रविवार, 2 दिसंबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 53 [बह्र-ए-मुज्तस]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 53 [बह्र-ए-मुज्तस]

[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

पिछली किस्त में -बह्र-ए-मुक़्तज़िब- पर चर्चा की थी। इस क़िस्त में ’बह्र-ए-मुज्तस’ की चर्चा करेंगे
 बह्र-ए- मुज्तस के बुनियादी अर्कान है
मुस तफ़अ’लुन  -- फ़ाइलातुन  [a---b ]
 2    2 1    2    ----2 122   yaani     2212----2122

स बह्र की मुसम्मन सालिम शकल होगी--
---मुस तफ़अ’लुन----फ़ाइलातुन----मुस तफ़अ’लुन---फ़ाइलातुन
यानी   2212---------2122---------2212-----------2122
            a--------------b-------------a--------------b
और मुसद्दस सालिम शकल होगी
मुस तफ़अ’लुन---फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन
2212-----------2122---------2122
a------------------b-------------b

वैसे उर्दू शायरी में --शायरों ने इस बह्र का मुसम्मन  ही ज़्यादा प्रयोग किया है और वो भी मुज़ाहिफ़ शकल में--मुसम्मन सालिम का कम ही प्रयोग किया है लगभग न के बराबर।
एक बात ध्यान देने की है इस बह्र में
1-रुक्न मुस तफ़अ’ लुन [2212] --सालिम रुक्न ’ मुसतफ़इलुन [2212] के ’मुन्फ़सिल’ शकल में  है यानी [ सबब+वतद मफ़रुक़+सबब]   यानी मुस+तफ़अ’+लुन के रूप में है जब कि ’मुस तफ़ इलुन’[2212]  [रजज़ का बुनियादी रुक्न] अपनी ’मुतस्सिल शकल में  [ यानी सबब+सबब+ वतद मज्मुआ] है अत: मुज्तस में अगर वतद पर कोई ज़िहाफ़ लगेगा तो वो ’वतद-ए-मफ़रूक़’ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात लगेंगे ,न कि वतद-ए-मज्मुआ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात। बहर-ए-मुज्तस में ज़िहाफ़ात का अमल करते वक़्त यह बात ध्यान में रखनी होगी ।
2- बह्र-ए-मुज्तस में ’वतद’ -दो सबब के बीच में फँसा हुआ है यानी [मुस  -- और --लुन के बीच में ]जब कि रजज़ में ’वतद’ एक किनारे [दो सबब के बाद] आता है। इसी लिए बह्र-ए-मुज्तस के दोनों सबब-ए-ख़फ़ीफ़ में ’मुआक़बा’ है । यानी दोनो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को एक साथ ’साकित’ करना उचित नहीं । यही कारण है है कि इस बहर में ’मुस तफ़अ’लुन ’ पर मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ ’शकल ’[ ख़ब्न+कफ़] मुज़ाहिफ़ ’मश्कूल’ नहीं लगता जो दोनो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को एक साथ ’साकित’ कर देगा।
   [ मुरक्क्बा---मुआक़बा--आदि- के बारे में गुज़िस्ता अक़्सात में विस्तार से चर्चा कर चुका हूँ]

इस बह्र में लगभग तमाम बड़े शायरों ने  जैसे मीर--ग़ालिब--सौदा--मोमिन--ज़ौक़ ने अपने कलाम कहें है मगर ज़्यादातर मुसम्मन मुज़ाहिफ़ की शकल में  ही कहें हैं  उर्दू शायरी में इस बह्र के मुसम्मन मुज़ाहिफ़ शकल ही ज़्यादातर प्रचलन में है अत: हम मुज्तस की  कुछ मक़्बूल और मानूस बह्र की ही  चर्चा करेंगे। मगर इस का मतलब यह क़त्तई नहीं है कि इसकी सालिम बह्र में कलाम नहीं कहे जा सकते । आप चाहें तो कह सकते है ,तबअ’ आजमाई कर सकते हैं । मैदान खुला है।
आगे बढ़ने से पहले इन के अर्कान पर लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ात की चर्चा कर लेते हैं } ध्यान रहे ’ज़िहाफ़ ख़ब्न’ दोनों ही अर्कान पर लगता है और बरामद मुज़ाहिफ़ को ’मख़्बून’ कहते हैं।
मुसतफ़अ’लुन [2212] + खब्न = मुज़ाहिफ़ मख़्बून  मुफ़ाइलुन [1212]

