सिर्फ़ बह्र--रुक्न--वज़न--आहंग ही काफ़ी नहीं होता।मुहावरों का सही प्रयोग --सही अर्थ प्रेषण की क्षमता भी काफ़ी मायने रखती है।
आशा करता हूँ कि मैं अपनी बात कहने में शायद कुछ हद तक कामयाब हुआ हूँगा
अगर कोई ग़लत बयानी हुई तो बराए मेहरबानी निशान दिही ज़रूर कीजियेगा ताकि मैं अपने आप को दुरुस्त कर सकूँ\
सादर
-आनन्द.पाठक---