फ़ाइलातुन [2122} + ख़ब्न = मुज़ाहिफ़ मख़्बू्न  फ़इलातुन [1122]    [-इ- ऐन मुतहर्रिक है ]
फ़ाइलातुन [2122 ]+ ख़ब्न+ हज़्फ़ = मुज़ाहिफ़ मख़्बून महज़ूफ़ फ़इ’लुन [ 112] -तदैव-
फ़ाइलातुन[2122 ]  + ख़ब्न +क़स्र = मुज़ाहिफ़ मक़्बून मक़्सूर        फ़इलान  [ 1121 ] -तदैव-
फ़ाइलातुन [2122] + क़्लअ’+हज़्फ़ =मुज़ाहिफ़ मक़्लूअ’महज़ूफ़      फ़े   [2] 
मुसम्मन शकल
[1] मुज्तस मुसम्मन सालिम
---मुस तफ़अ ’लुन----फ़ाइलातुन----मुस तफ़अ’लुन---फ़ाइलातुन
यानी   2212---------2122---------2212-----------2122

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि उर्दू शायरों ने अपने कलाम में ज़्यादातर इसके  मुसम्मन मुज़ाहिफ़ शकल का ही प्रयोग किया -सालिम शकल का बहुत कम ही प्रयोग किया है । कारण मालूम नहीं । हो सकता है कि इस बह्र का सालिम मुसम्मन शकल ज़्यादा ’आहंगखेज़’ न हो । मगर इसका मतलब ये भी नहीं कि इसकी  मुसम्मन सालिम बह्र में शायरी नहीं की जा सकती । आप चाहें तो कर सकते हैं ।
 उदाहरण के तौर पर कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से

क्यों मैकदे में घुटन है साक़ी ये क्या हो रहा है
हर एक को दूसरे पर शक मुख़बरी का ये क्यों है 

अब इसकी तक़्तीअ’ भी कर के देख लेते हैं
  2    2  1 2  /. 2 1 2  2   /  2 2  1 2      / 2 1 2 2
क्यों मै कदे  /में घु टन है / साक़ी ये क्या ’/हो रहा है
  2  2  1 2    /  2 1 2 2  /  2  2    1 2  /  2 1  2  2
हर एक को / दूसरे पर /शक मुख़ बरी /का ये क्यों है


मुज्तस मुसम्मन की कुछ मुज़ाहिफ़ शकलें----
[2] मुज्तस मुसम्मन मख़्बून
मफ़ाइलुन ----फ़ इलातुन  --- मफ़ाइलुन---फ़ इलातुन  [ यहाँ -इ- यानी  ’ऐन’ मुतहर्रिक है ]
1212----------1122---    1212------1122 
आप जानते है [जैसा कि ऊपर लिख भी जा चुका है] कि ’मुस तफ़अ ’लुन [2212] का मख़बून मुज़ाहिफ़ ’ मफ़ाइलुन [1212] होता है जब कि फ़ाइलातुन [2122] का मख़्बून मुज़ाहिफ़ फ़इलातुन [1122] होता है अत: अर्कान की तरतीब ऊपर लिख दी गई
एक उदाहरण भी देख लेते हैं
ग़ालिब की ग़ज़ल का एक शे’र है

अजब निशात से ,जल्लाद के,चलें हैं हम आगे
कि अपने साये से सर पाँव से से हैं दो क़दम आगे

क़सम जनाज़े पे आने की खाते हैं ’ग़ालिब’
हमेशा खाते थे जो मेरी जान की क़सम आगे

1  2   1   2  / 1  1  2   2    / 1 2 1 2  / 1 1 2  2
अजब निशा /त से ,जल ला /द के,चलें / हैं ह म आ गे
1     2  1   2 / 1 1  2  2   /  1 2 1  2 / 1 1  2   2
कि अपने सा /ये से सर पाँ / व से हैं दो /क़ द म आगे

तक़्तीअ में आप ध्यान देंगे शे’र में---से-हैं---ये   तो  आदि  ख़ैर 1 [ मुतहर्रिक ] के वज़न पर ले लिया जो है भी और बह्र की माँग भी है यहाँ --लेकिन ’हम आगे’ को 122 के वज़न पर क्यों लिया?
कारण साफ़ है --जब शे’र की तल्फ़्फ़ुज़ अदायगी करेंगे तो उसे ’हमागे’ ही पढ़ेंगे [ आगे का जो अलिफ़ है  वस्ल हो गया म[मीम] के साथ और ’हमागे’ की आवाज़ सुनाई देगी। और तक़्तीअ’ हमेशा तलफ़्फ़ुज़ के अनुसार ही चलती है --न कि मक्तूबी [जैसा लिखा हुआ हो] के अनुसार

दूसरे शे’र की तक़्तीअ आप कर लें
[2-क] मुज्तस मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन
मफ़ाइलुन ----फ़ इलातुन  --- मफ़ाइलुन---मफ़ऊलुन
1212----------1122---    1212------222   
ऊपर के बह्र का आखिरी रुक्न है ’फ़ इलातुन [1122] में [फ़े -ऐन--लाम  ,तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गए जो तस्कीन-ए-औसत के अमल से ’मफ़ऊलुन’ 2 2 2 हो जाएगा
एक उदाहरण देखते है
अहमद नदीम क़ासमी का एक शे’र है

अब इस से बढ़ के भी मेराज़ नारसाई क्या हो
मुझे गले से लगायें ,मगर समझ में न आयें

इसकी तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
1     2      1  2    / 1  1  2  2 / 1 2 1 2  / 2 2 2
अ (बिस) से बढ़/ के भी  मेरा / ज़ नारसा /ई क्या हो
1  2   1 2  / 1 1 2 2  /1  2  1  2     /  2  2   2
मुझे गले / से ल गायें ,/ म गर स मझ /  में (न आ)यें

’अब इस’  को’ ’अबिस’ [12] -ब-का -इ- से वस्ल हो कर ’अबिस’  की आवाज़ दे रहा है
-मे न आयें   --मे   -न-और आ क वस्ल हो गया और ना की आवाज़ दे रहा है और इसी लिए 2 के वज़न पर लिया गया है
[3] मुज्तस मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़
 मफ़ाइलुन----फ़इलातुन----मफ़ाइलुन---फ़इलुन
1212---------1122---------1212-----112
’मीर’ की एक ग़ज़ल के चन्द अश’आर  हैं

हमारे आगे तेरा जब किसू ने नाम लिया
दिल-ए-सितमजदा को हमने थाम थाम लिया

ख़राब रहते थे मसजिद के आगे मयख़ाने
निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इन्तकाम लिया

पहले शे’र की तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
 1  2 1 2  / 1 1  2  2    / 1 2  1 2   / 1 12
हमारे आ / गे तिरा जब / किसू ने ना /म लिया
1   2  1  2    / 1 1   2    2   / 1 2 1 2   / 1 1 2
दि ले सितम / ज द: को हम / ने थाम था/ म लिया

[ दिल-ए-सितम  को दि ले सि तम  [1 2 1 2 ] के वज़न पर लिया तलफ़्फ़ुज़ के हिसाब से]
दूसरे शे’र की तक़्तीअ’ आप कर के देख लें

किसू---कभू  जैसे अल्फ़ाज़ ’मीर’ की ख़ास पहचान है]

[3-क] मुज्तस मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़ मुस्सकिन
 मफ़ाइलुन----फ़इलातुन----मफ़ाइलुन---फ़ेलुन
1212---------1122---------1212-----22
अगर आप बह्र [2] देखें तो आखिरी रुक्न [अरूज़ या ज़र्ब के मुक़ाम पर] ’फ़ इ लुन ’ [112] है -यानी [फ़े--ऐन--लाम--नून] यानी 3-मुतहर्रिक एक साथ आ गये तो तस्कीन-ए-औसत की अमल से -ऐन- को साकिन कर सकते है यानी सबब--सबब [2 2] में तोड़ सकते है और जो वज़न इस अमल से बरामद होगी उसे ’मुसक्किन’ कहेंगे। ध्यान रहे तस्कीन-ए-औसत का अमल सालिम रुक्न पर कभी नहीं होता --बस ’मुज़ाहिफ़ रुक्न’ पर ही होता है। लगे हाथ ये भी बताता चलूँ  ज़िहाफ़ हमेशा सालिम रुक्न पर ही लगते है --और मुरक़्क़्ब ज़िहाफ़ [दो ज़िहाफ़] एक साथ -एक वक़्त में ही लगते हैं सालिम रुक्न पर -One after other नहीं

ग़ालिब की एक बहुत ही मशहूर ग़ज़ल है , जिसे जगजीत सिंह ने फ़िल्म ’मिर्ज़ा ग़ालिब ’ में बड़े दिलकश अन्दाज में गाया है --आप ने भी सुना होगा

हर एक बात पे कहते हो तुम कि ’तू क्या है’
तुम्ही कहो कि ये अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

रगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है 

 पहले शे’र की तक़्तीअ कर के देखते हैं
1 2  1 2  /  1 1  2  2   /  1  2   1   2   / 2  2
ह रेक बा /त पे कह ते  / हो तुम कि ’तू / क्या है’
1   2 1  2  / 1  1  2   2    /1     2   1   2  / 2  2
तुमी कहो / कि ये अन दा /ज़-ए-गुफ़ त गू /क्या है

’हर एक ’ को ’हरेक ’ [121] के वज़न पर लिया मल्फ़ूज़ी के हिसाब से
अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू मे जो -ए- [  इज़ाफ़त-ए-क़सरा  कहते है] आप की मरजी पर है वज़न के माँग के अनुसार आप ले या न लें--चूँकि यहा ज़रूरत नहीं थी सो नही लिया
दूसरे शे’र की तक़्तीअ  ऐसे ही आप ख़ुद कर सकते हैं
इसी बह्र में एक ’जिगर मुरादाबादी’ का भी एक शे’र सुन लें

अभी न रोक निगाहों को पीर-ए-मैख़ाना
कि ज़िन्दगी है अभी ज़िन्दगी से बेगाना

इसी बह्र में फ़िराक़ गोरखपुरी साहब के 1-2 शे’र समाअ’ फ़र्माएं

किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब,मगर फिर भी 

हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई नई से है तेरी रहगुज़र फिर  भी

अगर आप को नागवार न गुज़रे तो 1-2 शे’र इस हक़ीर के भी बर्दास्त कर लें -इसी ज़मीन पर

तलाश जिसकी थी वो तो नहीं मिला फिर भी
उसी की याद में ये दिल है मुब्तिला फिर भी

हज़ार तौर तरीक़ों से  आज़माता है 
क़रीब आ के वो रखता  है फ़ासिला फिर भी

तक़्तीअ कर के आप देख लें कहीं मैं ग़लत तो नहीं कह रहा हूँ

[4] मुज्तस मुसम्मन मख़्बून मक़्सूर
 मफ़ाइलुन----फ़इलातुन----मफ़ाइलुन---फ़इलान
1212---------1122---------1212-----1121
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

झुलसते तपते हुए ज़िन्दगी के सहरा में
तुम्हारी याद की ठन्डी हवाओं है मेरे साथ

 मिसरा सानी की तक़्तीअ कर के देख लेते है --कारण कि मिसरा उला का आखिरी रुक्न ’फ़ेलुन ’[22] तो है ही
1  2 1  2   / 1 1   2   2   / 1 2 1  2  / 1 1 2 1
तुमारि या / द की ठन डी / हवाओं है/  मिरे साथ  [ यानी मीम मय ज़ेर..रे  मय ज़ेर-यानी हरकत--हरकत यानी 1 1 यानी फ़-इ

[4-क] मुज्तस मुसम्मन मख़्बून मक़्सूर मुसक्किन
 मफ़ाइलुन----फ़इलातुन----मफ़ाइलुन---फ़ेलान
1212---------1122---------1212-----221
फ़ानी बदायूनी का एक शे’र है--

न इब्तिदा की ख़बर है न इन्तिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं ,सो वो भी क्या मालूम

इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1   2   1 2     / 1 1   2  2 /  1 2 1     2   / 221
न इब् ति दा / की ख़ बर है/  न इन् ति हा /मालूम
1  2  1 2   / 1 1    2  2   / 1  2  1   2    / 2 2 1
रहा ये वह/ म कि हम हैं ,/ सो वो भी क्या/ मालूम

एक बात और-
बह्र [1] से बह्र [4] तक में  अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर जो रुक्न - फ़इलुन [112]---फ़ेलुन[22]--- फ़इलान[1121 ]---फ़ेलान [221] आया है यह सब आपस में ’मुतबादिल’ है यानी इनका आपस में ख़ल्त जायज़ है यानी अरूज़ और ज़र्ब में एक दूसरे के मुक़ाम पर लाए जा सकते हैं
 
[5] मुज्तस मुसद्दस मख़्बून

मफ़ाइलुन----फ़इलातुन--फ़इलातुन  [ यहाँ -इ- ऐन मुतहर्रिक है]
1212-------1122--------1122
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से एक उदाहरण इस का भी देख लेते है

तेरी निगाह ने दिल को मेरे लूटा
किया असीर मुझे ज़ुल्फ़ ने तेरी

यूँ इसकी तक़्तीअ’ तो आसान है -आप भी कर सकते है --चलिए जो हुकुम --कर के देख लेते हैं
1 2  1 2    / 1 1  2   2  / 1 1   2 2
तिरी निगा /ह ने दिल को / मिरे लूटा
1  2    1 2  / 1 1 2  2    / 1 1 2 2
किया असी/ र मु झे ज़ुल् /फ़ ने तेरी

यूँ तो मुज्तस की और भी बह्र भी होती है और हो सकती है जैसे--
उदाहरण आप पेश करे तो बेहतर
[1] मुज्तस मुरब्ब: मख्बून
मुफ़ाइलुन---फ़इलातुन 
1 2  1 2 ----11 2 2 
[2] मुज्तस मुसम्मन मख़्बून  मक़्लूअ’ महज़ूफ़     
मफ़ाइलुन---फ़अ’लातुन---मफ़ाइलुन----फ़े
1212---------1122-------1212-------2

[3] मुज्तस मुसद्दस मक्फ़ूफ़ मक़्बून महज़ूफ़
मुस तफ़ इलु---फ़ा इलातु--फ़ इलुन
2 2 11-------2121-----112

 बह्र-ए-मुज्तस का बयान ख़त्म हुआ
अगले किस्त में किसीऔर बह्र पर चर्चा करूँगा

[अस्तु
{क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

-आनन्द.पाठक-

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